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अवैध संबंधों के परिणाम क्या हैं?

यदि तू संसारी है तो तेरे ह़क का विषय भोगना, परंतु बिना ह़क का विषय तो मत ही भोगना, क्योंकि उसका फल भयंकर है। और यदि तू त्यागी हो तो तेरी विषय की ओर दृष्टि ही नहीं जानी चाहिए। बिना ह़क का ले लेना, बिना ह़क की इच्छा रखना, बिना ह़क के विषय भोगने की भावना करना, वे सभी पाशवता कहलाएँ। ह़क और बिना ह़क, इन दोनों के बीच लाईन ऑफ डिमार्केशन (भेदरेखा) तो होनी चाहिए न? और उस डिमार्केशन लाईन के बाहर निकलना ही नहीं। फिर भी लोग डिमार्केशन लाईन के बाहर निकले हैं न? वही पाशवता कहलाती है।

प्रश्नकर्ता : बिना ह़क का भोगने में कौन-सी वृत्ति घसीट ले जाती है?

दादाश्री : हमारी नियत चोर है, वह वृत्ति।

ह़क का छोड़कर दूसरी किसी जगह पर 'प्रसंग' हुआ तो वह स्त्री जहाँ जाए, वहाँ हमें जन्म लेना पड़ता है। वह अधोगति में जाए तो हमें वहाँ जाना पड़े। आजकल बाहर तो सब यही चल रहा है। 'कहाँ जन्म होगा' उसका कोई ठिकाना ही नहीं है। बिना ह़क के विषय जिसने भोगे, उसे तो भयंकर यातनाएँ भुगतनी पड़ती है। उसकी बेटी भी किसी एक जन्म में चरित्रहीन होती है। नियम कैसा है कि जिसके साथ बिना ह़क के विषय भोगे होंगे वही फिर माँ अथवा बेटी बनती है।

ह़क के विषय के लिए तो भगवान ने भी मना नहीं किया है। भगवान मना करें तो भगवान गुनहगार ठहरें। बिना ह़क के लिए तो मना ही है। यदि पछतावा करे तो भी छूट जाए। लेकिन ये तो बिना ह़क का आनंद के साथ भोगते हैं, इसलिए गाँठ पक्की हो जाती है।

बिना ह़क का भोगने में तो पाँचों महाव्रतों का दोष आ जाता है। उसमें हिंसा होती है, झूठ आ जाता है, यह खुलेआम चोरी कहलाती है। बिना ह़क का तो सरेआम चोरी कहलाता है। फिर अब्रह्मचर्य तो है ही और पाँचवा परिग्रह। यह तो सबसे बड़ा परिग्रह है। ह़क के विषयवालों का मोक्ष है मगर बिना ह़क के विषयवालों का मोक्ष नहीं है, ऐसा भगवान ने कहा है।

इन लोगों को तो कोई होश ही नहीं होता न! हरहा (भागा फिरनेवाला निरंकुश पशु, जिसका कोई मालिक न हो) की तरह होते हैं। हरहा का मतलब आप समझ गए? आपने देखा है कोई हरहा? हरहा यानी जिसका हाथ में आए उसका खा जाए। ऐसे भैंस-बंधु को आप जानते हैं न? वे सभी खेतों का सफाया ही कर देते हैं।

बहुत कम लोग हैं कि जिन्हें इसका कुछ महत्व समझ में आया है। बाकी तो जब तक मिला नहीं तब तक हरहा नहीं हुए! मिला कि हरहा होते देर नहीं लगती। यह हमें शोभा नहीं देता। हमारे हिन्दुस्तान की कैसी विकसित प्रजा! हमें तो मोक्ष पाना है।

अब्रह्मचर्य का तो ऐसा है कि इस जन्म में पत्नी हुई हो, अथवा तो दूसरी रखैल हो तो अगले जन्म में खुद की बेटी बनकर आए ऐसी इस संसार की विचित्रता है! इसीलिए तो समझदार पुरुष ब्रह्मचर्य का पालन करके मोक्ष में गए हैं न!

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