Related Questions

क्या आकर्षण विकर्षण ही टकराव का कारण है?

प्रश्नकर्ता : लेकिन कई बार हमें द्वेष नहीं करना हो, फिर भी द्वेष हो जाता है, उसका क्या कारण है?

दादाश्री : किसके साथ?

प्रश्नकर्ता : पति के साथ ऐसा हो तो?

दादाश्री : वह द्वेष नहीं कहलाता। जो आसक्ति का प्रेम है, वह सदैव रिएक्शनरी होता है। इसलिए यदि चिढ़ गए तो वह फिर उल्टा चलेंगे। उल्टा चले तो कुछ समय दूर रहेंगे और फिर प्रेम का उफान आएगा। और फिर प्रेम में चोट लगने पर टकराव होगा। तब फिर प्रेम बढ़ता है। जहाँ अत्यधिक प्रेम होता है, वहाँ बखेड़ा होता है। अर्थात् जहाँ भी बखेड़ा होता रहता हो, वहाँ इन लोगों को भीतर से प्रेम होता है। वह प्रेम हो तभी बखेड़ा होता है। पूर्वजन्म का प्रेम हो, तभी बखेड़ा होता है। ज़रूरत से ज़्यादा प्रेम है, वर्ना बखेड़ा होता ही नहीं! इस बखेडे़ का स्वरूप ही ऐसा है।

उसे लोग क्या कहते हैं? 'टकराव की वजह से ही हमारा प्रेम है।' तो बात सही भी है वह आसक्ति टकराव की वजह से ही हुई है। जहाँ टकराव कम हो, वहाँ आसक्ति नहीं होती है। जिस घर में स्त्री-पुरुष के बीच टकराव कम है, वहाँ आसक्ति कम है, ऐसा समझ लेना। समझ में आए ऐसी बात है न?

प्रश्नकर्ता : संसार व्यवहार में कभी जो अहम् रहता है, तो उसकी वज़ह से चिंगारियाँ बहुत निकलती हैं।

दादाश्री : वे अहम् की चिंगारियाँ नहीं है। वे दिखती तो हैं अहम् की चिंगारियाँ, मगर वह 'विषय'(विकार) के अधीन होता है। विषय नहीं होगा, तो यह भी नहीं होगा। विषय बंद हो जाए, उसके बाद वह सारा इतिहास ही बंद हो जाएगा। इसलिए अगर कोई साल भर के लिए ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करें, तो उनसे मैं पूछता हूँ। तब वे कहते हैं, 'जीवन में ज़रा भी तकरार नहीं, किच-किच नहीं, खटखट नहीं, कुछ भी नहीं, स्टेन्ड स्टिल!' मैं पूछता हूँ फिर, मैं जानता हूँ कि ऐसा हो जाता है। यानी वह विषय के कारण होता है।

प्रश्नकर्ता : पहले तो हम ऐसा समझते थे कि घर के कामकाज़ की वज़ह से टकराव होता होगा। लेकिन घर के काम में हेल्प करने के बावजूद भी टकराव होता है।

दादाश्री : वे सब टकराव होंगे ही। जब तक यह विकारी मामला है, सम्बन्ध हैं, तब तक टकराव होंगे ही। टकराव का मूल ही यह है। जिसने विषय को जीत लिया, उसे कोई नहीं हरा सकता। कोई उसका नाम भी नहीं ले सकता। उसका प्रभाव पड़ता है।

×
Share on
Copy