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ब्रह्मचर्य का पालन करने में मन की क्या भूमिका है?

मन के कहने के अनुसार चलना ही नहीं। मन का कहना यदि हमारे ज्ञान के अनुसार हो तो उतना एडजस्ट कर लेना। हमारे ज्ञान से विरुद्ध चले तो बंद कर देना।

देखिए न, चार सौ साल पहले कबीरजी ने कहा, कितने समझदार मनुष्य थे वह! कहते हैं, 'मन का चलता तन चले, ताका सर्वस्व जाय।' सयाने नहीं कबीरजी? और यह तो मन के कहने के अनुसार चलता रहता है। मन कहे कि 'इससे शादी कर लो' तो क्या शादी कर लेनी?

प्रश्नकर्ता : नहीं, ऐसा नहीं कर सकते।

दादाश्री : मन अभी तो बोलेगा। ऐसा बोलेगा तो उस वक्त क्या करेंगे आप? ब्रह्मचर्य व्रत पालन करना हो तो स्ट्रोंग रहना होगा। मन तो ऐसा भी बोलेगा और आपसे भी बुलवाएगा। इसी कारण से मैं कहता था न कि कल सवेरे आप भाग भी जाएँगे। उसका क्या कारण? मन के कहे अनुसार चलनेवाले का भरोसा ही क्या?

प्रश्नकर्ता : अब हम यहाँ से कहीं भी भाग नहीं जाएँगे।

दादाश्री : मगर मन के कहने के अनुसार चलनेवाला मनुष्य यहाँ से नहीं जाएगा, यह किस गारन्टी के आधार पर? अरे! मैं तुझे दो दिन हिलाऊँ, अरे, ज़रा-सा हिलाऊँ न, तो परसों ही तू चला जाए! यह तो तुझे पता ही नहीं। तुम्हारे मन का क्या ठिकाना?

अभी तो तुम्हारा मन तुम्हें 'शादी करने योग्य नहीं है, शादी करने में बहुत दुःख है' (ऐसा विचार करके) सहाय करता है। यह सिद्धांत दिखलानेवाला तुम्हारा मन पहला है। तुमने यह सिद्धांत ज्ञान से निश्चित नहीं किया है, यह तुम्हारे मन से निश्चित किया है, 'मन' ने तुम्हें सिद्धांत दिखलाया कि 'ऐसा करो।'

प्रश्नकर्ता : ज्ञान से निश्चय किया हो तो फिर उसका मन विरोध ही नहीं करे न?

दादाश्री : नहीं, नहीं करेगा। ज्ञान के आधार पर निश्चय किया हो तो उसका फाउन्डेशन (नींव) ही अलग तरह का होगा न! उसका सारा फाउन्डेशन आर. सी. सी. जैसा होगा। और यह तो रोड़ा का, भीतर क्रोंक्रीट किया हुआ, फिर दरार ही पड़ जाएगी न?

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