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टकराव के क्या परिणाम आते हैं?

सारी आत्मशक्ति यदि खत्म होती हो, तो वह घर्षण से। ज़रा भी टकराए तो खत्म। सामनेवाला टकराए, तब हमें संयमपूर्वक रहना चाहिए। टकराव तो होना ही नहीं चाहिए। फिर चाहे यह देह भी जाना हो तो जाए, मगर टकराव में नहीं आना चाहिए। यदि सर्फ घर्षण न हो, तो मनुष्य मोक्ष में चला जाए। किसी ने इतना ही सीख लिया कि 'मुझे घर्षण में नहीं आना है', तो फिर उसे गुरु की या किसी की भी ज़रूरत नहीं है। एक या दो जन्मों में सीधे मोक्ष में जाएगा। 'घर्षण में आना ही नहीं है' ऐसा यदि उसकी श्रद्धा में बैठ गया और निश्चय ही कर लिया, तब से ही वह समकित हो गया! अर्थात् यदि किसीको समकित करना हो तो हम गारन्टी देते हैं कि जाओ, घर्षण नहीं करने का निश्चय कर लो, तभी से समकित हो जाएगा। देह का टकराव हुआ हो और चोट लगी हो तो इलाज करने से ठीक हो जाएगा। लेकिन घर्षण और संघर्षण से मन में जो दा़ग पड़ गए हों, बुद्धि पर दा़ग पड़े हों, उन्हें कौन निकालेगा? हजारों जन्मों तक भी नहीं जाएँगे।

प्रश्नकर्ता : घर्षण और संघर्षण से मन और बुद्धि पर घाव पड़ते हैं?

दादाश्री : अरे! मन-बुद्धि पर तो क्या, पूरे अंतःकरण पर घाव पड़ते रहते हैं और उसका असर शरीर पर भी होता है। घर्षण से तो कितनी सारी मुश्किलें हैं।

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