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आध्यात्मिक जीवन, ब्रह्मचर्य में कैसे मदद करता है ? ब्रह्मचर्य और आत्मसाक्षात्कार के बीच क्या संबंध है?

परम पूज्य दादाश्री कहते है कि “इस आत्मज्ञान की प्राप्ति के बाद, मुझे कभी विषय का विचार तक नहीं आया !“ तभी तो ऐसे विषय रोग को उखाड़कर खत्म कर देने वाली वाणी निकली है ! 

लेकिन ब्रह्मचर्य और आत्मसाक्षात्कार का आपस में क्या संबंध है? 

दोनों में परस्पर गहरा संबंध है । ब्रह्मचर्य के बिना आत्मा के अनुभव का पता ही नहीं चलता । यह जो सुख महसूस हो रहा है , वह आत्मा का है या पुद्गल का, वह पता ही नहीं चलता न । जिसे इसी देह में आत्मा का स्पष्ट और विशेष (स्पष्ट वेदन) अनुभव करना हो, तो उसे विशुद्ध ब्रह्मचर्य पालन के बिना उसकी प्राप्ति संभव ही नहीं है । जब तक ऐसी सूक्ष्मातिसूक्ष्म “रोंग बिलीफ” है कि विषय में सुख है , तब तक विषय के परमाणु संपूर्ण रूप से निर्जरित नहीं होंगे । जब तक वह रोंग बिलीफ संपूर्ण सर्वांग रूप से खत्म न हो जाये, तब तक अति-अति सूक्ष्म जागृति रखनी चाहिए ।  

ब्रह्मचर्य आत्मसुख प्राप्ति में कैसे मदद करता है ? बहुत मदद करता है । अब्रह्मचर्य से देहबल, मनोबल, बुद्धिबल और अहंकारबल सब कुछ खत्म हो जाता है ! जबकि ब्रह्मचर्य से संपूर्ण अंतः करण मजबूत और सुदृढ़ हो जाता है । 

आत्मसुख चखने के बाद विषय सुख फीके लगते है । जलेबी (भारतीय मिठाई) खाने के बाद चाय कैसे लगती है ? जिस तरह जलेबी खाने के बाद चाय फीकी लगती है, उसी तरह आत्मा ज्ञान की प्राप्ति के बाद जो आत्मसुख की अनुभूति होती है, वह विषयसुख से कहीं अधिक है । 

यह देह जो है, रेशमी चादर से लिपटा हांड मांस ही है न ? बुद्धि बाहर की सुंदरता ही दिखाती है , जबकि ज्ञान आरपार सीधा ही देखता है । इस आरपार दृष्टि को विकसित करने के लिए परम पूज्य दादाश्री ने ‘थ्री विज़न’ का अद्भुत हथियार दिया है । अक्रम विज्ञान के द्वारा, आध्यात्मिक जीवन जीना और विषय विकार के बीज से पूरी तरह मुक्त होना संभव है । अंदर विषय रूचि का बीज पड़ा हुआ है , वह धीरे धीरे पकड़ में आता है और उससे छूटा जा सकता है । जिसे एक अवतारी होकर मोक्ष में जाना है, उसे अब्रह्मचर्य से मुक्त होना पड़ेगा ।  

नासमझी से अब्रह्मचर्य टिका हुआ है । ज्ञानी की समझ से समझ लेने पर वह रुक जाता है । ज्ञानी पुरुष संपूर्ण निर्विषयी हो चुके होते है, इसलिए उनमे जबरदस्त वचनबल प्रगट हो चुका होता है , जो विषय का विरेचन करवा देता है ।  

परम पूज्य दादाश्री के पास संसार को देखने के लिए तत्त्व दृष्टि है, जिससे वे देह और आत्मा अलग-अलग है, ऐसा देख पाते है । देह विनाशी है इसलिए देह के अंगों के प्रति आकर्षित होने से , उनमें सुख मानने से अंत में तो दुःख ही मिलेगा । वे इस तरीके से समझ देते है कि बुद्धिजीवी भी उसे सहर्ष स्वीकार कर ले । 

अगर पुरुषार्थ करके समझ से, ज्ञान (आत्मज्ञान) से , भीतर के विकारी भावों को खत्म किया जाये तो अब्रह्मचर्य से मुक्त हो सकते है । 

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