ब्रह्मचर्य क्या है ?

वास्तव में तो, ब्रह्मचर्य दो प्रकार के होते हैं। ‘मैं शुद्धात्मा हूँ’ का निरंतर लक्ष्य रहे वह सबसे श्रेष्ठ ब्रह्मचर्य है। बाकी, ब्रह्मचर्य का सही अर्थ है ब्रम्ह में चर्या। शुद्धात्मा में रहना वही ब्रह्मचर्य है।

दूसरे प्रकार का ब्रह्मचर्य उसे कहते हैं, जब आप मन-वचन-काया से विषय विकार में एकाकार नहीं होते या उसके पक्ष में नहीं रहते। आप विवाहित हो या नहीं, वह महत्वपूर्ण नहीं है। इस संदर्भ में, ब्रह्मचर्य पुद्गल सार है। हम जो खाते-पीते हैं, उन सब से जो सार बनता है वह है ‘ब्रह्मचर्य’! यदि यह ब्रह्मचर्य का सार समाप्त हो जाए तो आत्म अनुभव और आत्म की प्राप्ति करना कठिन हो जाता है। इसलिए ब्रह्मचर्य बहुत कठिन आध्यात्मिक साधना हे । यदि एक तरफ ज्ञान और दूसरी तरफ ब्रह्मचर्य हो तो सुख की कोई सीमा ही नहीं होती! उससे जो परिवर्तन होता है उसका वर्णन नहीं किया जा सकता! क्योंकि ब्रह्मचर्य तो पुद्गल सार है! 

विषय तो खतरनाक विष है, विषयसुख की मूर्छा में डूबे हुए लोगों को, उस बारे में जाग्रत रहने की ज़रूरत है। कुछ तो सोचना चाहिए कि रक्त, माँस और पीप से भरे हुए शरीर में कैसे सुख हो सकता है? जिस तरह दूध के सार से घी बनता है उसी तरह आहार के सार से वीर्य बनता है। विषय और हस्तमैथुन से वह सार नष्ट हो जाता है और शरीर कमजोर हो जाता है।  

लोकसार वह मोक्ष है और पुद्गलसार वह वीर्य है। वीर्य का रक्षण करने से आपको ब्रह्मचर्य की शक्ति प्राप्त होती है, जिसके फलस्वरूप तेज, ओजस्वी, एकाग्रता और मनोबल उत्पन्न होता है। जो व्यक्ति ब्रह्मचर्य का पालन करता है वह अत्यंत विकट परिस्थिति में भी शांत रह सकता है। 

एक मात्र ज्ञानी पुरुष ही ब्रह्मचर्य पालन करने का विज्ञान समझा सकते हैं, क्योंकि वे ब्रह्मचर्य सिद्ध कर चुके होते हैं। वे सभी प्रकार के विषय विकारी परिणामों से संपूर्ण रुप से मुक्त होने के कारण हमें भी मुक्त करवा सकते हैं। ऐसे ही एक ज्ञानी पुरुष हैं परम पूज्य दादा भगवान। उन्होंने विवाहितों के लिए भी ब्रह्मचर्य का मार्ग बताया है। वे कहते हैं कि इस काल में आपसी सहमती (समाधानपूर्वक) से और एक पत्नीव्रत का पालन ही ब्रह्मचर्य है। 

उन्होंने इस संदर्भ में कहा है कि “विवाहित हों और यदि ब्रह्मचर्यव्रत लेते हैं, तो आत्मा में जो सुख है, उसका उन्हें पूर्णतः अनुभव हो सकता है।” ब्रह्मचर्य पालन करने और उसका पूर्ण परिणाम प्राप्त करने के लिए, आत्मज्ञान अनिवार्य है। एक बार आत्मा के सुख का अनुभव हो जाए तो विषय में सुख ही नहीं लगता।  

Science of Celibacy

Pujya Niruma explains the spiritual science behind celibacy. She describes that, if you find happiness from your Soul, you will no longer crave happiness from sex.

Top Questions & Answers

  1. ब्रह्मचारी के विशिष्ट गुण क्या हैं?
  2. आध्यात्मिक जीवन, ब्रह्मचर्य में कैसे मदद करता है ? ब्रह्मचर्य और आत्मसाक्षात्कार के बीच क्या संबंध है?
  3. ब्रह्मचर्य का क्या महत्व है?
  4. विषय के जोखिम क्या हैं ?
  5. स्वप्नदोष क्या है? स्वप्नदोष किस कारण से होता है ? स्वप्नदोष को कैसे रोक सकते है ?
  6. अध्यात्म में वीर्य क्या है? वीर्य शक्ति के उर्ध्वगमन से अध्यात्म में क्या मदद हो सकती है ?
  7. स्त्री और पुरुष के बीच के आकर्षण का क्या विज्ञान है?
  8. ब्रह्मचर्य के पालन के लिये आहार का क्या महत्त्व है? किस प्रकार का आहार ब्रह्मचर्य के लिये हितकारी है ?
  9. ब्रह्मचर्य का पालन करने में मन की क्या भूमिका है?
  10. सती किसे कहते हैं? सती की सही परिभाषा क्या है?
  11. ब्रह्मचर्य व्रत के बारे में क्या तथ्य है?

Spiritual Quotes

  1. विषयों का जोखिम जाना नहीं इसलिए उसमें रुका ही नहीं है।
  2. विषय का पृथक्करण करें तो खाज खुजलाने के समान है।
  3. अब तप कब करना होता है? मन में विषय के विचार आते हो और खुद का दृढ़ निश्चय हो कि मुझे विषय भोगना ही नहीं है। इसे भगवान ने तप कहा।
  4. जिसने अब्रह्मचर्य जीत लिया उसने सारा संसार जीत लिया। ब्रह्मचर्य पालनेवाले पर तो शासन देवी-देवता बहुत प्रसन्न रहते हैं
  5. आपका संपूर्ण ब्रह्मचर्य पालन का निश्चय और हमारी आज्ञा, दोनों मिलकर अचूक कार्य सिद्धि होगी ही, यदि भीतर में निश्चय ज़रा-सा भी इधर-उधर नहीं हुआ तो।
  6. 'मैं शुद्धात्मा हूँ' यह निरंतर लक्ष्य में रहे वह महानतम ब्रह्मचर्य है।
  7. संसार जीतने के लिए एक ही चाबी बताता हूँ कि विषय यदि विषयरूप नहीं हो तो सारा संसार जीत जाएँगे |
  8. जहाँ विषय की बात भी है, वहाँ धर्म नहीं है। धर्म निर्विकार में होता है। चाहे जितना कम अंश में धर्म हो, मगर धर्म निर्विकारी होना चाहिए।
  9. एक बार के विषय में करोड़ों जीवों का घात होता है, एकबार में ही! यह नहीं समझने के कारण यहाँ मौज उड़ाते हैं। समझते ही नहीं! मजबूरन जीव मरें ऐसा होना चाहिए। लेकिन समझ नहीं हो, वहाँ क्या किया जाए ?
  10. यह स्त्री है' ऐसा देखते हैं। वह पुरुष के भीतर रोग हो तभी स्त्री दिखती है, वर्ना आत्मा ही दिखे और 'यह पुरुष है' ऐसा देखती है, वह उस स्त्री का रोग है। निरोगी हो तो मोक्ष होता है।

Related Books

×
Share on
Copy