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विषय के आकर्षण का विश्लेषण।

चोरी करने अच्छा लगता है? झूठ बोलना, मरना पसंद आता है? फिर परिग्रह क्यों पसंद है विषय में ऐसा क्या है कि पसंद आता है?

प्रश्नकर्ता : बिलकुल पसंद ही नहीं है, फिर भी आकर्षण हो जाता है, इसके लिए बड़ा खेद रहा करता है।

दादाश्री : ऐसा खेद रहने पर विषय नष्ट होगा। एक आत्मा ही चाहिए फिर विषय क्यों होगा? और कुछ चाहिए तो विषय होगा न? विषय का पृथ्थकरण करना आता है क्या?

प्रश्नकर्ता : आप बताईए।

दादाश्री : पृथ्थकरण माने क्या? आँख को विषय भाता है? कान को सुनना सुहाता है? जीभ से चाटने पर मीठा लगता है? एक भी इन्द्रिय पसंद नहीं करती। यह नाक को तो बड़ा मज़ा आता होगा न? बहुत सुगंध आती होगी नहीं? इत्र लगा होता है न वहाँ? मतलब ऐसा पृथ्थकरण करने पर पता चले। सारा नर्क ही भरा पड़ा है वहाँ। मगर ऐसा पृथ्थकरण नहीं करने से लोग उलझे हुए हैं, वही मोह होता है, यह भी अजूबा है न!

प्रश्नकर्ता : वह आकर्षण किसका रहता है?

दादाश्री : नासमझी का। नासमझी का तार जोइन्ट रह गया हो तो उसका आकर्षण रहा करे। मगर अब तो समझ में आ गया कि यह ऐसा है। पहले तो हमें सच्चाई मालूम नहीं थी न, और ऐसा पृथ्थकरण भी नहीं किया था न? लोगों ने माना वैसे हमने भी सच मान लिया की यही सही रास्ता है, पर अब सच्चाई का पता चल गया और समझ में आ गया कि इसमें तो पोलवाला खाता है। अहहह! इसमें तो इतने सारे जोखिम है कि इसी वजह से तो यह संसार खड़ा रहा है और सारा दिन मार भी इसकी वजह से ही पड़ती है। उसमें भी इन्द्रियों को पसंद हो तो ठीक था मगर यह विषय एक भी इन्द्रिय को पसंद नहीं है।

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