ब्रह्मचर्य क्या है? ब्रह्मचर्य का पालन करने के लिए मार्गदर्शक गाइड

ब्रह्मचर्य क्या है? क्या विषय-विकार के आवेग को कंट्रोल किये बगैर ब्रह्मचर्य का पालन करना संभव है?

हाँ!

ब्रह्मचर्य अर्थात् मन-वचन-काया के द्वारा किसी भी प्रकार के विषय-विकार में हिस्सा नहीं लेना या उसे प्रोत्साहन नहीं देना। आप विवाहित हैं या नहीं उससे कोई फर्क नहीं पड़ता है। जो यह समझना और सीखना चाहते हैं कि ब्रह्मचर्य का पालन कैसे किया जाय, उनके लिए ज्ञानी पुरुष की यह अद्वितीय नई दृष्टि एकमात्र गैरेंटेड उपाय है।

  • ब्रह्मचर्य का पालन करने के लिए आंतरिक भावना होनी चाहिए और उसके लिए भगवान से मन-वचन-काया से ब्रह्मचर्य का पालन करने की शक्ति मांगनी चाहिए।
  • मन को कंट्रोल करने के बजाय उन कारणों को ढूँढ नकाले जिससे मन विषय-विकार में फंस जाता है और तुरंत ही वह लिंक तोड़ डालें।
  • ब्रह्मचर्य के पालन से होने वाले फायदे और विषय-विकार से होने वाले नुकसान का एनालिसिस करें।
  • परम पूज्य दादाश्री कहते हैं कि, “जब से खुद विषय का विरोधी हुआ तभी से निर्विषयी बनने की शुरुआत हो जाती है।” मन-वचन-काया से जो भी विकारी विचार, इच्छाएँ और चेष्टाएँ हुई हों उन सभी के लिए पश्चाताप करना चाहिए। ब्रह्मचर्य की ओर आगे बढने का यह एक सोपान है।
  • विवाहित लोगों के लिए, आपसी सहमति से ब्रह्मचर्य व्रत लेना या फिर एक दुसरे के प्रति वफादार रहना, वही इस काल में ब्रह्मचर्य पालन करने के समान है।

सिर्फ विषय-विकार के आवेग को दबा कर नहीं बल्कि सही समझ के द्वारा ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिए। परम पूज्य दादाश्री ने “समझ से प्राप्त ब्रह्मचर्य” पुस्तक में व्यवहारिक रूप से उपयुक्त चाबियाँ बताईं हैं। उन्होंने अन्ह्क्क के विषय के परिणाम, ब्रह्मचर्य पालन करने के फायदे और साथ ही दैनिक जीवन में ब्रह्मचर्य का पालन कैसे किया जाय, वह भी समझाया है।

नीचे दिए गए प्रश्न और उत्तर के आधार पर अपनी समझ को सही करें:

Celibacy with Right Understanding

Sexual attraction other than your spouse is against the law. You should not have attraction to anyone else in your mind also.

Top Questions & Answers

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Spiritual Quotes

  1. ऐसा है न, जिसे सांसारिक सुखों की ज़रूरत है, भौतिक सुखों की जिसे इच्छा हैं, उसे शादी कर लेनी चाहिए। सब कुछ करना चाहिए और जिसे भौतिक सुख पसंद ही नहीं हों और सनातन सुख चाहिए, उसे शादी नहीं करनी चाहिए।
  2. विषय सारे विष हैं मगर बिलकुल विष नहीं हैं। विषय में निडरता विष है।
  3. अनंत अवतार की कमाई करें, तब उच्च गौत्र, उच्च कुल में जन्म होता है किन्तु लक्ष्मी और विषय के पीछे अनंत अवतार की कमाई खो देते हैं।
  4. जो हो गए हैं उन्हें लेट गो (जाने दें) करें पर नया तो होने ही नहीं दें न! हो गया है उसका कोई उपाय है क्या?
  5. शादी करनी नहीं और गलत छेड़-छाड़ करना वह तो भयंकर पाशवता कहलाए। वे तो नर्कगति के अधिकारी!
  6. किसी धर्म ने विकार को स्वीकार नहीं किया। विकार का स्वीकार करें वे वाममार्गी कहलाते हैं। पहले के समय में वाममार्गी थे। विकार के साथ ब्रह्म को खोजने निकले थे।
  7. व्यवहार तो आपकी पत्नी हो तो उसके साथ दोनों को समाधानकारी हो ऐसा व्यवहार रखना। आपका समाधान और उसका समाधान होता हो ऐसा व्यवहार रखना। उसका असमाधान होता हो और आपका समाधान हो ऐसा व्यवहार बंद करना। आपसे पत्नी को कोई दुःख नहीं होना चाहिए।
  8. यदि उसकी समझ में यह आए कि यह गर्भ में थी तब ऐसी दिखती थी, जन्म हुआ तब ऐसी दिखती थी, छोटी बच्ची थी तब ऐसी दिखती थी, बाद में ऐसी दिखती थी, अभी ऐसी दिखती है, बाद में ऐसी दिखेगी, बुड्ढी होने पर ऐसी दिखेगी, पक्षाघात हो जाए तो ऐसी दिखेगी, अरथी उठेगी तब ऐसी दिखेगी, ऐसी सभी अवस्थाएँ जिसके लक्ष्य में है, उसे वैराग्य सिखाना नहीं होता!
  9. यदि तू संसारी है तो तेरे ह़क का विषय भोगना, परंतु बिना ह़क का विषय तो मत ही भोगना, क्योंकि उसका फल भयंकर है।
  10. जिस संग में हम फँस जाएँ ऐसा हो उस संग से बहुत दूर रहना चाहिए, वर्ना एक बार फँसे कि बार-बार फँसते ही जाएँगे।

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