प्रतिक्रमण कैसे करे?
प्रतिक्रमण कैसे करते हैं? हमारे द्वारा जिस व्यक्ति को दुःख हुआ है, उस व्यक्ति के शुद्धात्मा को प्रार्थना कर के क्षमा मांगते हैं|
जीवन में जहाँ पल-पल टकराव होते हों, क्रोध-मान-माया-लोभ रूपी कषायों के आक्रमण होते रहते हों, दूसरों से हमें या हमसे दूसरों को दुःख होता हो वहाँ कदम-कदम पर पाप बंधते ही रहते हैं। चाहे कितने ही धर्म, जप-तप, उपवास, ध्यान या योग करें, फिर भी मन-वचन-काया से होने वाले दोष रुकते नहीं हैं और अंतरशांति कहीं नहीं मिलती। ऐसे में पाप से वापस लौटना हो तो उसका कोई अचूक मार्ग है? मोक्षमार्ग पर आगे बढ़ने और संसार में सुख-शांति से रहने के लिए कोई उपाय है? कवि कलापी ने कहा है:
“हा, पस्तावो विपुल झरणुं स्वर्गथी उतर्युं छे.
पापी तेमां डुबकी दईने पुण्यशाली बने छे.”
(“हा, पछतावा विपुल झरना स्वर्ग से उतरा है।
पापी उसमें डुबकी लगाकर पुण्यशाली बनता है।“)
चाहे कितना भी गलत कार्य हो जाए, लेकिन अगर बाद में पछतावा कर लें तो वह पाप धुल जाता है। हर एक धर्म में पश्चात्ताप को विशेष महत्त्व दिया गया है, जैसे ईसाई धर्म में इसे ‘कन्फेशन’, इस्लाम धर्म में ‘अस्तग़फिरुल्लाह’, यहूदी धर्म में ‘तेशुवा’, हिन्दू धर्म में ‘पश्चात्ताप’ ऐसे अलग-अलग नामों से जाना जाता है। जैन धर्म के शास्त्रों का सार भी ‘प्रतिक्रमण’ और ‘प्रत्याख्यान’ है। प्रतिक्रमण केवल किसी एक धर्म तक सीमित खयाल नहीं है लेकिन गलत कार्य होने के पश्चात् माफी माँगने और वैज्ञानिक रीति से खुद के क्रोध-मान-माया-लोभ रूपी कषायों से बंधते पाप से मुक्त होने का मार्ग है।
अपने जीवनकाल के दौरान हम संयोगों के दबाव में ऐसी परिस्थिति में फँस जाते हैं कि भूलें नहीं करनी हों फिर भी भूलों से मुक्त नहीं हो पाते और लगातार उलझन में रहते हैं। हम सभी को भूलों से छुटकारा पाने का और जीवन जीने का सच्चा मार्ग मिल जाए उसके लिए ज्ञानियों ने प्रतिक्रमण रूपी हथियार दिया है, जिसके द्वारा हम आंतरिक सुख-चैन में रहकर प्रगति कर सकते हैं और विकसित दोषरूपी विशाल वृक्ष को मुख्य जड़ समेत निर्मूल कर सकते हैं।
यहाँ हम रोज़मर्रा के जीवन व्यवहार में प्रतिक्रमण से पाप बंधने कैसे रुकते हैं इसकी विस्तृत समझ प्राप्त करेंगे। साथ ही साथ परम पूज्य दादा भगवान द्वारा दिए गए प्रतिक्रमण का सही अर्थ, उसकी सही रीत और उसका महत्त्व भी समझेंगे।


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Q. प्रतिक्रमण करने का महत्त्व क्या है?
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