कर्म कैसे बंधते है?
कर्म का मूल कारण कर्ता भाव है| "मैं कौन हूँ", इसकी गलत समझ ही कर्म बंधन का मुख्य कारण है| कर्ता-भाव से कर्म बंधन होते हैं|
कर्म वास्तविक है, यह काल्पनिक नहीं है। दिलचस्प बात यह है कि कर्म का सिद्धांत वैसा नहीं है जैसा हममें से अधिकांश लोग समझते हैं। बल्कि यह वैज्ञानिक है और नियमाधीन है।
“अगर अच्छे कम करेंगे तो हमारे साथ भी अच्छा ही होगा।“ दुनिया इसी तरह चलती है, लेकिन क्या यह पूरी तरह सच है? उदाहरण के लिए, यदि आप पाँच लाख रुपये का दान इस भाव से करते हैं कि, “काश मैं ज़्यादा दे पाता”, तो क्या यह उतनी ही राशि का दान बिना इच्छा के या दबाव में आकर करने के बराबर है? यदि नहीं, तो फिर कर्म का वास्तविक सिद्धांत क्या है?
वास्तव में, अपनी इच्छा से पैसों का दान करने का अर्थ है कि हम पुण्य बाँध रहे हैं और बिना इच्छा से दिए गए दान का अर्थ है कि हम पाप बाँध रहे हैं, भले ही दान की राशि समान हो। हम जो भी कार्य करते हैं या जो भी शब्द बोलते हैं, वे सभी हमारे पूर्वकर्म के परिणाम हैं। सिर्फ कुछ अच्छा कार्य करने से पुण्य नहीं बंधता; हमारे भाव के आधार पर नए कर्म बंधते हैं और इसी नियम से साबित होता है कि वास्तव में कर्म है।
पूर्वभव के कर्मफल भुगतते वक्त हमें अंदर जो भाव होते हैं, उनके आधार से हमारा अगले जन्म का भी कर्मबंधन होता है। इस तरह, हम जन्म और मृत्यु के चक्र में फँस जाते हैं। यही जीवन और कर्म के बीच का संबंध है। केवल आत्मज्ञान प्राप्त होने के बाद ही हम कर्मबंधन से मुक्त हो सकते हैं।
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