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अनंत काल से, जब भी श्री महावीर भगवान, श्री कृष्ण भगवान या श्री राम भगवान जैसे ‘सच्चे ज्ञानी’ हाज़िर होते हैं, तब आत्मधर्म अस्तित्व में होता है और उसका पालन भी किया जाता है। लेकिन, ज्ञानियों की अनुपस्थिति में मतभेद हो जाते हैं, जिसके कारण धर्म अलग-अलग पंथ, संप्रदाय और जाति-पाँति में बँट जाता है। इसीलिए, समाज की शांति और एकता छिन्न-भिन्न हो जाती है।

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परम पूज्य दादा भगवान ‘आत्मधर्म’ का पालन करते थे और उन्होंने इसी आत्मज्ञान को लोगों तक पहुँचाया। जब तक घर में मतभेद होते हैं, तब तक घर में किसी को शांति नहीं मिलती; वैसे ही, इस दुनिया में जब तक धर्म में मतभेद रहेंगे, तब तक दुनिया में शांति नहीं रह सकती। परम पूज्य दादा भगवान ने धर्म और समाज में चल रहे ‘मेरे-तेरे’ के झगड़ों को खत्म करने और इसके जोखिम के प्रति लोगों को जागृत करने के बहुत प्रयास किए थे। परम पूज्य दादा भगवान ने जगत् कल्याण के महान यज्ञ में एक क्रांतिकारी कदम रखा। उन्होंने धर्म में मतभेद मिटाने के लिए भव्य निष्पक्षपाती त्रिमंदिर की स्थापना कर के जैन, शैव और वैष्णव जैसे धर्मों को एक प्लेटफ़ॉर्म पर रखकर मतभेद वाली दृष्टि को निर्मूल कर दिया। जिसमें एक तरफ श्री कृष्ण भगवान और दूसरी तरफ शिव भगवान और बीच में वर्तमान तीर्थंकर श्री सीमंधर स्वामी हैं। इस निष्पक्षपाती त्रिमंदिर में हर एक संप्रदाय के लोग किसी भी जाति-पाँति के भेदभाव के बगैर आ सकते हैं। मंदिर में आने वाले हर एक दर्शनार्थी को ऐसा ही लगता है कि ये मेरे ही भगवान हैं।

परम पूज्य दादा भगवान ने कहा था कि जगह-जगह सीमंधर स्वामी के मंदिर बनेंगे तब दुनिया का नक्शा कुछ और ही होगा!

निष्पक्षपाति भगवान

लोगों ने खुद भगवान और धर्मो को विभाजित किया है| किसी एक भगवान को चुनने से बेहतर हम सभी धर्मो का मूल सिद्धांत समझ ले और उसका अनुसरण करे| सभी देवताओं ने हमें आत्मा और आत्मसाक्षात्कार का महत्त्व बताया है|

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