आध्यात्मिक कोटेशन

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इस दुनिया में करुणा ही सब से अंतिम ‘पैम्फलेट’ है!

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जब से किसी भी जीव से किसी भी तरह का लाभ उठाने की इच्छा न रहें, तभी से करुणा उत्पन्न होती है। जब तक पारस्परिक आधार है तब तक करुणा नहीं है। आधार-आधारी नहीं होना चाहिए। खुद किसी का आधार ज़रूर बनता है लेकिन खुद किसी पर आधारित नहीं रहता!

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करुणा से ही ‘ज्ञान’ उत्पन्न होता है। जिसमें कारुण्यता का बीज डल गया है उसे ‘ज्ञान’ प्रकट हुए बगैर रहेगा ही नहीं।

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खुद के सुख का नहीं लेकिन सामने वाले को क्या परेशानी है, वैसा रहा करे तभी से कारुण्यता की शुरुआत होती है। हमें बचपन से ही सामने वाले की परेशानी की पड़ी थी। जब खुद के लिए सोचे तक नहीं, उसे कारुण्यता कहा जाता है। उसी से ‘ज्ञान’ प्रकट होता है।

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एक चित्त वाला होने के बाद ही कारुण्यमूर्ति बना जा सकता है।

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कोई पूछे तभी सलाह देनी चाहिए, वर्ना अपनी किंमत नहीं रहेगी!

संवर यानी नया कर्मबंधन रुक जाना। संवर कहाँ पर है? जहाँ स्यादवाद है, वहाँ। जहाँ यथार्थ ज्ञान है, वहाँ पर स्यादवाद रहता है!

स्यादवाद वाणी क्या कहती है? आप ऐसा बोलो कि पाँच लोगों को लाभा मिले और किसी को भी परेशानी न हो।

जहाँ स्यादवाद वाणी है वहाँ आत्मज्ञान है। जहाँ एकांतिक वाणी है वहाँ आत्मज्ञान नहीं है।

व्यवहार शुद्धि के बगैर स्यादवाद वाणी नहीं निकल सकती।

स्यादवाद वर्तन किसे कहते हैं कि ऐसा वर्तन जो मनोहारी लगे और मन का हरण करे।

स्यादवाद वाणी की भूमिका कब उत्पन्न होती है? तब, जब अहंकार शून्य हो जाता है, पूरा जगत् निर्दोष दिखाई देता है, किसी जीव का किंचित्मात्र भी दोष नहीं दिखाई देता है, किंचित्मात्र भी किसी धर्म का प्रमाण आहत नहीं होता।

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