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विषय का आकर्षण क्यों होता है?

विषय की गंदगी में लोग पड़े हैं। विषय के समय उजाला करें तो खुद को भी अच्छा न लगे। उजाला हो तो डर जाए, इसलिए अंधेरा रखते हैं। उजाला हो तो भोगने की जगह देखना अच्छा नहीं लगता। इसलिए कृपालुदेव ने भोगने के स्थान के संबंध में क्या कहा है?

प्रश्नकर्ता : 'वमन करने योग्य भी चीज़ नहीं है।'

प्रश्नकर्ता : फिर भी स्त्री के अंग की ओर आकर्षण होने का क्या कारण होगा?

दादाश्री : हमारी मान्यता, रोंग बिली़फ हैं, इस वज़ह से। गाय के अंग के प्रति क्यों आकर्षण नहीं होता है? केवल मान्यताएँ; और कुछ होता नहीं है। मात्र बिली़फ हैं। बिली़फ तोड़ डालें तो कुछ भी नहीं है।

प्रश्नकर्ता : वह मान्यता खड़ी होती है, वह संयोग के मिलने के कारण होती है?

दादाश्री : लोगों के कहने से हमें मान्यता होती है और आत्मा की उपस्थिति में मान्यता होती है इसलिए दृढ़ हो जाती है वर्ना उसमें ऐसा क्या है? केवल मांस के लौंदे हैं!

मन में विचार आए, वह विचार अपने आप ही आते रहते हैं, उसे हम प्रतिक्रमण से धो डालें। फिर वाणी में ऐसा नहीं बोलना कि विषयों का सेवन बहुत अच्छा है और वर्तन में भी ऐसा मत रखना। स्त्रियों की ओर दृष्टि मत करना। स्त्रियों को देखना नहीं, छूना नहीं। स्त्री को छू लिया हो तो भी मन में प्रतिक्रमण हो जाना चाहिए कि 'अरे, इसे कहाँ छूआ!' क्योंकि स्पर्श से विषय का असर होता है।

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