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भय

हर एक जीवमात्र को भय होता ही है। एकेन्द्रिय से पंचेन्द्रिय तक हर एक जीव में चार प्रकार की संज्ञाएँ होती हैं, आहार, मैथुन, निद्रा और भय। जीव गर्भ में आए तब से लेकर मृत्यु तक ये संज्ञाएँ जुड़ी रहती ही हैं और उनके द्वारा कार्य होते रहते हैं। भय संज्ञा कैसे काम करती है? जैसे कि, एक छोटा सा पिल्ला रास्ते पर बैठा हो और गाड़ी के हॉर्न की आवाज़ सुनते ही तुरंत उठकर चलने लगता है, क्योंकि उसे भय संज्ञा के आधार पर "मर जाऊँगा तो?" ऐसा भय लगता है। अगर भय संज्ञा ना होती तो पिल्ला भी रास्ते से नहीं हटता और रास्ते में ट्रैफिक की मुश्किलें पैदा हो जातीं।

शुरू में जीव को भय संज्ञा के कारण स्वाभाविक भय होता है, लेकिन वह जैसे जैसे मनुष्य में आता है, वैसे वैसे विपरीत भय घुसता है। सुबह-सुबह अख़बार में या टीवी में चोरी, लूटपाट की घटनाएँ सुनकर खुद को लूटे जाने का भय लगता रहता है या तो "हुल्लड़ होगा तो?" ऐसा भय पैदा होता है। अरे, ज़रा बिजली चली जाए और लाइटें ना हों तो डर के मारे घबराहट शुरू हो जाती है। प्लेन में या कार में एक्सिडेंट हो जाने का भय लगता है। घर में छिपकली या कॉकरोच को देखकर भय से उछल पड़ता है। कितनों को रात में जागने पर भूत की भड़क डराती है। कोई गलत काम हो गया हो तो "मेरी आबरू चली जाएगी!" इसका भी भय लगता रहता है। एग्जाम के बाद रिज़ल्ट का भय लगता है। कहाँ भय नहीं है? कितनों को भूतकाल का भय सताता है, कितनों को भविष्य का भय लगता रहता है। इस तरह, मनुष्य की स्थिति एक भड़के हुए घोड़े के जैसी हो गई है! पराश्रित अवस्था में जीवन बीतता जा रहा है। उसमें भी कलयुग की विपरीत बुद्धि, ना हो वहाँ से भी भय पैदा कर देती है। एक भय को सौगुना करके बताती है, फिर शांतिमय जीवन जीना भी भारी हो जाता है!

परम पूज्य दादा भगवान कहते हैं कि ऐसा मनुष्यपन किस काम का? मनुष्यपन तो निडर होना चाहिए। वर्ल्ड में कोई चीज़ उसे हिला ना सके, ऐसा होना चाहिए। ऐसी निर्भय जगह कौन सी है? खुद का आत्मस्वरूप! खुद को "मैं आत्मा हूँ" ऐसा भान होने के बाद जैसे जैसे आत्म अनुभव की श्रेणियाँ चढ़ता जाता है वैसे वैसे भय समाप्त होता जाता है, भयभीत संसार में भी निर्भय आत्मस्वरूप से व्यवहार कर सकते हैं। जितना खुद को विनाशी मानता है, उतना भय उत्पन्न होता है। जब "खुद अविनाशी है" ऐसा भान होता है, तबसे निर्भय होता जाता है।

यहाँ हमें विभिन्न प्रकार के भय, उसके पीछे के कारण और उसमें से बाहर निकलने के लिए प्रैक्टिकल और व्यवहारिक उपायों की विस्तृत समझ प्राप्त होती है।

Fear due to Wrong Belief

Why do we have the feeling of fear? What is the spiritual science behind arising and dissolving fear?

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Top Questions & Answers

  1. Q. भय के कारण क्या हैं?

    A. अगर हम डर के कारणों को समझ लें, तो डर से बाहर निकलने के उपाय अपने आप मिल जाते हैं। परम पूज्य दादा... Read More

  2. Q. भूत, प्रेत, पिशाच, डायन, काली विद्या आदि का भय लगे तब क्या करें?

    A. हम रात में कोई हॉरर मूवी (भूत की मूवी) देखकर या भूत की कहानी सुनकर सो गए हों। ऊपर से उस रात हम घर... Read More

  3. Q. जीव-जंतु और जानवरों का भय कैसे दूर करें?

    A. ज़्यादातर लोगों को जीव-जंतु जैसे कि, छिपकली, तिलचट्टा, बिच्छू या साँप से डर लगता है। अगर दीवार पर... Read More

  4. Q. पुलिस और कोर्ट-कचहरी में जाने का भय लगे तब क्या करें?

    A. आमतौर पर हर एक व्यक्ति को पुलिस और कोर्ट-कचहरी का भय लगता है। पुलिस हमारे घर का दरवाजा खटखटाए तब से... Read More

  5. Q. असफलता के भय से बाहर कैसे निकलें?

    A. जीवन के हर मोड़ पर हमें असफलता का भय सताता रहता है। जब स्कूल और कॉलेज में होते हैं, तब परीक्षा,... Read More

  6. Q. अपमान के भय से कैसे मुक्त हुआ जाए?

    A. पिछले प्रश्नों में, हमने बाहरी वस्तुओं और परिस्थितियों के भय के बारें में जाना। लेकिन कुछ भय ऐसे... Read More

  7. Q. कौन से भय हितकारी हैं?

    A. जीवन में कहीं भी भय रखने जैसा नहीं है। फिर भी, ऐसी कुछ बातें हैं, जिनमें भय रखना हितकारी है। इन... Read More

Spiritual Quotes

  1. नियम ऐसा ही है कि जब अपमान का भय नहीं रहेगा, तब कोई अपमान नहीं करेगा। जब तक भय है तब तक व्यापार है, भय गया कि व्यापार बंद।
  2. जो काम करना हो उसमें शंका नहीं और शंका होने लगे तो करना मत। 'मुझसे यह काम हो पाएगा या नहीं होगा', ऐसी शंका हो तभी से काम नहीं हो पाता।
  3. वेदना तो उसे होती है कि जिसे भय हो।
  4. कुछ लोग कहते हैं कि हमें डर के मारे कपट करना पड़ता है। लेकिन डर किसका? जिसका गुनाह हो उसी को डर है न!
  5. यथार्थ प्रतिक्रमण से शंका दूर हो जाती है। शंका होने पर प्रतिक्रमण करने हैं। बेफिक्र नहीं हो जाना है। जिसने शंका की है, जो अतिक्रमण करता है, उसी से प्रतिक्रमण करवाना है।
  6. घर में अधिकतर लड़ाई-झगड़े अभी शंका से खड़े हो जाते हैं। यह कैसा है कि शंका से स्पंदन उठते हैं और स्पंदनों के विस्फोट होते हैं। और यदि नि:शंक हो जाए न तो विस्फोट अपने आप शांत हो जाएँगे। पति-पत्नी दोनों शंकावाले हो जाएँ तो फिर विस्फोट किस तरह शांत होंगे? एक को तो नि:शंक होना ही पड़ेगा।
  7. जिसका तिरस्कार करोगे, उससे भय लगेगा। साँप के, बाघ के प्रति तिरस्कार है इसलिए उनसे भय लगता है।
  8. जिस दु:ख से हम नहीं घबराते, वह सामने आएगा ही नहीं। लुटेरा भी नहीं आता और भगवान भी नहीं आते। जिसने भय छोड़ दिया है उसे कुछ भी नहीं हो सकता।
  9. अज्ञानता ही भय है।
  10. जब तक अहंकार शून्यता तक नहीं पहुँचता, तब तक संसार में भय, भय और सिर्फ भय ही है।
  11. गोपनीय काम करते हैं उन्हें सीधा करने के लिए क्या करना चाहिए? काम खुले कर देना ताकि लोकभय चला जाए।
  12. भय किसे होता है? जिसे लोभ होता है उसे।
  13. वीतराग का सार क्या है? निर्भयता।

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