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वैवाहिक जीवन में अणहक्क के विषय और व्यभचिार के क्या परिणाम होते है

पति-पत्नी के रिश्ते को कुदरत ने एक्सेप्ट किया है। उसमें यदि अणहक्क (अवैध) संबंध की इच्छा न हो तो हर्ज नहीं है। कुदरत ने उतना चलने दिया है। यदि आप संसारी हैं तो अपने हक़ का विषय भोगना, लेकिन अणहक्क (बिना हक़ का, अवैद्य) का विषय तो भोगना ही मत। क्योंकि इसका फल भयंकर है। अणहक्क का ले लेना, अणहक्क की इच्छा करना, अणहक्क के विषय भोगने की भावना करना, वह सब पाशवता कहलाती है। हक़ (वैद्य) और अणहक्क इन दोनों के बीच में लाइन ऑफ डिमार्केशन तो होनी चाहिए न ? और उस डिमार्केशन लाइन से बाहर निकलना ही नहीं चाहिए। फिर भी लोग डिमार्केशन लाइन से बाहर निकले हैं न?! वही पाशवता कहलाती है। हक़ का भोगने में हर्ज नहीं है।

वैवाहिक जीवन में अणहक्क के विषय तथा व्यभिचार की अनजानी हकीकत

लोग आज भी अणहक्क के विषय के भयंकर जोखिमों से अनभिज्ञ हैं। परम पूज्य दादा भगवान ने इन जोखिमों के बारे में बताया है जिससे लोगों को वास्तविकता का पता चले। ये तथ्य इस प्रकार हैं :

  • अवैध संबंध रखने का अर्थ यह है कि आप अपनी सीमा पार कर रहे हैं तथा जगत् द्वारा बनाए हुए नियमों (सिद्धांतो) के विरूद्ध जा रहे हैं, फिर भले आप किसी भी जाति या धर्म के हों।
  • एक बार पकड़े गए तो आपने जो किया है उसके लिए आपको जीवनभर शर्म और अपराधबोध के साथ जीना होगा। इस कृत्य से आपके परिवार वालें और निकट संबंधियों को ठेस पहुँचेगी और वे भी बहुत दुःखी होंगे।
  • लोगों की नज़रों में आप हमेशा के लिए गिर जाएँगे, आपकी आप पर उंगली उठेगी, लोग आपके बारे में बातें करेंगे।
  • आप हमेशा चिंता और तनाव में रहेंगे क्योंकि आप जानते हैं की आप गलत कर रहे हैं।
  • अणहक्क के विषय में आप अनंत पापकर्म बांधते हैं।
  • जिस पल आपने अणहक्क का लिया, तभी से आप अपनी मानवता खो देते हैं।
  • महामुश्किल से प्राप्त यह मानव देह गँवा देंगे।
  • अणहक्क के विषय में तो पाँचों महाव्रत भंग हो जाते हैं। उसमें हिंसा होती है, झूठ होता है, चोरी यानी यह तो सरेआम चोरी है। फिर अब्रह्मचर्य तो है ही और पाँचवाँ है परिग्रह, यह तो सबसे बड़ा परिग्रह है। हक़ के विषयवालों के लिए मोक्ष है, लेकिन अणहक्क के विषयवालों के लिए मोक्ष नहीं है, ऐसा भगवान ने कहा है।
  • परम पूज्य दादाश्री कहते हैं, परस्त्री के तो कितने सारे जोखिम हैं! वह जहाँ जाएगी, वहाँ आपको जाना पड़ेगा, उसे माँ बनाना पड़ेगा! आज कई बेटे ऐसे हैं कि जो पूर्वभव की अपनी रखैल की कोख से जन्मे हैं। वह मुझे ज्ञान में भी दिखा है। बेटा ऊँची कौम का होता है और माँ नीची कौम की होती है, माँ नीची कौम में जाती है और बेटा ऊँची कौम में से नीची कौम में आ जाता है। देखो भयंकर जोखिम! पिछले जन्म में जो पत्नी थी, वही इस जन्म में माँ बनती है। और इस जन्म में माँ हो तो वह अगले जन्म में पत्नी बनती है। ऐसे जोखिमवाला है यह जगत्! बात को संक्षेप में समझ जाना! प्रकृति विषयी नहीं है, यह बात मैंने दूसरे अर्थ में कही थी। लेकिन यह तो हम पहले से कहते आए हैं कि सिर्फ यही एक जोखिम है।
  • जितना श्वासोश्वास अधिक खर्च होता है उतना आयुष्य कम होता जाता है। किसमें श्र्वासोश्वास सबसे अधिक खर्च होता है? भय में, क्रोध में, लोभ में, कपट में और तो सबसे अधिक स्त्री संग में खर्च होता है। लेकिन उससे भी अधिक परस्त्री संग में होता है।
  • हम किसी का भोग लेंगे तो हमारी बेटियों को कोई अन्य भोग लेगा, उसकी चिंता ही नहीं है न! और ऐसा ही हो रहा है न?! उसकी बेटियों को लोग भोगते ही हैं न? यह बड़ी नालायकी कहलाती हा टोपमोस्ट नालायकी कहलाती है।
  • जो व्यक्ति अणहक्क का विषय भोगता है, वह कभी भी सुखी नहीं रह सकता और उसे भंयकर यातनाएँ भोगनी पड़ती है।
  • जो व्यक्ति अपनी पत्नी के सिवाय (अणहक्क) के विषय में आनंद लेता है, वह कभी सुखी नहीं रह सकता, उसे भंयकर दुःख भुगतने पड़ते है।
  • लोग तो आनंद से अणहक्क का भोगते है। इसलिए पक्की गाँठ लगा लेते है, जिससे कई जन्म बिगाड़ लेते है।
  • परस्त्री और परपुरुष गमन पूर्णतः निषेध है। अणहक्क का विषय भोगने से नर्क गति का अधिकारी बनता है।
  • यदि कोई विवाहित हो और अणहक्क के विषय में पड़े, तो उसकी पत्नी / पति उस पर दावा करेंगे, बैर बाँधेंगे । बहुत से पुरुष स्त्रीयों को जला देते हैं। स्त्रीयाँ भी पुरुषों को ज़हर दे देती हैं। इस तरह बैर बाँधते हैं।

अणहक्क के विषय भोगने की इच्छा करना, वहाँ पर जानवर गति है। हमारे मन में होता है कि हमे क्या होने वाला है? इसलिए भय नहीं रखते। लेकिन संसार तो भय का कारखाना है। इसलिए सावधानी पूर्वक चलना। भयंकर कलियुग है। दिन ब दिन उतरता काल आ रहा है, विचार वगैरह बिगड़ते जाएँगे। इसलिए मोक्ष के बारे में बातें करोगे तो कुछ काम बनेगा। इसीलिए तो सयाने पुरुष ब्रह्मचर्य का पालन करके मोक्ष में चले गए न!

स्त्रीयों का शील लूटने वालें नर्क के अधिकारी हैं।

प्रश्नकर्ता : नर्क में ज़्यादातर कौन जाता है?

दादाश्री : शील के लुटेरों के लिए सातवाँ नर्क है। जितनी मिठास आई थी उससे अनेक गुना कड़वाहट का अनुभव करे, तब वह तय करता है कि अब वहाँ नर्क में नहीं जाना है। यानी इस जगत् में यदि नहीं करने जैसा कुछ है तो वह यह है कि किसी का शील मत लूटना। कभी भी दृष्टि मत बिगड़ने देना। शील लूटने के बाद नर्क में जाएगा और वहाँ मार खाता रहेगा। इस दुनिया में शील जैसी उत्तम कोई चीज़ है ही नहीं। इस दुनिया में शीलवान जैसी उत्तम चीज़ कुछ भी नहीं।

सच्चे पछतावे प्रतिक्रमण द्वारा स्वयं को मुक्त करो

जिन लोगों ने अणहक्क के विषय में पड़कर भयंकर जोखिमदारी ले ली है, लेकिन इस भयंकर जिम्मेदारी में से मुक्त होना चाहते है, तो उनके लिए रास्ता है। प्रत्यक्ष ज्ञानी पुरुष के पास अपने दोषो का हृदयपूर्वक पछतावा (आलोचना) करके। ज्ञानी पुरुष संपूर्ण रूप से शुद्ध होते है और विषय से पूर्णत: मुक्त होते हैं। इसके अलावा, आपकी गलती से बाहर निकलने में आपकी मदद करने के लिए उनका कोई स्वार्थ या कोई व्यक्तिगत लाभ नहीं होता है। इसलिए आप निश्चिंत होकर उन पर विश्वास कर सकते हैं कि वे आपकी बात किसी को नहीं बताएंगे। केवल प्रत्यक्ष ज्ञानी ही आपको मुक्त कर सकते है, लेकिन आपको हृदयपूर्वक पश्चाताप और दृढ़ निश्चय होना चाहिए कि ऐसी भूल फिर से नहीं होगी।

परम पूज्य दादाश्री कहते हैं कि पछतावे में जलेगा, तब भी पाप खत्म हो जाएँगे। दो-चार लोग यह बात सुनकर मुझसे पूछने लगे कि, हमारा क्या होगा? मैंने कहा ‘अरे! भाई मैं तेरा सबकुछ ठीक कर दूँगा। तू आज से समझदार बन जा।’ जागे तभी से सवेरा। उसकी नर्कगति उड़ा दूँगा, क्योंकि मेरे पास सभी रास्ते हैं, मैं कर्ता नहीं हूँ इसलिए। यदि मैं कर्ता हो जाऊँ तो मुझे बंधन है। मैं आपको ही बताता हूँ कि अब ऐसा करो आप। उससे फिर सब खत्म हो जाता है और ऐसे ही कुछ अन्य विधियाँ करते हैं।

परम पूज्य दादा भगवान अधिक दृढ़ता से कहते हैं:

प्रश्नकर्ता : आपके पास ऐसे लोग आते हैं कि जो उनके खुद के पिछले हुए दोषों की आपसे आलोचना करते हैं तो आप उन्हें छुड़वा देते हैं?

दादाश्री : मुझ से आलोचना करे तो मेरे साथ अभेद हुआ कहलाएगा। हमें तो छुड़वाना ही पड़ेगा। आलोचना करने का अन्य कोई स्थान ही नहीं है, यदि स्त्री को बताने जाए तो स्त्री चढ़ बैठे, मित्र को बताने जाए तो मित्र चढ़ बैठे, खुद अपने आपसे कहने जाए तो खुद ही चढ़ बैठता है उल्टा इसलिए किसी को नहीं बताता और हल्का नहीं हो पाता इसलिए हमने आलोचना का सिस्टम (पद्धति) रखा है।

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