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हम क्लेश मुक्त जीवन कैसे जी सकते हैं?

दादाश्री : हाँ, तो उतना हमें सुधार लेना है! मेरा क्या कहना है कि, किसलिए हम बिगाडें? किसी भी प्रसंग को बिगाड़ना हमें शोभा नहीं देता। ये सारे ट्रैफिक के लॉज़ के आधार पर चलते हैं, वहाँ खुद की समझ से कोई नहीं चलता न? लेकिन इसमें अपनी समझ से ही चलते हैं। कोई कानून नहीं? उसमें (ट्रैफिक में) कभी भी अड़चन नहीं आती, वह कैसा सुंदर ट्रैफिक का प्रबंध है! अब इन नियमों को यदि आप समझकर चलो तो फिर से कोई अड़चन नहीं आएगी। अर्थात् इन नियमों को समझने में भूल है। नियम समझानेवाला समझदार होना चाहिए।

इन ट्रैफिक के नियमों का पालन करने का आपने निश्चय किया होता है तो कैसा सुंदर पालन होता है! उसमें क्यों अहंकार जागृत नहीं होता कि वे भले ही कुछ भी कहें लेकिन हम तो ऐसा ही करेंगे। क्योंकि उन ट्रैफिक के नियमों को वह खुद ही अपनी बुद्धि से इतना अधिक समझ सकता है, स्थूल हैं इसलिए, कि हाथ कट जाएगा, तुरंत मर जाऊँगा। उसी प्रकार टकराव करने पर इसमें मर जाऊँगा, यह मालूम नहीं है। इसमें बुद्धि नहीं पहुँच सकती। यह सूक्ष्म बात है। इसके सभी नुकसान सूक्ष्म होते हैं।

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