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जीवन में पाप कर्मों से किस तरह छूटें?

भयंकर काल आने वाला है। भयंकर दुःख आने वाले हैं! बहुत अधिक अतिक्रमण का फल ही पशुयोनि होगी और उससे भी बड़े अतिक्रमण होंगे तो फिर नर्कयोनि प्राप्त होगी। यह भ्रष्टाचार, मिलावट करना, अणहक्क का भोगना यह सब पाशवता कहलाता है। इसका फल भुगतने के लिए जानवर के अवतार में जाना पड़ता है। अगर उसमें अभी भी हम प्रतिक्रमण रूपी हथियार का उपयोग करेंगे, तो बचने की कुछ संभावना है।

जीवन के घड़े में चाहे जितना भी पाप भरा हो, तो भी पश्चात्ताप के द्वारा वह हल्का हो जाता है। कुछ पाप तो पछतावे की आग में जलकर ख़त्म हो जाते हैं। यदि कोई दोष हो गया हो और उसका बार-बार खूब पछतावा करें, तो वह दोष अवश्य चला जाता है।

किसी भी जीव को किंचित्‌मात्र भी दुःख हो, तो पापकर्म बँधता है। इसलिए, जहाँ भी दुःख दे दिया जाए, वहाँ प्रतिक्रमण अवश्य करना चाहिए। यहाँ हम पापकर्म किस-किस तरह से बँधते है, यह समझकर प्रतिक्रमण करने की समझ प्राप्त करेंगे।

स्थूल हिंसा के प्रतिक्रमण

जीवों की स्थूल हिंसा में सबसे अधिक दुःख पहुँचता है। जैसे कि, खेतीबाड़ी में फसल को बचाने के लिए कीटनाशक दवाइयाँ छिड़कने से बहुत से जीव मारे जाते हैं, उसका पाप बँधता है। इसलिए, खेतीबाड़ी करने वालों को रोज़ पाँच-दस मिनट भगवान से प्रार्थना करनी चाहिए कि “खेतीबाड़ी के निमित्त से जीवों की जो हिंसा होती है, उसका मैं प्रतिक्रमण करता हूँ। मुझे क्षमा करें।” तो हिंसा का गुनाह कम हो जाएगा।

अगर अनजाने में कोई जीव पैर के नीचे कुचल गया हो, कोई जानवर वाहन की चपेट में आ गया हो, या जानबूझकर हमनें किसी जीव-जंतु या पशु-पक्षी को मार दिया हो, तो इन सभी प्रकार की हिंसा को याद कर-करके उनका प्रतिक्रमण करना चाहिए और मन में दृढ़ भाव करना चाहिए कि अब किसी भी जीव को मारना नहीं है।

अनजाने में हुई हिंसा में “मुझे कहाँ पता था? मैं कितना बचाऊँ?” ऐसी लापरवाही नहीं करनी चाहिए। हर रोज़ सुबह उठकर “मन-वचन-काया से किसी भी जीव को किंचित्‌मात्र भी दुःख न हो।” यह पाँच बार बोलना चाहिए, और यह वैसे ही बोलना है जैसे पैसे गिनते समय चित्त हाज़िर रखते हैं, वैसे ही एकाग्रता से।

कषायों की हिंसा के प्रतिक्रमण

क्रोध-मान-माया-लोभ रूपी कषायों से और विषय-विकारी भावों से किसी को दुःख होता है, तो वह सूक्ष्म हिंसा कहलाती है। यदि हमारे विचार-वाणी या वर्तन से किसी को ज़रा भी दुःख हो ऐसा व्यवहार हो, जिससे सामनेवाले को प्रत्यक्ष और स्पष्ट दुःख हो, तो वह अतिक्रमण हुआ कहलाएगा और उसके प्रतिक्रमण अवश्य करने चाहिए।

अगर किसी को प्रत्यक्ष दुःख न होता हो और गर्भित यानी भीतर दुःख रहता हो, तो उसके भी प्रतिक्रमण करने चाहिए। जब कोई हमारा अपमान करे, तब हम बाहर कुछ नहीं बोलते, लेकिन मन में प्रतिकार चलता रहता है, वाणी से प्रतिकार हो जाता है, अरे, शरीर से भी प्रतिकार हो जाता है। जहाँ तीनों प्रकार की निर्बलताएँ खड़ी हुई हों, वहाँ तीनों प्रकार से प्रतिक्रमण करने पड़ते हैं।

यदि सामनेवाले को हमारे निमित्त से भय रहता है, तो उसके पीछे हमारी बुद्धि-अहंकार होते हैं। जब हमारी बुद्धि हाइपर हो और किसी काम में सख्ती से निर्णय ले लेते है, तो सामनेवाला डर जाता है। आज भले ही हम माफी माँग लें, तो भी पिछली असरें रह गई हों, तो उन्हें मिटने में समय लगता है। उन सभी को याद कर-करके माफी माँगते रहना चाहिए। यदि किसी को हमारे व्यवहार से दुःख हो गया हो, तो उसके पीछे हमारे कौन से कषाय काम कर रहें हैं, वो खोजना चाहिए। हमारे कौन से आग्रह, अपेक्षाएँ, पूर्वग्रह हैं, सामनेवाले पर कौन से आक्षेप लगाए हैं, क्या मनमानी करनी है, अपने ही मान, लोभ और मोह हैं, उन्हें पहचानना चाहिए।

अगर हम किसी रेस्टोरेंट में खाना खाने गए और हमसे कोई डिश टूट गई, तब हम अपनी गलती छिपाने ले लिए सामनेवाले पर दोष ठोक देते हैं, कि "तुम्हारे आदमी ध्यान नहीं रखते, इसलिए टूट गई!" या फिर किसी पर क्रोध करके हम अपना बचाव करते है, कि "वो झूठ बोल रहा था, इसलिए मुझे क्रोध करना पड़ा!" तो यह सब अतिक्रमण हुआ कहा जाएगा। इन सभी का प्रतिक्रमण करना चाहिए। घर में भी अगर चाय ठंडी हो गई, गरम नाश्ता नहीं बना, खाना समय पर नहीं बना या बच्चें हमारे कहे अनुसार न करें, तो हम गुस्सा कर देते हैं। इन सभी से व्यक्ति को दुःख पहुँचता है और उसका प्रतिक्रमण करना चाहिए।

अणहक्क की लक्ष्मी प्राप्त करवाने वाले कार्यों से भी भारी पाप बँधता है। धंधे में ज़्यादा कमाने के लिए अधिक दाम लेना, पैसे उधार देकर अधिक ब्याज लेना, लेनदार के पैसे वापस न करना, काले बाज़ार का माल खरीदना या बेचना, टैक्स की चोरी करना, रिश्वत या कमीशन लेना आदि से सामने वाले को दुःख होता है। जहाँ तक हो सके गलत कार्य नहीं करने चाहिए, इसके बावजूद दबाव या अधीनता वश करना ही पड़े, तो संयोग मिलते ही व्यवसाय बदल देना चाहिए और संयोग न मिलें तो एक घंटा बैठकर पछतावा करके भीतर के भावों को सुधारना चाहिए। ऐसा करने से धीरे-धीरे बाहर के संयोग भी बदल जाते हैं।

इसके अलावा, किसी पर-स्त्री या पर-पुरुष के प्रति विषय-विकारी भाव हों, मन में खराब विचार आएँ, तो उसका भी प्रतिक्रमण करके दोष साफ करना चाहिए। पति-पत्नी के अलावा अणहक्क के विषय का भोग किया हो, तो उससे जानवर और नर्क गति के भयंकर पाप बँधते हैं। उसमें खास तौर पर सावधान रहना चाहिए और जो दोष हो गए हैं, उसका हृदय से पश्चाताप करके पीछे लौटना चाहिए।

वाणी से दिए गए दुःखों के प्रतिक्रमण

परम पूज्य दादाश्री कहते हैं कि, इस दुषमकाल में वाणी से ही बंधन है और किसी को गलत कहना, वह खुद के आत्मा पर धूल उड़ाने बराबर है।

व्यवहार में यदि हम अपनी वाणी से किसी पर हमला कर दें, तो वह आक्रमण कहलाता है। इससे सामनेवाले को दुःख होता है, इसलिए उसका प्रतिक्रमण करना पड़ता है। कोई हमारी ज़रा सी भी भूल बताए, तो गुस्से में आकर अटैक कर देते हैं कि "देखिये, मैं आपसे कह देता हूँ, मेरे पीछे मत पड़िए। आप अपने आप को समझते क्या है?" इससे सामनेवाले की बोलती ही बंद हो जाती है। "आप अपनी गलतियाँ देखिये, मेरे पीछे क्यों पड़े है?" यह वाणी से हमला किया कहा जाएगा। सामनेवाले का मन टूट जाए, अहंकार चकनाचूर हो जाए ऐसे वचन बोलनें, ऊँची आवाज़ में बोलना, किसी का अपमान करना, अपनी तीक्ष्ण बुद्धि से सामने वाले की गलतियाँ ढूँढकर उस पर शब्दों से घाव करना, किसी के चरित्र पर या चोरी का बड़ा आक्षेप लगाना, यह बहुत भारी आक्रमण कहलाता है। इससे संसार भी बिगड़ता है और सामनेवाला वैर भी बाँध सकता है।

यदि किसी की ज़रा भी मश्करी करें, उसमें सामने वाला कमज़ोर हो और कुछ बोल न सके, तो उसे अंदर ही अंदर दुःख होता है। परम पूज्य दादाश्री कहते हैं कि किसी को थप्पड़ मारें, उससे भी अनंत गुना ज़्यादा जोख़िम मश्करी करने में है। क्योंकि, मज़ाक-मश्करी में सामनेवाले की बुद्धि नहीं पहुँच सकती, वहाँ हम बुद्धि से घाव करते हैं। इस तरह जहाँ-जहाँ वाणी से किसी को दुःख पहुँचाया हो, उन सभी दोषों को याद करके क्षमा माँगनी चाहिए और उनका हृदय से पश्चाताप करना चाहिए।

जो व्यक्ति उपस्थित नहीं है, उसकी चर्चा करें या नेगेटिव बोलें, तो वह रौद्रध्यान हो जाता है। उसके स्पंदनों की असर पहुँचे बिना रहती ही नहीं। किसी व्यक्ति के लिए कहें कि "वह लुच्चा है, नालायक है", तो दो घंटे तक उस व्यक्ति को हमारे उपर प्रेम नहीं आएगा, भेद पड़ जाएगा। उसका प्रतिक्रमण करना चाहिए।

यदि व्यवहार में हम सत्य का आग्रह रखकर कठोर शब्द बोलें या किसी की मान्यताओं को तोड़ने वाले शब्दों का प्रयोग करें, जिससे सामनेवाले को दुःख हो जाए, तो भी उसका प्रतिक्रमण करना चाहिए। हर व्यक्ति अपने-अपने व्यू पॉइंट को सही मानता है। अगर हम उनके व्यू पॉइंट को गलत कहें, तो उन्हें दुःख होता है। हमें जो सही लगे, वह सामनेवाले की दृष्टि से गलत हो सकता है। परम पूज्य दादाश्री कहते हैं कि, जिस बात पर विवाद नहीं हो, टकराव नहीं हो और जिसे सामनेवाला सहज रूप से स्वीकार कर ले, वह बात वास्तव में सत्य होती है।

हमारा हेतु चाहे कितना भी अच्छा क्यों न हो, लेकिन सामनेवाले को दुःख पहुँचे ऐसी वाणी निकले, तो उसका प्रतिक्रमण करना चाहिए, क्योंकि किसी को दुःख देकर हम सुखी नहीं हो सकते। यदि सामनेवाले के हित के लिए उसे टोकना पड़े, तो सामने वाले को दुःख हो इस तरह से नहीं, बल्कि प्रेम और विनयपूर्वक होना चाहिए। यहाँ तक कि टोकने का भी प्रतिक्रमण करना चाहिए।

भाव बिगड़ जाने के प्रतिक्रमण

दूसरों को कुछ भी नुकसान हो ऐसे विचार आएँ, तो वह रौद्रध्यान कहलाता है और खुद को नुकसान हो ऐसे विचारों को आर्तध्यान कहते हैं। आर्तध्यान या रौद्रध्यान हो जाए तो उसका प्रतिक्रमण करना चाहिए। किसी व्यक्ति के लिए मन में भाव बिगड़ जाएँ, जिस व्यक्ति के लिए द्वेष हो, उसे देखते ही भीतर अकुलाहट उत्पन्न होना, टीवी या न्यूज में समाचार सुनें या पढ़ें तब भी कितने ही लोगों के लिए भाव बिगड़ जाते हैं, तो इन सभी के प्रतिक्रमण करनें पड़ते हैं। अग्रशोच, भविष्य की चिंता जैसे कि, "बेटी की शादी होगी या नहीं?", बीमार हो जाएँ तब “मर जाएँगे तो क्या होगा?", व्यवसाय में इन्कमटैक्स का नोटिस आ जाए तो “अब क्या होगा?" ऐसे सभी विचार आर्तध्यान में जाते हैं, जिससे अधोगति के कर्म बंधते हैं। इसलिए इनके भी प्रतिक्रमण करने चाहिए।

भाव किस तरह से बिगड़ते हैं, इसका एक उदाहरण लेते हैं। हम रात को साढ़े ग्यारह बजे सोने की तैयारी कर रहे हों और कोई घर का दरवाज़ा खटखटाए। जाकर देखें तो दस–बारह व्यक्तियों का समूह आया हैं। उनमें से एक–दो लोग हमारे पहचान वाले होते हैं और बाकी उनकी पहचान वाले होते हैं। तब हम बाहर से तो मेहमान आए हैं, इसलिए “आइए, बैठिए“, ऐसा कहते हैं। लेकिन अंदर ही अंदर हमारें भाव बिगड़ते हैं, कि “अभी कहाँ से आ गए?” फिर हम उनसे कहते हैं कि “दूर से आए हैं, थोड़ी चाय लेंगे...” उससे पहले तो मेहमान कह देते हैं कि “चाय रहने दीजिए, खिचड़ी–कढ़ी बना दीजिए, बहुत हो गया।“ यह सुनकर रसोई में काम करने वाली स्त्री झुँझला जाती है। हमारा व्यवहार बाहर खराब न दिखे, इसलिए बाहर अच्छा व्यवहार करते हैं, लेकिन भीतर उल्टा चित्रण करते हैं।

भारतीय संस्कृति में "अतिथि देवो भवः" कहा गया है। अतिथि अर्थात् पत्र लिखे बगैर, तिथि बताए बगैर आएँ ऐसे मेहमान। अब मेहमान के लिए भाव बिगाड़े, तो उसके प्रतिक्रमण करने चाहिए कि "हे भगवान! इन संयोगों के दबाव के कारण मुझसे उल्टे भाव हो गए, मेरी ऐसी कोई इच्छा नहीं है, उसके लिए क्षमा माँगता हूँ। ये लोग आए, बहुत अच्छा हुआ!" और घर की स्त्रियों को भी उन्हें शांतिपूर्वक भोजन कराना चाहिए। क्योंकि, जब मेहमान आ ही गए हैं, तो अब उसका कोई उपाय नहीं है। मेहमान को भूखा नहीं सुलाते हैं।

टीवी या समाचार में कोई धर्म या धर्मगुरु के विषय में नेगेटिव बातें सुनकर अगर हमनें उनकी विराधना की हो, भाव बिगाड़े हों, तो उनको भी याद करके धो देना चाहिए। “इस जन्म में, पिछले जन्म में, पिछले संख्यात जन्म में, पिछले असंख्यात जन्मों में, गत अनंत जन्मों में, धर्म की, साधु-साध्वी या आचार्यों की जो-जो विराधना की या करवाई हो, तो उसके लिए मैं अपने इष्टदेव या जिस भगवान में मेरी श्रद्धा है, उनकी साक्षी में क्षमा माँगता हूँ। किंचित्‌मात्र अपराध न हो ऐसी शक्ति दीजिए।“ इस तरह प्रतिक्रमण करना चाहिए।

परम पूज्य दादाश्री कहते हैं, “अच्छे को अच्छा कहने में दोष नहीं है, लेकिन अच्छे को बुरा कहने में दोष है और बुरे को बुरा कहने में भी बहुत दोष है, ज़बरदस्त दोष! क्योंकि, वह खुद बुरा नहीं है, उसके प्रारब्ध ने उसे बुरा बनाया है।” वास्तव में, किसी भी जीव को बुरा काम करने की इच्छा होती ही नहीं है। संयोग उससे खराब काम करवाते हैं। निर्दोष देखने की यह बहुत बड़ी चाबी है।

जिस व्यक्ति के प्रति हमारे मन में अकुलाहट होती हो, उसके प्रतिक्रमण करने से फिर द्वेष बंद हो जाता है। यदि उस व्यक्ति की वजह से हमें क्लेश हो रहा हो, तो वह भी बंद हो जाता है। रोज़ रात को, पूरे दिन में जिसके भी दोष दिखे हों, जहाँ–जहाँ मन के भाव बिगड़ गए हों, उन सभी के प्रतिक्रमण करके बहीखाता साफ़ कर देना चाहिए। परम पूज्य दादाश्री कहते हैं, “जब नापसंद को भी साफ मन से सह पाएँगे, तब वीतराग हो जाएँगे।” साफ मन यानी जिसमें सामने वाले के लिए ज़रा भी बुरा विचार न आए और आ जाए तो तुरंत उसके प्रतिक्रमण करके धो देना चाहिए।

परम पूज्य दादा भगवान यहाँ बताते हैं कि पापकर्म को धोने के लिए प्रतिक्रमण कब तक करना चाहिए।

प्रश्नकर्ता: हमारे पाप कर्म अभी कैसे धोने हैं?

दादाश्री: पाप कर्म के तो जितने दाग़ लगे हैं, उतने प्रतिक्रमण करने हैं, यदि वह दाग़ मुश्किल हो तो फिर से धोते रहना है। बार-बार धोते रहना है।

प्रश्नकर्ता: वह दाग़ चला गया या नहीं चला गया, उसका पता कैसे चलेगा ?

दादाश्री: वह तो भीतर मन साफ हो जाता है न, तो तुरंत पता चल जाता है। मुँह पर मस्ती छा जाती है।

इसके अलावा, जब तक दोष हमें चुभता है, तब तक उसका प्रतिक्रमण करते रहना चाहिए। जैसे, हम किसी गद्दे पर सो जाएँ और नीचे कंकड़ हों, तो जहाँ–जहाँ कंकड़ चुभते हैं, वहाँ से हम उन्हें निकाल देते हैं। ठीक उसी तरह, जो–जो दोष हमें भीतर से चुभते हैं, हमें उन्हीं का प्रतिक्रमण करना है।

प्रतिक्रमण करने के बाद ऐसा लगे कि “बदलाव क्यों नहीं हो रहा है?" तो इसका एक कारण यह भी हो सकता है कि हमने एक हज़ार दोष किए हों और सिर्फ़ दस प्रतिक्रमण करें, तो ऐसा लगेगा कि बदलाव नहीं हो रहा है? किसी एक प्रसंग में अंदर एक हज़ार बार उल्टे भाव किए हों, उसके विरोध में अच्छे भाव कितनी बार किए? कपड़े पर अगर चाय की एक बूँद पड़े, तो क्या उसे धोने के लिए पानी की सिर्फ एक बूँद काफी होगी? उसी तरह एक दोष को धोने के लिए कई प्रतिक्रमण करने पड़ते हैं। ऊपर से कलियुग के कर्म चिकने होते हैं, इसलिए अधिक समय निकालकर प्रतिक्रमण-प्रत्याख्यान करते रहना चाहिए। तब अनुभव में आएगा कि चिकनाहट धुल गई और व्यवहार भी साफ हो गया।

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