यथार्थ ब्रह्मचर्य वही है जो आपको मोक्ष प्राप्ति में सहायक हो।
अगर आप बगैर किसी लक्ष्य के चल रहें हैं तो आपको पता नहीं चलेगा कि आप कहाँ पहुँच रहें है या किसलिए वहाँ जा रहें हैं। किन्तु यदि आप मन में एक लक्ष्य निर्धारित करके चलते हैं तो निश्चित ही वहाँ पहुँचेंगे। ठीक इसी तरह, ब्रह्मचर्य का पालन भी लक्ष्य निर्धारित करके सही समझ के साथ ही करना चाहिए। ब्रह्मचर्य के फलस्वरूप यदि मोक्ष नहीं मिल रहा हो तो वह ब्रह्मचर्य नसबंदी के बराबर ही है। फिर भी उससे शरीर अच्छा रहता है, मजबूत रहता है, रूपवान बनते हैं, ज्यादा जीते हैं। लेकिन वह अंतिम ध्येय नहीं है।
परम पूज्य दादाश्री ब्रह्मचर्य का पालन कैसे किया जाए इसका प्रत्यक्ष मार्गदर्शन देते है।
प्रश्नकर्ता: शादी करने की इच्छा ही नहीं होती मुझे।
दादाश्री : ऐसा ? तो शादी किए बिना चलेगा ?
प्रश्नकर्ता : हाँ, मेरी तो ब्रह्मचर्य की ही भावना है। उसके लिए कुछ शक्ति दीजिए, समझ दीजिए।
दादाश्री : उसके लिए भावना करनी पड़ेगी। तू रोज बोलना कि, ‘हे दादा भगवान ! मुझे ब्रह्मचर्य पालन करने की शक्ति दीजिए।’ और विषय का विचार आते ही निकाल देना। नहीं तो उसका बीज डल जाएगा। वह बीज यदि दो दिन तक रहे, तब तो मार ही डालेगा। फिर से उगेगा। इसलिए विचार आते ही उखाड़कर फेंक देना और किसी भी स्त्री पर दृष्टी नहीं गड़ाना। दृष्टी आकृष्ट हो जाए तो हटा देना और दादा को याद करके माफ़ी मांग लेना। यह विषय आराधन करने जैसा ही नहीं, ऐसा भाव निरंतर रहे तो फिर खेत साफ़ हो जाएगा। और अभी भी हमारी निश्रा में रहे तो उसका सबकुछ पूरा हो जाएगा।
जिसे ब्रह्मचर्य पालन करना ही है, उसे तो संयम की खूब परीक्षा करके देख लेना चाहिए। कसौटी पर कस कर देख लेना चाहिए और यदि ऐसा लगे कि फिसल पड़ेगा तो शादी कर लेना अच्छा है। फिर भी वह कंट्रोलपूर्वक होना चाहिए। शादी करनेवाली से कह देना पड़ेगा कि मेरा ऐसा कंट्रोलपूर्वक का है।
जिन्हें ब्रह्मचर्य पालन करने की भावना है उन्हें परम पूज्य दादा भगवान ने निम्नलिखित प्रार्थना रोज करने सलाह दी है।
“ हे दादा भगवान ! मुझे, किसी भी देहधारी जीवात्मा के प्रति स्त्री, पुरुष या नपुंसक, कोई भी लिंगधारी हो, तो उसके संबंध में किंचितमात्र भी विषय-विकार संबंधी दोष, इच्छाएँ, चेष्टाएँ, या विचार संबंधी दोष न किए जाएँ, न करवाए जाएँ या कर्ता के प्रति अनुमोदना न की जाए, ऐसी परम शक्ति दीजिए।”
इस प्रार्थना के द्वारा हम ब्रह्मचर्य का पालन करने के लिए, ‘विषय में सुख है’ वह मान्यता दूर करने के लिए और भविष्य में विषय की इच्छा न हो उसके लिए शक्तियाँ माँगते हैं।
अब्रह्मचर्य के विचार आएँ लेकिन ब्रह्मचर्य की शक्तियाँ माँगता रहें तो वह बहुत बड़ी बात है। ब्रह्मचर्य की शक्तियाँ माँगते रहने से किसी को दो साल में, किसी को पाँच साल में, लेकिन वैसा उदय आ जाता है। जिसने अब्रह्मचर्य जीत लिया उसने पूरा जगत जीत लिया। ब्रह्मचर्यवाले पर तो शासन देवी-देवता बहुत खुश रहते हैं।
विषय-विकार में से छूटने के लिए आपको निम्नलिखित चार स्टेप्स का अपनाने पड़ेंगे।
स्टेप 1: आपका अभिप्राय 100% बदलें
विषय-विकार अच्छी चीज़ है या विषय-विकार में सुख है, ऐसा आपका जो अभिप्राय है उसे बदलें। आपका अभिप्राय 100% बदलें। आपका यह अभिप्राय होना चाहिए कि ‘विषय-विकार 100% गलत चीज़ है, मुझे अपने मन, वचन और काया के द्वारा किसी भी प्रकार के विषय-विकार का भोग नहीं करना है।’
स्टेप 2 : विषय-विकार में किस तरह सुख नहीं है उसका पृथक्करण करें
‘विषय-विकार में किस तरह सुख नहीं है’ इसका पृथक्करण करने के लिए विषय-विकार के जोखिम और ब्रह्मचर्य के फायदे का लिस्ट बनाएँ:
i) विषय-विकार आपके लिए आध्यात्मिक, मानसिक, शारीरिक, धार्मिक, आर्थिक और सामाजिक तौर पर किस तरह से नुकसानदेह है, उसका लिस्ट तैयार करें। आपको इन सभी बातों का अभ्यास करना पड़ेगा: विषय-विकार किस प्रकार गलत है ? यह किस प्रकार नुकसानदेह है ?
ii) ब्रह्मचर्य पालन के फायदे की लिस्ट बनाएँ: ब्रह्मचर्य किस प्रकार हितकारी है ?
स्टेप 3: किसी भी प्रकार से विषय-विकार का भोग किया हो तो उसके लिए माफ़ी माँगें।
जब भी आपने अपने विचार, वाणी या वर्तन के द्वारा किसी भी प्रकार से विषय-विकार का भोग किया हो तो उसके लिए माफ़ी माँगें ‘ हे दादा भगवान ! मुझे माफ़ कीजिए।’ विषय-विकार से पूर्णत: छूटने के लिए शक्ति माँगें, ‘ हे दादा भगवान ! मुझे हर तरह के विषय-विकार में से छूटने की शक्ति दीजिए। मैं विषय-विकार में नहीं पड़ना चाहता।’
स्टेप 4: विषय-विकार संबंधी भूलों का रक्षण ना करें
अगर कोई आपसे कहे कि आप जो विषय-विकार का भोग करते हैं वह गलत करते हैं तो उनके साथ तर्क-वितर्क न करें और यह कह कर अपनी गलती का रक्षण न करें कि, ‘ मेरी गलती मत निकालो, खुद की गलती देखो।’ ऐसा करके आप अपनी भूल का रक्षण करते हैं और सामनेवाले पर आरोप लगाते हैं। आपको ऐसा नहीं करना चाहिए। इसके बजाय आपको स्वीकार कर लेना चाहिए कि, ‘यह मेरी कमज़ोरी है और मैं इससे छूटना चाहता हूँ।’ अगर आप अपनी गलती का रक्षण करते हैं तो उसकी आयु अपने आप ही बीस साल और बढ़ जाएगी। आपको अपनी गलती का रक्षण नहीं करना चाहिए। इसके बजाय आपको स्वीकार कर लेना चाहिए, ‘यह मेरी भूल है, मुझे यह गलती नहीं करनी चाहिए।’
मान लिजिए कि आइसक्रीम खाने के बाद आप चीनी वाली चाय पीते हैं। पीते ही आप तुरंत बोल पड़ेगे ‘यह चाय तो फीकी है।’ आप जानते हैं कि चाय में चीनी तो डली है फिर भी आपको चाय फीकी क्यों लगी? क्योंकि आइसक्रीम में चाय की अपेक्षा ज्यादा चीनी होती है इसलिए आपको चाय में चीनी का स्वाद नहीं आया ऐसा ही अब्रह्मचर्य का है। एक बार आप विषयभोग से मिलने वाले आनंद की अपेक्षा ज्यादा आनंद की अनुभूति कर लेंगे तो उसके बाद कोई भी चीज़ या व्यक्ति आपके ब्रह्मचर्य पालन के निश्चय को हिला नहीं पाएगा। लेकिन यह कैसे संभव है ? इसमें ज्ञानविधि द्वारा खुद के शुद्धात्मा के अनंत सुख का अनुभव करने के बाद ‘विषय-विकार में सुख है’, यह मान्यता टूट जाएगी इसमें कोई संदेह नहीं!
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प्रश्नकर्ता : कभी-कभी ऐसा होता है कि मैं शारीरिक आकर्षण और विकारी विचारों में तन्मयाकार हो जाता हूँ। उस समय मुझे क्या करना चाहिए ?
दादाश्री : मैंने जो प्रयोग किया था, वही प्रयोग इस्तेमाल करना। हमें वह प्रयोग निरंतर रहता ही है। ज्ञान होने से पहले भी हमें जागृति रहती थी। किसी स्त्री ने ऐसे सुंदर कपड़े पहने हों, दो हज़ार की साड़ी पहनी हो तो भी देखते ही तुरंत जागृति आ जाती है, इससे नेकेड (नग्न) दिखता है। फिर दूसरी जागृति उत्पन्न हो तो बिना चमड़ी का दिखता है और तीसरी जागृति में फिर पेट काट डालें तो भीतर आँतें नज़र आती हैं, आँतों में क्या परिवर्तन होता है वह दिखता है। खून की नसें नज़र आती हैं अंदर में, संडास नज़र आती है, इस प्रकार सारी गंदगी दिखती है। फिर विषय होता ही नहीं न! इनमें आत्मा शुद्ध वस्तु है, वहाँ जाकर हमारी दृष्टि रुकती है, फिर मोह किस प्रकार होगा?
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