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मेरा ये मनुष्य जन्म सफल हो गया ...

ज्ञान लेने से पहले लाख प्रयत्न करने पर भी किंचित मात्र भी क्रोध - मान - माया - लोभ - राग - द्वेष् कम नहीं होते थे | पर ज्ञान लेने के बाद बिना प्रयत्न सब शांत हो गये | दादा भगवान के अनंत उपकार है जो ये ज्ञान जगत को दिया | मेरा ये मनुष्य जन्म सफल हो गया | जय सच्चिदानंद |

गौतम प्रेमचंद

गौतम प्रेमचंद , India

मैं प्रतिदिन छः घंटें फ़िल्में देखता था और अब मैं प्रतिदिन छः घंटे सत्संग देखता हूँ

जैसे मैंने ज्ञान लिया, मैंने दादा की पुस्तकों का अध्ययन किया और पूज्य दीपकभाई और पूज्य नीरुमा को सुना। मुझे लगा कि मेरा मनोरोग और मनोविज्ञान का सर्व ज्ञान उनसे प्राप्त की हुई समझ की तुलना में तुच्छ था। मैं प्रतिदिन छः घंटे फ़िल्में देखा करता था और अब मैं प्रतिदिन छः घंटे सत्संग देखता हूँ।

डॉ. महेश पी तिल्वानी

डॉ. महेश पी तिल्वानी, India

मेरी अनंत काल की खोज यहाँ समाप्त होती है!

मैं पिछले दो वर्षों से आत्मसाक्षात्कार की खोज में थी। जब मेरे दादाजी ने पहली बार ज्ञानविधि कार्यक्रम में भाग लिया था, तब मैं इसके बारे में उत्सुक थी। जब हम लोग मुंबई में थे,तो उन्होंने अडालज के ज्ञानविधि कार्यक्रम में भाग लिया था और दो साल बाद मुझे भी यह मौका मिल गया। मेरी अनंत काल की खोज यहाँ समाप्त होती है!

कुछ दिनों पहले मुझे अहमदाबाद में पूज्य दीपकभाई से ज्ञान मिला और पहले मैं कौन थी और अब कौन हूँ, इसमें बड़ा अंतर महसूस करती हूँ। और मुझे यकीन है कि मैं निश्चित रूप से मेरे प्यारे कृष्ण को मिलने के लिए पर्याप्त ऊँचाई हासिल कर लूँगी।

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जाह्नवी शाह

जाह्नवी शाह, India

ज्ञानविधि के बाद कोई भी दुःख और निराशा मुझे मानसिक रूप से प्रभावित नहीं करते|

मैं एक मध्यम वर्गीय परिवार से हूँ, जहाँ नौकरी करने के लिए काफी दबाव होता है और पैसों के लिए संघर्ष भी होता है। जब मैं BCA कि पढ़ाई कर रही थी, उस दौरान एक कंपनी के इंटरव्यू में मेरा सिलेक्शन नहीं होने के वजह से मैं ड्रिप्रेशन में चली गई और मुझे तीन महीनों तक दवाईयाँ लेनी पड़ी। इसके अलावा मैं बहुत तनाव और संघर्ष से गुजर रही थी उस वजह से कोई मुझ से खुश नहीं था।

ज्ञानविधि के पश्चात्

जब मैं MCA के तीसरे सिमेस्टर में थी, तब १३ कंपनियों ने मुझे इंटरव्यू में सिलेक्ट नहीं किया और उस समय एक भी दुःख और निराशा मुझे मानसिक रूप से परेशान नहीं कर पाई। मैं अपनी तरफ से सभी प्रयत्न कर रही थी। फलस्वरूप आज मैं एक अधिकारी के रूप में केनरा बैंक में काम कर रही हूँ।

मित्रों, यह ज्ञान विद्यार्थियों के लिए बहुत उपयोगी हैं। मुझे सच में ऐसा लगता है कि मुझे मनोभाव, समर्पण, एकाग्रता, तनाव से मुक्त, मन की  शांति और सुख ये सब ज्ञान से ही मिल सकता हैं और यह कही भी नहीं मिलेगा| अंत में ज्ञान सब की मदद करता है।

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हिमांशु कुशवाहा

हिमांशु कुशवाहा, India

ज्ञान स्वयं क्रियाकारी हैं, मेरी तरफ से कोई प्रयास नहीं हैं।

मैंने यह ज्ञानविधि १९९२ में ली। लेकिन मुझें इस ज्ञान की महानता का पता १९९४ में चला, जब मैंने गुरु-पूर्णिमा के अवसर में भाग लिया।

गुरु-पूर्णिमा में मैंने एक किताब पायी थी। मेरी माँ ने उस किताब का पहला पन्ना पढ़ा और मुझें बताया कि वह किताब बहुत बढ़िया थी और उनके दिल को छु गई थी। उस वक्त मुझें गुजराती पढनी नहीं आती थी क्योंकि मेरी परवरिश दक्षिण भारत में हुई थी। एक महात्मा ने मुझें दादाश्री की मैगेज़ीन दी हुई थी। उस मैगेज़ीन के एक पन्ने पर दादा की तस्वीर थी, जिसके निचे लिखा था, "जो भी शक्ति आप माँगोगे, वह आपको प्राप्त होगी।" क्योंकि मुझें पढना अच्छा लगता था। मैंने दादा से उनकी किताब पढने की और ज्ञान समझ ने की शक्ति माँगी। मुझें थोड़ी हिंदी आती थी, मैंने किताबें पढना शुरू किया। मेरी माँ मुझें थोड़े शब्द समझाती थी। फिर १९९५ में मैंने नीरू माँ को अपने घर आमंत्रित किया। तब नीरू माँ ने मुझें दादा के ज्ञान और थोड़े गुजराती शब्दों की समझ दी। उस दिन के पश्चात मैंने दादा की सारी किताबें पढनी शुरू की और दादा की गुजराती पढने में प्रवीणता पा ली। उसके पश्चात मैं दादा की सारी किताबें पढ़ती हु और मोक्ष में जाने का मेरा निश्चय दृढ हो गया हैं।

व्यवसाय का अनुभव : उन दिनों, काम पर मुझें अपने बॉस के साथ मतभेद होने लगे। १९९६ में मेरे पास दादा के ज्ञान के बहुत सारे साधन नहीं थे। केवल एक केसेट थी जिसमें दादाश्रीने पाँच आज्ञा समझाई थी। हररोज़ काम पर जाने से पहले में वह टेप सुनती थी और प्रतिक्रमण किताब में से प्रार्थना का एक पन्ना पढ़ती थी। एक महीनें के बाद मेरी बदली एक दुसरे डिपार्टमेंट में कर दी गई, जहाँ पर मैंने एक साल काम किया। तब मुझें पता चला कि मेरे भूतपूर्व बॉस को कंपनी से बहार निकाल दिया गया हैं। मुझें अपनी पहलेवाली नौकरी वापस मिल गई। तब से दादा के ज्ञान के प्रति मेरी श्रद्धा और बढ़ गई और मुझें यह एहसास हुआ कि मेरी तरफ से कुछ भी प्रयास न होने के बावजूद, दादा का ज्ञान स्वयं क्रियाकारी हैं।

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गीता पटेल

गीता पटेल, USA

आज तक किसी भी आध्यात्मिक समुदाय में मुझे इतना बढ़िया सत्कार नहीं मिला। यहाँ के लोगों की नवाज़ी और सत्कार अपार थे।

सितम्बर ९, २००६ के रोज़ मुझे आत्मज्ञान प्राप्त हुआ। और यह ऐसे हुआ : मैं अपनी पूरी ज़िन्दगी एक जिज्ञासु रहा हूँ, गुरुओं के आशीष और कृपा पाने के लिए जाता रहता, घंटों तक ध्यान में बैठता। वैसे ही, जैसे हम सबने किया होगा। लेकिन मैंने कभी नहीं पाया, जो मुझे पाना था। कई बार मुझे अपार सुख का अनुभव हुआ, उत्कृष्ट स्थिति की प्राप्ति हुई, लेकिन मैं कभी जेन (व्यक्ति का नाम) से अलग नहीं रह पाया। जुदापना अगर रहा भी हो तो वह बहुत ही कम वक्त के लिए था और जो चलायमान होता हैं, वह रियल नहीं है, इसलिए मैं मानता हुँ कि मुझे जो पाना था उसका मैंने कभी अनुभव नहीं किया था।

३० साल की कड़ी महेनत के बाद, मैंने अपनी खोज छोड़ दी। फिर एक मित्र ने मुझे यह वेब-साईट लिंक www.dadashri.org भेजकर पूछा कि मैं इन गुरु को जानता हूँ । मैं उनको नहीं जानता था, लेकिन दादाश्री की तस्वीर से में आकर्षित हुआ। और मुझे यह एहसास हुआ कि जो मुझे पाना हैं, वह उनके पास हैं। जल्द से जल्द ज्ञान पाने की धुन सवार हो गई। आपको याद हैं न, मुझे इनके बारे में कुछ भी नहीं पता था। केवल दादाश्री की शक्ति मुझे उनके प्रति आकर्षित कर रही थी। इतना गहरा आकर्षण मैंने पहले कभी महसूस नहीं किया था। दादाश्री को स्थूल रूप से नहीं मिल सकता था, लेकिन दीपकभाई को मिल सकता था और दीपकभाई को शीघ्रातिशीघ्र मिलने का अवसर सिंगापोर में था। मैं डेनमार्क में रहेता हूँ, इसलिए काफी लंबा सफ़र था। लेकिन फिर भी हम गए, मेरा दोस्त और मैं…

आज तक किसी भी आध्यात्मिक समुदाय में मुझे इतना बढ़िया सत्कार नहीं मिला। यहाँ के लोगों की नवाज़ी और सत्कार अपार थे। सत्संग गुजराती में थे, इसलिए हमें एक भी शब्द समझ में नहीं आ रहा था। लेकिन हमें एक अनुवादक मिलें, जिन्होंने हमारी बहुत देखभाल भी की। उस सम्मेलन में करीब १५० भारतीय थे, जिनको गुजराती समझ में आ रही थी और हम दो लोग डेनमार्क से थे। लेकिन हमें कभी भी ऐसा नहीं लगा कि हम बहार से हैं। वास्तव में हमें घर जैसा ही लगा। एक भारतीय कुटुंब के घर पर हमें भोजन के लिए आमंत्रित भी किया गया।

हमें कहा गया था कि दीपकभाई के पास एक ख़ास सिद्धि है और ज्ञानविधि के समय हमें और कुछ नहीं करना, केवल उनके कहे गए वाक्यों को ऊँची आवाज़ से दोहराना हैं। काफी सारे वाक्य गुजराती में थे, जो मुझे समझ में नहीं आ रहे थे और दोहराने में भी मुश्किल हो रही थी। लेकिन हमारे लिए उन्होंने कई ख़ास वाक्य अंग्रेजी में भी कहे।

तुरंत मुझे मेरे सिर के शिखर पर एक तीव्र शक्ति का एहसास हुआ और मुझे लगा जैसे (क्राउन,ताज) चक्र खुला। फिर लगा जैसे मेरा दिमाग़ उबल रहा हैं। ऐसे लग रहा था जैसे असंख्य बुलबुले दिमाग़ के अन्दर फट रहे हैं और फिर एक शक्ति की तरंग महसूस हुई और मैं आनंदित हो गया। इतना ज्यादा आनंद मुझे हो रहा था कि मैं अपनी हँसी रोक नहीं पाया और काफी सारे वाक्य बोलना चुक गया। यह मुझे निश्चित हुआ कि मुझे वह मिल गया जिसकी मुझे तमन्ना थी - आत्मज्ञान का अनुभव, जेन और मेरे बिच एक साफ़ भेद रेखा का भी अनुभव हुआ। चक्र खुल ने का अनुभव और जेन और मेरे बिच का भेद आज भी कम नहीं हुआ।

इसके बाद मुझे जीव-मात्र में शुद्धात्मा दिख रहा था, जो और कुछ नहीं लेकिन शुद्धात्मा हैं। मुझे आश्चर्य हो रहा था कि लोगों का सही स्वरूप तो शुद्धात्मा हैं, फिर भी वे बोल सकते हैं, कार्य कर सकते हैं। यह दृष्टि दूसरे दिन और स्पष्ट हुई और मेरा आश्चर्य कायम रहा। आज भी मुझे आश्चर्य होता हैं कि वह दृष्टि का प्रमाण कम-ज्यादा हुआ होगा, लेकिन कभी छूटी नहीं। मेरा अनुभव धीरे-धीरे आनंद में परिवर्तन हो रहा हैं।

जब मैंने ध्यान करने के लिए अपनी आँखें बंद की तो मैं ध्यान नहीं कर पाया। लेकिन शुद्धात्मा में चला गया और तुरंत आनंद का अनुभव किया। और आज भी वह कायम हैं। जगत् में यह ज्ञान लाने के लिए मैं दादाश्री का बहुत ज्यादा ऐहसानमंद हूँ और दीपकभाई का भी ऐहसानमंद हूँ कि उन्होंने मुझे यह ज्ञान दिया।

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जेन  एस्मान

जेन एस्मान, Denmark

'मैं शुद्धात्मा हूँ' उसकी वास्तविक समझ

6 नवम्बर 2005, मेरे जीवन का सबसे महान दिन है। क्योंकि इसी दिन मैंने सीमंधर सिटी अडालज में पूज्य नीरू माँ से ज्ञान प्राप्त किया था। उस दिन से मुझ में ये ट्रिमेन्डस (आश्चर्यजनक) बदलाव आया। ये अलग-अलग स्तोत्रों से मेरे पास जो जानकारी थी कि 'मैं एक आत्मा हूँ', वह एक वास्तविक समझ के अनुभव में बदल गई।

सुरेश कुमार 'राजू'

सुरेश कुमार 'राजू', India

मैं बाहरी वातावरण के असर से मुक्त होकर रह सकती हूँ कहीं भी।

भाषा नहीं जानने के कारण मैं अपने अनुभव को पूरी तरह से व्यक्त करने में असमर्थ हूँ। मैं आपको संक्षिप्त में अपनी भावनाओं के बारे में बताना चाहती हूँ और अपनी खुशियाँ बाँटना चाहती हूँ। नीरू माँ ने अपनी असीम कृपा मुझ पर बरसाई, जिसके कारण मैं गुजराती पढ़ना सीख गई। नीरू माँ के आशीर्वाद के कारण ही वात्सल्य की लाइन में खड़े रहकर वहाँ पर (गुजराती में) लिखे हुए बोर्ड को पढ़कर मैं नीरू माँ से प्रार्थना कर सकी। नीरू माँ की कृपा के कारण ही मैं पढ़ सकी और कुछ हद तक उसका अर्थ भी समझ सकी। (19 मार्च 2006 से 24 मार्च 2006 को उनके अंतिम दर्शन के दौरान) उस समय की प्रार्थना से मुझे अदभूत परिणाम मिले। अभी भी मैं नीरू माँ से तेलुगु में उसी प्रकार प्रार्थना करती हूँ। मेरे हृदय में मैं नीरू माँ की उपस्थिति का अनुभव करती हूँ। मैं ज्ञान का आनंद ले रही हूँ। वास्तव में मैं बहुत-बहुत खुश हूँ, मुझे अब विश्वास हो रहा है कि बिना बाहरी वातावरण से असरमुक्त रहकर मैं कहीं भी रह सकती हूँ। मैं विश्वास से कह सकती हूँ कि मैं ज्ञानीपुरुष के ज्ञान के जहाज में हूँ। नीरू माँ को टी.वी. में देखकर और उनके हिन्दी के सत्संग को देखकर सुरमनेश्वरी किसीकी बात की परवाह किए बिना अडालज पहूँच गई थी। यही नीरू माँ की कृपा और शक्ति दर्शाता है।

एक और अदभूत अनुभव जो मुझे और मेरी बहन को तब हुआ, जब 7/11/2005 को नीरू माँ से वात्सल्य में मिले थे (मेरी बहन की पहली मुलाकात), नीरू माँ ने प्रेम से हमारे परिवार के बारे में पूछताछ की। अभी भी मुझे शंका है कि उस दिन नीरू माँ ने किस भाषा में बात की। नीरू माँ की बातें हमारे मन में तेलुगु में पहूँच गई। मेरी बहन जो तेलुगु के अलावा कोई भी भाषा नहीं जानती, फिर भी उसे सब समझ में आ गया, जैसे कि वह सब बातें तेलुगु में ही कही गई थी।

दो दिन पहले (शायद 16/06/2006 की रात) मुझे सपना आया, जिस जगह पर नीरू माँ के देहमिंदर का अंतिम संस्कार किया गया था, वहाँ पर कुछ हो रहा था। मेरे ख्याल में शायद वह सत्संग था। सभी महात्मा नीरू माँ की समाधि के पास बैठे हुए थे। मैं एक कौने में बैठ गई, तब मैंने नीरू माँ की आवाज़ सुनी, तब वे मुझे प्यार से तेलुगु में बुला रही थी, Òमेरे सामने बैठ जाओ।Ó तब मैं कौने में से मध्य में आ गई। सपने में भी मुझे नीरू माँ के प्रेम से अत्यंत खुशी महसूस हुई।

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आर. सुरमनेश्वरी

आर. सुरमनेश्वरी, India

जिनके प्रति आपको श्रद्धा हैं, उसे छोड़ना नहीं है और न ही आपको गुरु बदलने की ज़रूरत हैं।

कई आध्यात्मिक गुरुओं से प्रेरित होकर हमने अपनी आध्यात्मिक खोज की शुरुआत की। और फिर अध्यात्म जानने की अभिलाषा जाँच में बदल गई। शास्त्रों की जाँच की और हमने काफी वांचन करके समझ ने की कोशिश की हैं। फिर वह समझ को अमल में लाने का भी प्रयास किया हैं। हमें पर्मानन्ट सुख की तलाश हैं....  क्या हमें यहाँ पर उसका अनुभव हो सकता हैं?

मैं अपना व्यक्तिगत अनुभव आपको बताना चाहूँगा। "मार्कटिंग" के उद्देश्य से नहीं, परंतु मैंने जो सिखा हैं, वह आप सबके साथ बाँटने के उद्देश्य से।

हमें काफी प्रश्न थे। जैसे की......

  • हाल में हमारी जो जीवन शैली हैं, उसमे क्या हम आध्यात्मिक प्रगति कर सकते हैं?
  • जब हम आलोचना-प्रतिक्रमण करते हैं, तो क्या वह क्रिया ज़रूरी हैं कि केवल भाव ही काफी हैं?
  • क्या हम जान सकते हैं कि कर्म बंधन कैसे होता हैं?
  • कर्म की निर्जरा कैसे होती हैं? कर्म निर्जरा के प्रमाण को कर्म बंधन की तुलना में कैसे बढ़ा सकते हैं?
  • क्या ध्यान करना मदद कर सकता हैं?
  • जागृति क्या हैं?
  • चमत्कार क्या है?
  • हमारे दोषों से मुक्ति कैसे पाए?
  • मृत्यु के रहस्य क्या हैं और मृत्यु के पश्चात् की जाती क्रियाओं का क्या महत्व हैं?
  • क्या इस काल में मोक्ष संभव हैं?
  • मोक्ष के मार्ग में मुख्य आवश्यकता क्या हैं?
  • क्या हम सच्चे और पर्मानन्ट सुख की प्राप्ति कर सकते हैं?

इन सारे और कई प्रश्नों के उत्तर हमें मिल गए, जब हमें आत्मा और आत्मा के गुणों की पहचान हुई। यह सारी समझ हमें पूज्य नीरुमाँ और पूज्य श्री दीपकभाई से मिली। हमने यह जाना कि दुःखों से बहार आने के लिए जिस गुरु की हमें तलाश थी, वह तो हमारे अंदर ही हैं।

हम कैसे "कोई चीज़" पा सकते हैं, जब तक हमें वह "कोई चीज़" के गुणों की ही पहचान न हो?..... ज्ञानी हमें प्रकाश देकर उसकी पहचान कराने के लिए मदद करते हैं।

दादा के ज्ञान का हम उपयोग और अनुगमन कर रहे हैं और इससे हमारे जीवन में काफी बदलाव आया हैं। हमारी द्रष्टि और हमारी समझ में काफी बदलाव आया हैं। ज्ञान को "अमल में लाना" महत्वपूर्ण हैं। केवल वांचन और विचार से हम ज्यादा प्रगति  नहीं कर सकते।

हम सिर्फ इतना कह सकते हैं कि आप खुद आए और पूज्य दीपक भाई को सुने और फिर अपना फैसला खुद ले।

जब हमने पहली बार ज्ञानविधि के बारे में सुना, तब हमें यह नहीं पता था कि हमें क्या प्राप्ति होगी। लेकिन यह सोचा कि अधिक ज्ञान हानिकारक तो नहीं होता। और उस वक्त से ज्ञान बढ़ता ही जा रहा हैं और आज आपको अनुभव बताने का हमें मौका मिला हैं।

यह पूरी प्रक्रिया में भाषा भेद बाधक नहीं हुआ और यह हमें तर्क शक्ति और बुद्धि के प्रभाव से ऊपर ले जाती है।

जिनके प्रति आपको श्रद्धा हैं, उसे छोड़ना नहीं है  और न ही आपको गुरु बदलने की ज़रूरत हैं। केवल एक बार आत्मा का अनुभव करना हैं।

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निलेश शाह

निलेश शाह , Singapore

ऐसा लगा जैसे मैं कोई मूवी में बैठा हूँ और मुझें एक पात्र का अभिनय करना है.... जिन्हें भी अंतिम सत्य की तलाश हैं, उन्हें मैं यह ज़रूर बताना चाहूँगा।

ज्ञानविधि का अनुभव : ईश्वरीय शक्ति के पास बैठकर करीब ३००० लोगों के साथ यह बोलना कि "मैं शुद्धात्मा हूँ," वह अपने आप में ही बहुत जबरदस्त अनुभव हैं। मुझें ऐसे लगा जैसे मेरे अन्दर कोई प्रकाश प्रवेश हुआ और ज्ञानविधि के कारण जो उर्जा मेरे शरीर में प्रवेश कर रही थी, उससे मेरा शरीर थोडा कांपने लगा।

ज्ञानविधि के पश्चात मुझें आज्ञा समझाई गई। ज्ञानविधि के पश्चात जब मेरी आँखें खुली, तो मुझें ऐसे लगा जैसे जोशुआ (व्यक्ति का नाम) और मेरे सही स्वरूप के बिच में जो अंतर हैं, वह पहेले से काफी ज्यादा हो गया था। मुझें ऐसे लग रहा था कि में कोई मूवी का एक पात्र हूँ, जिसका अभिनय मुझें करना हैं। और यह चलता ही रहा। आज मैं एक ऐसी जगह पर हूँ जहाँ से अपनी जागृति को जोशुआ पर से दृष्टा पद में लाना मेरे लिए आसन हैं। यह ज्ञान मुझें अनुभव की गहराई  तक लेते जा रहा हैं। ज्ञानविधि से अपने में एक बिज रोपा जाता हैं। अब उस बिज को फूटने और बढ़ने के लिए पानी और सूर्य की आवश्यकता हैं। ज्ञान ही वह पानी और सूर्य हैं।

जिन्हें भी अंतिम सत्य की तलाश हैं, उन्हें मैं यह ज्ञानविधि लेने के लिए ज़रूर कहूँगा, क्योंकि यह ज्ञान सारे शिक्षण के मूल तक जाता हैं। जो यह हैं कि हम सब सही स्वरूप से शुद्धात्मा हैं। सिर्फ ये मनुष्य रूप का अनुभव कर रहे हैं।

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जोशुआ धर्मा

जोशुआ धर्मा, Thailand

सारा जगत् निर्दोष दिखने लगा।

मेरा नाम हेमंत मेहता है, मैं मुंबई में एक सॉफ्टवेयर इंजीनियर का काम करता हूँ  और मेरी उम्र 27 वर्ष है। मेरे परिवार में मेरी मम्मी सभी जैन धार्मिक क्रियाएँ किया करती थी (मंदिर जाना, सामायिक-प्रतिकर्मण, पूजा, व्रत-उपवास वगैरह)

24 साल की उम्र तक मेरी यह मान्यता था कि अलग-अलग धर्मों के अलग-अलग भगवान होते हैं। क्योंकि हम जैन हैं तो हमारे महावीर भगवान है, वे जैनों का ध्यान रखते हैं। इसलिए मैं भी कभी-कभी मंदिर जाता था और अर्थ जाने बीना ही नवकार मंत्र पढ़ता था। मैं पयूर्षण पर्व के अंतिम दिन को उपवास करता था क्योंकि सभी लोग करते थे। मेरे लिए धार्मिक क्रिया का यही मतलब था। फिर मेरी शादी हुई और मेरी पत्नी का जैन धार्मिक क्रियाएँ और उपवास के प्रति बहुत ही झुकाव था। उस समय मेरे मन में ये प्रश्न उठने लगे, ये व्रत क्यों? इनके प्रति का फंडामेन्टल(मूलभूत) विज्ञान क्या है? मैंने इंन्टनेट पर जैन धर्म के बारे में पढ़ना शुरू किया, मैलिंग लीस्ट पर सब्स्क्राइब किया और प्रश्न पूछने शुरू कर दिए। ऐसा महीनों तक चलता रहा और मुझे वीतराग धर्म की एक झलक मिली। और मुझे लगा कि जैन धर्म बहुत ही वैज्ञानिक और उचित है। लेकिन फिर भी यह सब बौद्धिक स्तर पर और सिर्फ थ्योरीटीकल था। और हमेशा यह असंतोष रहा करता था कि कुछ कमी है। यह उलझन चलती रही।

इंटरनेट पर मेरी खोज मुझे एक दिन www.dadabhagwan.org साइट पर ले गई। और मैंने 'भुगते उसीकी भूल' किताब डाउनलोड की। उस किताब को पढ़ते ही एक आंतरिक अनुभूती हूई कि हाँ यही वह है। यही वह है जो मैं ढूँढ़ रहा था। उसी क्षण मैं दादा को समर्पित हो गया था। और मुझे पूर्ण विश्वास हो गया था कि पुस्तक के ये शब्द दिल से निकले हैं, बुद्धि से नहीं। इसके बाद मैंने सत्संग के बारे में पता लगाया और 10 फरवरी 2002 को ज्ञान लिया।

ज्ञान के तुरंत बाद में मुझे ऐसा लगा जैसे कुछ भी नहीं हुआ है। मैं आशा कर रहा था कि कुछ चमत्कारिक होगा, लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ। मैं सोचकर निराश हो गया कि क्या गड़बड़ हुई? क्या मुझे वापस ज्ञान लेना चाहिए? लेकिन मुझे दादा क ज्ञान के बारे में तिलभर भी शंका नहीं थी। फिर जैसे-जैसे दिन बढ़ते गए, वैसे-वैसे ज्ञान की शक्ति व्यक्त होने लगी। अपने आप ही प्रतिक्रमण होने लगे। जगत् निर्दोष दिखने लगा। और अपने खाली समय में अपने आप ही अंदर से 'मैं शुद्धात्मा हूँ' शुरू हो जाता था।

ज्ञान के कुछ महीनों बाद

'मैं शुद्धात्मा हूँ' शब्दों में ही रहता था और न जाने क्यों मैं शरीर से भिन्न हूँ, ऐसा अनुभव नहीं कर पा रहा था। बहुत सारे बुद्धि के प्रश्न उत्पन्न हो रहे थे। आप्तवाणी पढ़ने, प्रश्न पूछने और अन्य किताबें पढ़ने के बाद भी मुझे संतोषजनक ज़वाब नहीं मिल रहे थे। लेकिन मैंने सत्संग में भाग लेना, और आप्तवाणी पढ़ना जारी रखा। मुझे अंदर से ही ज़वाब मिलने लगे और शरीर से जुदापन का अनुभव भी स्ट्रोंग होने लगा। अंदर से अपनेआप ही प्रश्नों के ज़वाब मिलने लगे, अनुभव... बढ़ता हुआ आंतरिक अनुभव... और यह महसूस हुआ कि ऐसा सब बुद्धि से होना संभव नहीं है। उस समय मुझे लगा कि 'मैं हेमंत हूँ' कि मान्यता अंदर से पूरी तरह से फ्रेक्चर हो गई है।

बाहरी अनुभव यानी घर-परिवार और आपसी रीश्तों में काफी हद तक द्वेष और अभाव खत्म हो गए। और यदि कभी हुए तो भी तुरंत प्रतिक्रमण हो जाते हैं। पहले मेरी बहस करने की और अपनी बात को सही मनवाने की आदत थी। लेकिन अब वह भी कम हो गया है।

ज्ञान के बाद अनसुलझें प्रश्न

अगर कुछ है तो वह मेरी खुद की ही अजागृति है... मैं दादा की पाँच आज्ञा में रहने की पूरी कोशिश कर रहा हूँ।

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 हेमंत मेहता

हेमंत मेहता, India

मुझें अब यह यकीन हुआ कि आत्मज्ञान का अनुभव संभव हैं |

ज्ञानविधि, मैंने एक दोपहर कार्डिफ शहर में, मई २००७ में ली। उस दिन हमें अपनी-अपनी जगहों पर बिठाया गया और हमने थोड़ी देर इंतज़ार किया। ज्ञानविधि शुरू होने से पहले भारतीय लोगों ने कुछ गीत गाये और फिर उसके पश्चात दीपकभाई कुछ वाक्य बोल रहे थे, जिन्हें हमें दोहराना था। क्योंकि गुजराती उनकी मातृभाषा थी, होल  में सारे लोग काफी जोरसे उन  वाक्यों को दोहरा रहे थे। एक इंग्लिश लेडी, मेरे मित्र और मेरे सिवाय, बाकी सारे लोग भारतीय थे।

लेकिन फिर भी जितनी अच्छी तरह से हो सके, मैंने वह वाक्यों को दोहराने की कोशिश की। लेकिन मुझें कुछ ख़ास अनुभव नहीं हो रहा था। मैंने कुछ ज्यादा अपेक्षा भी नहीं रखी थी, क्योंकि मुझें बाद में निराश नहीं होना था। लेकिन वाक्य को दोहराने के करीब १५ मिनिट बाद, मुझें एक ईश्वरीय शक्ति का अनुभव हुआ और ऐसे आनंद का अनुभव हुआ, जो मुझें पहले नहीं हुआ था। मेरा पूरा शरीर आनंद से जैसे भर गया था। उसके बाद मुझें यह यकीन हो गया कि यही वास्तविक सत्य हैं। क्योंकि मुझें यह आनन्दमय अनुभव हो रहा था। करीब आधे घंटें तक यह अनुभव बहुत स्पष्ट रहा, लेकिन उसके बाद उस अनुभव की तीव्रता धीरे-धीरे कम होती गई। लेकिन वह अनुभव मेरे पास एक स्पष्ट जागृति छोड़ गया। मुझें पक्का पता नहीं हैं, लेकिन मुझें लगा कि शायद वाक्यों को दोहराने का मैंने जो संघर्ष किया उसकी वजह से मेरा आनंदमय अनुभव चला गया। लेकिन मेरे लिए यह एक अदभुत अनुभव रहा। मुझें यह यकीन हो गया कि  भले ही हम यह समझते आ रहे हो कि आत्मा हम से बहुत दूर हैं, आत्मज्ञान का अनुभव करना संभव हैं।

 

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रोल्फ़

रोल्फ़, Denmark

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