परम पूज्य दादा भगवान कहते हैं, “अतिक्रमण से जगत् खड़ा हुआ है तो प्रतिक्रमण से जगत् बंद हो जाता है। बस, इतना ही इसका ‘लॉ’ (कायदा)।“
हर एक धर्म में माफी माँगने का महत्त्व है, चाहे वो मुस्लिम धर्म हो, ईसाई धर्म हो या जैन धर्म। हर एक ने भूल होने के बाद क्षमा माँगने का रिवाज़ बनाया है। परंतु, माफी माँगने से पापकर्म हल्के हो जाते हैं, जबकि गुरु की हाज़िरी में पद्धति अनुसार आलोचना, प्रतिक्रमण और प्रत्याख्यान करने से पापकर्म खत्म हो जाते हैं। अपने गुनाहों को जाहिर करना वह आलोचना है। फिर यह गलत है, ऐसे पश्चाताप करना वह प्रतिक्रमण और दोबारा नहीं करूँगा, ऐसा निश्चय करना वह प्रत्याख्यान कहलाता है।
जितने दोष दिखाई दें, उतने प्रतिक्रमण करें, तो उतनी कमाई हुई मानी जाएगी। प्रतिक्रमण करने से कभी अनुभव न की हो ऐसी ज़बरदस्त शांति उत्पन्न होती है।
लेकिन प्रतिक्रमण यथार्थ रूप से और समझकर करना चाहिए। तोता पढ़ता है, उस तरह से सिर्फ़ क्रिया में प्रतिक्रमण करें, लेकिन दिल में सच्चा पछतावा न हो, तो साल में दो आने जितना फल मिलता है। लेकिन सच्चा प्रतिक्रमण करें, तो चौबीस घंटे में ही सोलह आने जितना फल मिलता है, वह भी वर्ष के तीन सौ पैंसठ दिन।

परम पूज्य दादाश्री कहते हैं, "जो व्यक्ति किसी भी क्रिया के बाद पछतावा करता है, वह एक दिन शुद्ध होगा ही, वह निश्चित है।" जिसके लिए प्रतिक्रमण करते हैं, उसको हमारे प्रति कोई खराब भाव हो, तो वह छूट जाते हैं। चाहे कितना भी बैर हो, तो वह भी इसी जन्म में ही छूट जाता है!
परम पूज्य दादा भगवान कहते हैं, कि इस काल में क्रोध-मान-माया-लोभ रूपी कषायों से इतने भयंकर कर्म बंध रहें हैं, कि मनुष्य पाँच इन्द्रिय में से चार इन्द्रिय जीवों में चला जाएगा, चार में से तीन में जाएगा, तीन में से दो में, ऐसे करते-करते एक इन्द्रिय जीव हो जाएगा। अतिक्रमण अधोगति में ले जाएगा। जबकि, प्रतिक्रमण ऊर्ध्वगति में ले जाएगा। कर्मों से मुक्त होकर मोक्ष में जाने तक प्रतिक्रमण ही सहायक होगा।
पापकर्म से मुक्ति दो प्रकार से हो सकती है। एक तो, पाप किस तरह से बँधता है, उसके जोखिम क्या हैं, और उसके परिणाम क्या हैं, यह सब समझ में आए तो मनुष्य पाप करने से रुक जाता है। दूसरा, अपने दोषों को पहचानकर पापकर्म का पछतावा करने से सभी पाप धुल जाते हैं और उनसे छूटा जा सकता है।
यदि किसी व्यक्ति को हमारे विचार, वाणी या वर्तन से दुःख होता है, तो उसे अतिक्रमण हुआ कहा जाएगा। उसका प्रतिक्रमण करना चाहिए। इतना ही नहीं, जब कोई व्यक्ति हमें ऐसा-वैसा कुछ बोल दे, हमारे ऊपर गुस्सा करे, तब भी हमें प्रतिक्रमण करना चाहिए कि "मैंने कोई भूल की होगी, जिससे मुझे ऐसा सुनने का प्रसंग आया।" कोई हमें गाली दे, नुकसान करे, हमें मारे तब भी दोष न दिखाई दें, तब यह संसार छूटता है, नहीं तो संसार छूटता नहीं है। हमें किसी के लिए खराब भाव हों, बाद में उसका प्रतिक्रमण कर लें, तो पापकर्म नहीं बँधता है। क्योंकि, भाव वह कर्म की जननी है। प्रतिक्रमण से हमारे भाव शुद्ध हो जाते हैं।
इस जगत् में माफी माँगने के अलावा दूसरे किसी भी रास्ते से छूटा जा सके ऐसा नहीं है। प्रतिक्रमण करने से कर्मों का प्रभाव कम हो जाता हैं और जल्दी हल आ जाता है। जैसे हम खाने से पहले और बाद में हाथ धोते हैं, उसी तरह प्रकृति से किसी को दुःखदायी व्यवहार हो जाए, तो तुरंत माफी माँग लेनी चाहिए। यह आदत ही डाल देनी चाहिए। फुरसत मिलते ही नज़दीकी व्यक्तियों जिन्हें हमसे दुःख हुआ हो, उनके लिए प्रतिक्रमण करते रहना चाहिए। सामने वाला नम्र और सरल हो, तो सामने ही माफी माँग लेनी चाहिए या तो भीतर ही माफी माँग लेनी चाहिए, दोनो तरीकों से हिसाब साफ हो जाता है।
परम पूज्य दादाश्री कहते हैं, "जिस धर्म से कर्म का नाश नहीं होता, उसे धर्म कैसे कहेंगे? नए कर्म कैसे रुक सकते हैं? प्रतिक्रमण से।" क्रोध-मान-माया-लोभ ये चार कषाय हैं। कषाय नहीं करना वह धर्म है। फिर भी, पूर्व कर्म के अनुसार कषाय हो जाएँ तो उनके प्रतिक्रमण करना वही धर्म है।
स्वयं ज्ञानी पुरुष, परम पूज्य दादा भगवान खुद इस मार्ग पर चलकर, हमें भी उस मार्ग पर चलना सिखाते है। वे कहते हैं, “आलोचना-प्रतिक्रमण-प्रत्याख्यान, वही है, यह मोक्षमार्ग। कितने ही जन्मों से हमारी यह लाइन, कितने ही जन्मों से आलोचना-प्रतिक्रमण-प्रत्याख्यान करते, करते, करते यहाँ तक आए हैं।“
प्रतिक्रमण दोषों से मुक्त होने के लिए सबसे बड़ा हथियार है।
परम पूज्य दादाश्री तो यहाँ तक कहते हैं, "खूनी आदमी खून करने के बाद यदि खुश होता है, तो उसका दंड जो बारह महीने का होने वाला था, वह तीन वर्ष का हो जाता है और खूनी आदमी खून करने के बाद यदि पछतावा करता है, तो बारह महीने का जो दंड होने वाला था, वह छ: महीने का हो जाता है। कोई भी गलत कार्य करने के बाद यदि खुश होते हो, तो वह कार्य तीन गुना फल देता है और (गलत) कार्य करने के बाद यदि पछतावा करते हो कि ‘गलत कार्य किया’ तो दंड कम हो जाता है और अच्छा कार्य करने के बाद खुश होते हो तो सभी को अधिक लाभ होगा।" कहने का मतलब यह है कि भारी गुनाह करने का दंड तो सामने आएगा ही, जिसे भुगतना ही पड़ेगा। लेकिन भीतर पछतावा करने से अगले जन्म की सेफसाईड हो जाती है।
प्रतिक्रमण हुआ यानी कर्म धुल गया, फिर सामने वाले को डंक नहीं रहता। वर्ना जब हम फिर से मिलते हैं, तब सामने वाले के साथ वह भेद बढ़ता ही जाता है। प्रतिक्रमण करने से हमारे दोष तुरंत निर्मूल हो जाते हैं और पिछले जन्मों के हिसाब साफ हो जाते हैं। सभी हिसाब साफ हो जाते हैं, इसलिए हम मुक्त हो जाते हैं। जाने-अंजाने में किसी भी जीव की हिंसा हो गई हो फिर भी उसका पछतावा और उसका प्रतिक्रमण करें, तो सभी जोखिमदारी समाप्त हो जाती है।
परम पूज्य दादाश्री कहते हैं, "इतना बड़ा कागज़ हमने किसी रिश्तेदार को लिखा हो, और उसमें गालियाँ लिखी हों, हमने खूब गालियाँ दी हों, पूरा कागज़ गालियों से ही भरा हो, और फिर नीचे लिखें कि आज वाइफ से झगड़ा हो गया है, इसलिए आपके लिए बोल रहा हूँ, लेकिन मुझे माफ कर देना, तो सब गालियाँ मिटा देगा या नहीं मिटा देगा? इसलिए अब गालियाँ पढ़ेगा, स्वीकार भी करेगा और फिर माफ भी करेगा! यानी ऐसी यह दुनिया है। इसलिए हम तो कहते हैं न कि माफी माँग लेना, आपके इष्टदेव से माँग लेना।"
परम पूज्य दादाश्री कहते हैं, "पूरे संसार का अंत लाने का सब से बड़ा हथियार यही है। अतिक्रमण से जगत् खड़ा हुआ है और प्रतिक्रमण से जगत् का विलय हो जाता है।" वे हमें यहाँ जगत् में दोषों का निवारण करने का मार्ग बताते हैं।
दादाश्री: आपके घर के सभी लोगों से आपको कुछ न कुछ पहले दु:ख हुआ होगा, उसके आपको प्रतिक्रमण करने हैं। ‘संख्यात या असंख्यात जन्मों में जो राग-द्वेष, विषय, कषाय से दोष हुए हों, उसके लिए क्षमा माँगता हूँ।’ इस तरह घर के एक-एक व्यक्ति का रोज़ाना प्रतिक्रमण करना है। फिर उपयोगपूर्वक आसपास के, अड़ोस-पड़ोस के सभी लोगों के लएि यह करते रहना चाहिए। आप करोगे उसके बाद यह बोझ हल्का हो जाएगा। यों ही हल्का नहीं होगा। हमने इस तरह पूरे जगत् के साथ निवारण किया था। पहले इस तरह निवारण किया था, तभी तो यह छुटकारा हुआ। जब तक आपके मन में हमारे लिए दोष है, तब तक हमें चैन नहीं पड़ने देगा! अत: जब हम इस तरह प्रतिक्रमण करते हैं, तब आपमें भी (दोष) मिट जाता है।
अतिक्रमण के सामने जैसे-जैसे हम प्रतिक्रमण करते हैं, वैसे-वैसे हमारें मन और वाणी शुद्ध होते जाते हैं।
परम पूज्य दादाश्री कहते हैं, "जब कभी गलत कर्म हो जाए तो तुरंत उसके बाद पछतावा (करना) होता है, और वह भी सच्चे दिल से, सिन्सियरिटी से पछतावा करना है। यदि पछतावा करने के बावजूद भी फिर से ऐसा हो जाए तो उसकी चिंता नहीं करनी है। फिर से पछतावा करना है।"
वे इसके पीछे का विज्ञान समझाते हैं, कि दोष प्याज़ की परतों के जैसे होते हैं। जितनी बड़ी गाँठ, उतनी ही परतें ज़्यादा। प्रतिक्रमण करने से दोषों की एक परत जाती है, पूरी प्याज़ खत्म नहीं होती। इसलिए ऐसा लगता है कि दोष बंद नहीं हो रहे हैं, लेकिन कर्मों की गाँठें हल्की होती जाती हैं। जो सच्चे दिल से पछतावा करता है, उसके सभी कर्म धुल जाते हैं। यदि प्रतिक्रमण न करें तो पापकर्म बंधते हैं और उसका बहुत खराब दंड आता है। मनुष्य जन्म भी चला जाता है और यदि मनुष्य में आए, तो भी उसे जीवन में अनेक प्रकार की अड़चनें आती हैं। खाने-पीने की अड़चनें आती हैं और मान-सम्मान कभी मिलता ही नहीं, हमेशा अपमान ही होता रहता है। इसलिए बार-बार पछतावा कर-करके सुधारते रहना चाहिए। प्रतिक्रमण करने से अगले जन्म की गति सुधरती है, कोई दुःख नहीं आता, अड़चनें नहीं आती और बैर नहीं बँधता। सांसारिक सुख प्राप्त करने के लिए और कर्मों से मुक्त होकर मोक्ष में जाने के लिए, इस तरह प्रतिक्रमण दोनों प्रकार से काम आता है। उदाहरण के लिए, अगर कोर्ट में हमारे ऊपर सौ मुकदमें दायर किए हों और उनका निपटारा न करें, तो क्या होगा? मुकदमें खड़े ही रहेंगे। प्रतिक्रमण न करें तब तक कर्मों के मुकदमे खड़े रहेंगे।
परम पूज्य दादाश्री कहते हैं, जितने भी शरीर के दर्द हैं, वे सब अतिक्रमण से ही हुए हैं। वे सभी प्रतिक्रमण से दूर हो जाते हैं। इतना ही नहीं, अगर हम प्रतिक्रमण करते हैं, तो उसका मन हमारे साथ जुड़ जाता है, वर्ना मन अलग हो जाता है। प्रतिक्रमण से चित्तशुद्धि होती है। जैसे, चोरी करने से चित्त अशुद्ध होता है और फिर पश्चाताप करने से वही चित्त शुद्ध हो जाता है। चित्तवृत्तियाँ अशुद्ध होने के कारण बाहर भटकती हैं। उनके प्रतिक्रमण होते जाएँगे, तो चित्त का भटकना बंद हो जाएगा।
कर्म की थियरी ऐसी है कि गलत कार्य होने के बाद यदि भीतर भाव बदल जाएँ, तो नया कर्म हल्का बँधता है। लेकिन अगर गलत कार्य करने के बाद हम ऊपर से खुश हों कि "ऐसा ही करना चाहिए।" तो नया कर्म मज़बूत हो जाता है, निकाचित हो जाता है। निकाचित कर्म अर्थात् जिसका फल भोगने पर ही छुटकारा मिलता है। लेकिन अगर निकाचित कर्म का बार-बार पछतावा करें, तो वह हल्का हो जाता है। उसका रस फीका किया जा सकता है।
महावीर भगवान ने त्रिपुष्ठ वासुदेव के अवतार में क्रोधित होकर द्वारपाल के कानों में सीसा डलवा दिया था। उस पर उन्हें कोई पछतावा भी नहीं हुआ, उल्टा "मेरी नींद बिगाड़ने वाले को सज़ा होनी ही चाहिए।" ऐसे भाव किए थे। इससे उनका निकाचित कर्म ऐसा बंधा कि महावीर भगवान के अवतार में उनके कान में कील ठोंक दी गई। इतना ही नहीं, वह द्वारपाल का जीव ग्वाला बनकर जन्मा और उसके निमित्त से बैर वसूल किया गया।

यदि हम किसी भी जीव को जानबूझकर मारें, हिंसा करें और ऊपर से खुश हों, तो उसका भारी कर्म बँधता है, लेकिन वह निकाचित कर्म धुलता किससे है? आलोचना, प्रतिक्रमण और प्रत्याख्यान से। इसके लिए निरंतर प्रतिक्रमण करना पड़ता है, तो फिर कर्म हल्का हो जाता है।
जिस तीव्रता से अतिक्रमण किया हो, उतनी ही तीव्रता से प्रतिक्रमण करना चाहिए। कुछ दोष जो बहुत गाढ़े होते हैं और बार-बार होते रहते हैं, उनका बार-बार प्रतिक्रमण करना चाहिए, ताकि वे पतले होते जाएँ। प्रतिक्रमण किया यानी धुल गया। प्रतिक्रमण न करें तो फिर भूलें बढ़ती जाती हैं।
सामनेवाले को कोई भी दुःख पहुँचाना उसे रौद्रध्यान कहा गया है। भयंकर रौद्रध्यान का फल नर्कगति आती है। जब सामनेवाले को दुःख न हो, लेकिन खुद भीतर दुःखी रहे, तो उसे आर्तध्यान कहा गया है। आर्तध्यान का फल तिर्यंचगति आती है। राजा श्रेणिक ने शिकार करते समय एक हिरणी को मारा। उसके पेट में बच्चा था। राजा प्रसन्न हुए कि एक ही तीर से दो जीवों को मार डाला। उस आनंद में उन्हें पछतावा भी नहीं हुआ और नर्कगति बंध गई। फिर भविष्य में श्रैणिक राजा तीर्थंकर भगवान से मिले, वे क्षायक समकित हुए, तीर्थंकर गोत्र बाँधा, लेकिन वे नर्कगति से बच नहीं सके।
पछतावा करने से रौद्रध्यान भी आर्तध्यान हो जाता है। पछतावा करने से नर्कगति रुककर तिर्यंचगति हो जाती है। और यदि अधिक पछतावा करें तो धर्मध्यान बँधता है। भयंकर से भयंकर भूल पर भी पश्चाताप करें, तो हमारी इतनी अधिक सेफसाईड हो सकती है कि जिससे अधोगति रुक जाती है, मनुष्यगति में भी आ सकते हैं या देवगति में भी जा सकते हैं। क्रिया वही की वही रहती है, लेकिन फल में बदलाव होता रहता है। आर्तध्यान-रौद्रध्यान तो हो ही जाता है, लेकिन वह उसका प्रतिक्रमण करता है, इसलिए वह फिर से धर्मध्यान में आ गया कहा जाता है। इसलिए जितनी बार आर्तध्यान या रौद्रध्यान हो जाए, उतनी बार प्रतिक्रमण करना चाहिए।
परम पूज्य दादाश्री हमें यहाँ समझाते हैं कि जब हम प्रतिक्रमण करते हैं, तो उसका सामनेवाले पर क्या प्रभाव पड़ता है।
प्रश्नकर्ता: प्रतिक्रमण करते हैं तो सामने वाले को पहुँचता है?
दादाश्री: सामने वाली व्यक्ति को पहुँचता है। वह नर्म होता जाता है। उसे पता चले या ना चले, उसका हमारे प्रति जो भाव है, वह नर्म होता जाता है। अपने प्रतिक्रमण का तो बहुत असर होता है। एक घंटा यदि करो तो सामने वाले में बदलाव आ जाता है, यदि साफ हुए होंगे तो। जहाँ भी हम जिनके प्रतिक्रमण करते हैं तो वे हमारे दोष तो नहीं देखते लेकिन हमारे लिए उन्हें मान होता है।
अगर हमसे किसी को दुःख हुआ हो और हम पच्चीस-पचास बार प्रतिक्रमण कर लें, तो सामनेवाले के मन में हमारे प्रति कोई बैर नहीं बँधता है। उल्टा, दूसरे दिन मिलें, तो सामने वाले का मुँह फूला हुआ नहीं बल्कि अच्छा लगता है। उदाहरण के तौर पर, अगर हमारे हाथ में रस्सी बँधी हो और उसका दूसरा सिरा सामनेवाले के हाथ में बँधा हो। अगर हम उसे यहाँ से खींचते हैं, तो सामनेवाले को असर होगी। लेकिन यदि हम अपनी दोष रूपी रस्सी को छोड़ दें, तो सामनेवाले को न खिंचाव होगा न ही कोई असर होगी। प्रतिक्रमण करने से हमारे हाथ की रस्सी छूटती है।
इसलिए, फुरसत के समय में जिन-जिन व्यक्तियों को हमसे दुःख हुआ हो, उन सभी को याद करके प्रतिक्रमण करते रहने चाहिए। प्रतिक्रमण बहुत ही क्रियाकारी है। लेकिन हमें प्रतिक्रमण करके फिर यह जाँचने की ज़रूरत नहीं है कि सामनेवाले में सुधार हुआ या नहीं? सामनेवाले को सुधारने के लिए नहीं, बल्कि कषायों की डोरी की गाँठ को छोड़कर मुक्त होने के लिए प्रतिक्रमण करने चाहिए।
विज्ञान ऐसा है कि अगर सामने वाले के लिए हमारा कोई भी नेगेटिव अभिप्राय होगा, तो उस नेगेटिव भाव काअसर हम पर भी और उस पर भी पड़ेगा। यदि हम शुद्ध भाव ही रखें, तो उसका अच्छा असर पड़ेगा। जब सामनेवाला हम पर अटैक करता हुआ आए, तब यदि हम भी सामने अटैक करें, तो सामनेवाला थकेगा नहीं। उल्टा, हम सामनेवाले के प्रतिक्रमण करें, तो हमारे घर के, आस-पास के लोगों में बदलाव आ जाएगा हैं, प्रतिक्रमण की ऐसी जादुई असर होती है!
परम पूज्य दादाश्री तो यहाँ तक कहते हैं, कि अगर तुम बाघ का प्रतिक्रमण करो, तो बाघ भी अपना हिंसक भाव भूल जाता है। हमारा बाघ के प्रति भय छूट जाता है। इसके पीछे का विज्ञान समझाते हुए वे कहते हैं, "बाघ में और मनुष्य में कुछ फर्क नहीं है। फर्क आपके स्पंदनों का है। जिसका उसे असर होता है। जब तक ऐसा आपके मन में ध्यान रहे बाघ हिंसक है, तब तक वह हिंसक ही रहेगा और यदि ऐसा ध्यान रहे कि बाघ शुद्धात्मा है, तो वह शुद्धात्मा ही है और अहिंसक हो जाएगा। सब हो सकता है।" जब तीर्थंकर भगवान देशना देते हैं, तब उनकी सभा में बाघ और बकरी एक साथ होते हैं। बाघ अपना हिंसक भाव भूल जाता है और बकरी भय भूल जाती है।
अगर आमने-सामने दोनों व्यक्ति प्रतिक्रमण करें, तो जल्दी हिसाब चुकता हो जाता है। लेकिन, यदि सामने वाला प्रतिक्रमण न करे तो हमें दोगुना प्रतिक्रमण करके भी हिसाब से छूट जाना चाहिए। नियम यह है कि हम माफी माँगने के लिए जिसके पैरों में गिरते हैं, उसका अहंकार उतरे बिना नहीं रहता है। अहंकार को खाली करने की हम हज़ार कोशिशें कर लें, लेकिन वह खाली नहीं होता। इसके बजाय, सामने जाकर जिस व्यक्ति को हमसे दुःख हुआ हो, उसके पैर में सिर रख दें, तो एक ही झटके में सब साफ हो जाता है! अहंकार की अड़ाइयाँ ही हमें माफी नहीं माँगने देती।
जिनके 'आलोचना-प्रतिक्रमण-प्रत्याख्यान' सच्चे होते हैं, उन्हें आत्मा प्राप्त हुए बिना रहता ही नहीं। सच्चा प्रतिक्रमण उसे कहते हैं कि दोष दोबारा न हो ही न, या फिर दोष धीरे-धीरे समाप्त हो जाए। उसमें भी यदि कोई ज्ञानी पुरुष के पास जाकर आलोचना-प्रतिक्रमण-प्रत्याख्यान सीख जाएँ तो बहुत हो गया, वह काम निकाल लेता है। गुनाह से मुक्त हो जाता है।
परम पूज्य दादाश्री ऐसा कहते हैं, कि यदि कोई आपको गाली दे और आपको असर हो जाए, तो अपनी खुद की ही भूल है, ऐसा खुद को लगता रहे और खुद प्रतिक्रमण करता रहे, यह भगवान का सबसे बड़ा ज्ञान है। यही मोक्ष में ले जाएगा!
एक तरफ गलत काम होते रहें और दूसरी तरफ पछतावा करते रहना चाहिए। तब हमें प्रश्न होता है, कि इसका दुरुपयोग करके कहीं हम दोष करना जारी रखें, ऐसा तो नहीं होगा न? लेकिन परम पूज्य दादाश्री समझाते हैं, कि जो मनुष्य पाप करके पछतावा करता है, वह बनावटी पछतावा कर ही नहीं सकता। पछतावा कभी भी व्यर्थ नहीं जाता। पछतावा सच्चा ही होता है और उससे दोष की एक परत जाती है। भूल हुई उसका गुनाह नहीं है, भूल होने के बाद प्रतिक्रमण-प्रत्याख्यान नहीं करते उसका गुनाह है।
पछतावा से बीज नष्ट हो जाते हैं। पहले बोए गए बीज के फल स्वरुप, आज पाप भुगतने हैं और आज बोए गए बीज का फल कल भोगने पड़ेगे। दोषों के लिए माफी माँगने से पाप की जड़ जल जाती है, इसलिए वह दोबारा अंकुरित नहीं होती और दंड कम हो जाता है, लेकिन बाद में उसका फल तो भोगना ही पड़ता है! कृष्ण भगवान के पैर में भी तीर लगा था, यानी भगवान को भी कर्मफल तो भोगना ही पड़ता है। प्रतिक्रमण कॉज़ेज़ को नष्ट करता है, रिज़ल्ट को नष्ट नहीं करता। जैसे कि, हम से किसी को नुकसान हुआ। अब इसमें नुकसान करने का हमारा जो इरादा था, वह 'कॉज़' है। फिर जब हम प्रतिक्रमण करते हैं, तो नुकसान करने का हमारा वह इरादा टूट जाता है। इस प्रकार, प्रतिक्रमण वह कॉज़ेज़ को तोड़ता है। बाकी जो हो गया वह तो रिज़ल्ट है। यह परम पूज्य दादाश्री की वैज्ञानिक खोज है!
बाहर से तो कहते हैं "आइए, आइए", लेकिन मन में सोचते हैं कि "अरे! इस वक्त कहाँ से आ गए?" तो यह अतिरिक्त भूल को हम प्रतिक्रमण से मिटा देते हैं। जैसे पेंसिल से लाइन खिंची गई हो, तो रबड़ से घिसकर मिटा दिया, तो साफ हो जाता है। जैसे चिठ्ठी और टिकट के बीच गोंद हो, तो टिकट चिठ्ठी से चिपकी रहती है, लेकिन यदि गोंद निकल जाए, तो टिकट निकल जाएगी। व्यक्तियों को हिलाए बगैर, बदले या सुधारे बगैर, हमारे राग-द्वेष को समाप्त करने के लिए यह प्रतिक्रमण है।
अक्सर हम कहते हैं, कि “मुझे बोलना नहीं था, फिर भी कठोर शब्द निकल गए।” यानी हमारी इच्छा के विरुद्ध प्रकृति में ऐसा तूफ़ान खड़ा हो जाता है। तब हमें लगता है कि प्रतिक्रमण करता हूँ फिर भी प्रकृति सुधरती नहीं, तो रहने दो न! लेकिन ऐसा नहीं है। प्रकृति अपना काम करती है और हमें अपना काम करना है। कितने ही ‘प्रतिक्रमण’ होते हैं, तब जाकर यह प्रकृति बंद होती है! हमें अपने भीतर ही सुधार करते रहना चाहिए।
प्रतिक्रमण के वैज्ञानिक असर को समझाते हुए परम पूज्य दादाश्री कहते हैं, कि जब कर्म बहुत चिकना हो और गाँठ बड़ी हो, तो मनुष्य भुलावे में आकर दोष कर बैठता है। फिर उसका पछतावा करने से वह इतना ढीला हो जाता है कि अगले जन्म में धोया जा सके। प्रतिक्रमण करने पर भी दोष रह ज़रूर जाता है लेकिन वह पतला हो जाता है। जैसे जली हुई सुतली की रस्सी होती है, तो उसकी डिज़ाइन, उसका बल बिल्कुल रस्सी जैसा दिखता है, लेकिन हाथ लगाते ही राख झड़ जाती है। गाँठ दिखाई ज़रूर देती है, लेकिन अगले जन्म में हाथ लगाते ही झड़ जाती है। इसलिए, हर एक कार्य के बाद हमें अपनी भूलों को पहचान कर पछतावा करना चाहिए।
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