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संबंधों को सुधारने के लिए प्रतिक्रमण किस तरह से करना चाहिए?

अक्सर हम अपने नज़दीक की व्यक्तियों के संबंधों में सबसे अधिक दुःख दे देते हैं। कई बार दुःख देने के बाद हम बहुत पछतावा भी करते हैं, फिर भी जब दोबारा उनके साथ व्यवहार आता है, तब उनके दोष दिखाई देने लगते हैं और फिर से उन्हें दुःख दे देते हैं। सच्चा प्रतिक्रमण कब हुआ कहा जाएगा? परम पूज्य दादा भगवान कहते हैं कि “जब घर के लोग निर्दोष दिखाई देंगे और खुद के ही दोष दिखाई देंगे, तब यथार्थ ‘प्रतिक्रमण’ होंगे।” वे समझाते हैं कि आध्यात्मिक विज्ञान की दृष्टि से संपूर्ण जगत् निर्दोष है। अपने खुद के दोषों के कारण हम जगत् में बंधे हुए हैं। जब ऐसा समझ में आएगा, तभी सच्चा समाधान प्राप्त होगा।

संबंधों में राग-द्वेष जितना ज़्यादा, उतना ज़्यादा चिकना कहा जाता है। जैसे अगर हम अपने शरीर पर तेल लगाकर फिर उस पर धूल लगाएँ, तो वह चिपक जाती है। यदि तेल की चिकनाहट न हो, तो धूल नहीं चिपकेगी। उसी तरह, जहाँ राग-द्वेष अधिक होते हैं, वहाँ कर्म भी अधिक चिपकते हैं। प्रतिक्रमण, वह राग-द्वेष की चिकनाहट को धोने का साधन है। खासकर, घर, कुटुंब और आड़ोस-पड़ोस में विशेष ध्यान रखकर इस चिकने दोष को धोने चाहिए। जिसमें मनमानी करना, आग्रह, अपेक्षाएँ, आक्षेप, पैसों के संबंध में झगड़ा, सास-बहु के बीच के मतभेद या किसी का अहंकार भग्न हुआ हो, ऐसे सभी दोषों को खूब पश्चाताप करके साफ कर देना चाहिए। अपने आस-पास के सर्कल में जिस किसी को हमनें परेशान किया हो, एक-एक को याद करके उनके प्रतिक्रमण करते रहना चाहिए। “इस जन्म में, संख्यात-असंख्यात जन्म में राग-द्वेष, अज्ञानता से जो दोष हुए हो ‘उनका’ आलोचना-प्रतिक्रमण-प्रत्याख्यान करता हूँ।“ इस तरह समझ कर दिल से प्रतिक्रमण करना चाहिए। यदि किसी व्यक्ति की मृत्यु हो गई हो, तो उनका फोटो देखकर, उनका चेहरा याद करके या उनका नाम लेकर भी प्रतिक्रमण किया जा सकता है, जिससे पूरी जिंदगी उनके लिए जो भी राग-द्वेष हुए हों, वे धुल जाएँगे।

प्रतिक्रमण का अर्थ क्या है? जोड़ना। जैसे सामने वाला व्यक्ति कपड़ा फाड़े और हम उसे सिल दें, तो वह कपड़ा लंबा टिकता है। लेकिन यदि सामने वाला भी फाड़े और हम भी फाड़ें, तो क्या होगा? सामने वाला खींचे, तो हमें ढीला छोड़ देना चाहिए। यदि सामने वाले को हमसे दुःख हो जाए और उसका प्रतिक्रमण न किया जाए, तो संबंध टूट भी सकते हैं। यदि किसी को हमसे किंचित्‌मात्र भी दुःख हो, तो समझ जाना कि हमारी ही भूल है। हमने किसी व्यक्ति पर क्रोध किया, तब हमारे भीतर के परिणाम ऊपर-नीचे हुए, इसलिए अपनी ही भूल है, ऐसा समझना चाहिए। यदि हमारी भूल से सामने वाले को कुछ भी गलत असर हो, तो तुरंत मन में माफी माँगकर प्रतिक्रमण कर लेना चाहिए। अगर गुस्सा बाहर न निकला हो और सिर्फ़ भीतर अकुलाहट हुई हो, फिर भी हम उसके लिए प्रतिक्रमण नहीं करते, तो उतना दाग़ हमारे भीतर रह जाता है। जब हम प्रतिक्रमण करते हैं, तब हमें यह नहीं देखना चाहिए कि सामने वाले को जो असर हुई थी वह खत्म हुई या नहीं, बल्कि हमें अपने दोष साफ़ करने के ऊपर ध्यान देना चाहिए। जैसे किसी से उधार लिया हुआ पैसा वापस कर देने से हिसाब पूरा हो जाता है, वैसे ही प्रतिक्रमण कर लेने से कर्म का हिसाब साफ़ हो जाता है। क्रोध, मान, माया और लोभ के कषायों से ही कर्मों का व्यापार चालू रहता है और वही हमें संसार में भटकाते रहते हैं।

जीवन में भूल हुए बिना नहीं रहती, नई गलतियाँ तो होने वाली ही हैं। लेकिन, वे भूल हमें भूल लगनी चाहिए। उनका रक्षण नहीं करना चाहिए। साथ ही जो गलतियाँ हमें दिखाई दें, उनका पश्चात्ताप करना चाहिए और ऐसी गलतियाँ फिर से नहीं करूँगा, ऐसा प्रत्याख्यान करना चाहिए। इस तरह जब भी कोई भूल हो जाए, तब तुरंत उसेशूट ऑन साइट’ प्रतिक्रमण करके धो देना चाहिए।

सामने वाले का ध्यान रखते हुए प्रतिक्रमण

सामने वाले का विचार करके और उसका ख्याल रखकर हर एक कार्य करना, उसी को मानवीय अहंकार कहते हैं। जबकि, अपना ही विचार करके, अपना ही ख्याल रखकर हर एक के साथ बर्ताव करना और दूसरों को नुकसान पहुँचाना, उसे पाशविकअहंकार कहते हैं। जैसे किसी जानवर को भूख लगती है, तो वह दूसरे जीव को मारकर या दूसरों का खाना छीनकर भी खा लेता है। उसे फर्क नहीं पड़ता कि सामने वाले को दुःख या नुकसान हो रहा है। उसी प्रकार, जो मनुष्य अपने सुख के लिए दूसरों को अहंकारपूर्वक दुःख दे और दुःख देने के बाद पछतावा भी न करे और ऊपर से खुश हो, अणहक्क के विषय या अणहक्क की लक्ष्मी का भोग करे, तो यह पाशविक स्वभाव कहलाता है। हमारा पाशविक स्वभाव बदल जाना चाहिए। जब हम किसी व्यक्ति को कठोर शब्दों में डाँटते हैं, तब हमें यह विचार आना चाहिए कि कोई हमें ऐसे डाँटे, तो हमें कैसा लगेगा?

कई बार हमें पता ही नहीं चलता कि सामने वाले व्यक्ति को हमसे दुःख हो गया है। हमारे शब्द भारी निकलते हैं, तो हमें पता चल ही जाता है कि सामने वाले को ये शब्द चोट पहुँचाएँगे। ऊपर से सामने वाले का चेहरा उतर जाए और चेहरे की मुस्कान चली जाए, तब पता चलता है कि सामने वाले को असर हो गया है। तब प्रतिक्रमण कर लें, तो सामने वाले को जो असर हो रहा था, वह बिल्कुल भी नहीं होता।

शब्दों के घाव लगें, वहाँ प्रतिक्रमण

घर में भोजन करते समय दाल में मिर्च ज़्यादा हो गई हो, तो हम चिल्लाने लगते हैं कि “यह दाल खराब कर दी, तुम्हें बनाना नहीं आता” आदि। अब उस समय तो क्रोध आ गया, लेकिन बाद में हमें जब समझ में आए कि यह तो भूल हो गई, कि हम एडजस्ट होने के बदले चिढ़कर सामने वाले को दुःख हो ऐसा बोल गए, तब हमें प्रतिक्रमण कर लेना चाहिए। एडजस्ट होना अर्थात् क्या? अगर दाल तीखी हो, तो चावल या रोटी ज़्यादा लेकर निपटारा कर दो, लेकिन बनाने वाले को दुःख नहीं देना चाहिए। लेकिन, ऐसा व्यावहारिक समाधान लाना न आए, तो बाद में भी तुरंत प्रतिक्रमण कर लेना चाहिए।

घर के व्यक्ति के कलेजे में घाव लगे ऐसे शब्द निकलें, फिर ये घाव भरते नहीं। जब घर में एक-दूसरे का अहंकार आहत होता है, तब अहंकार नोट करता है। यदि पति की तरफ़ से ऐसे दुःख मिलें, तो पत्नी का मन उसे नोट कर लेता है और फिर वह मन में ठान लेती है कि “जब मुझे मौका मिलेगा, तब मैं इन्हें सीधा कर दूँगी।” इसलिए, फिर झगड़ा वहाँ खत्म होने के बजाय मन में आगे बढ़ता है। दूसरी बार मौका मिलने पर पत्नी पति को ताना मारती है या कटु शब्द कहती है। दादाश्री कहते हैं कि अगर मन से घाव किए हों, तो मन से प्रतिक्रमण करने चाहिए। लेकिन, अगर शब्दों से घाव पड़े हों और ऐसे दुःख दे दिए हों, वहाँ हो सके तो उस व्यक्ति से प्रत्यक्ष माफ़ी माँगनी चाहिए।

बच्चों को डाँट दिया हो, वहाँ प्रतिक्रमण

घर में जब बच्चे कोई गलती करते हैं, तो माँ-बाप उन्हें क्रोध में पीट देते हैं। बाद में उसके प्रतिक्रमण नहीं करते, तो कर्म बँधते ही रहते हैं। परम पूज्य दादाश्री कहते हैं “बेटे को मारने का अधिकार नहीं है, समझाने का अधिकार है।” लेकिन, माँ-बाप से गलती कहाँ होती है? कि वे बच्चों को बात-बात में टोकते हैं और कुछ भी बोल देते हैं। यह बात-बात में अड़ाई करता है, इसे मार पड़नी ही चाहिए, बच्चें सुनते ही नहीं हैं, नलायक हैं, बदमाश हैं।” ऐसा कितना कुछ नेगेटिव बोल देते हैं। बच्चों को घर में ज़रा सा भी प्रेम नहीं मिलता। फिर वे बाहर गर्लफ्रेंड–बॉयफ्रेंड के चक्कर में पड़ जाते हैं और जब घर में पता चलता है तो और मार पड़ती है। माँ-बाप को पता नहीं चलता कि पूरे दिन उनके दिमाग में नेगेटिव शब्द डालते रहते हैं “यह ऐसी है, यह ऐसा है।” परिणामस्वरूप कुछ बच्चों को तो मानसिक रोग घेर लेते हैं। माता-पिता को बच्चों को प्रेम, हूँफ, और समझ देनी चाहिए। बच्चों का ज़रा भी गलत व्यवहार दिखे, तो उनके प्रति प्रेम रखें और उसके प्रतिक्रमण करके वापस लौटें। नहीं तो इन बच्चों की मानसिकता इतनी बिगड़ जाएगी कि वे आगे जीवन में कहीं भी सफल नहीं हो सकेंगे।

परम पूज्य दादाश्री कहते हैं कि “कैसा भी पागल व्यक्ति हो, लेकिन वह अपने (दादाजी के बताए हुए) प्रतिक्रमण से सयाना बन सकता है।“ हमने अपने अहंकार से सामने वाले को कुचल-कुचलकर इतना दुःख पहुँचाया है, इसलिए वह मानसिक बीमारी का शिकार हो जाता है। हमारे सद्‌भाव से और प्रतिक्रमण करने से सामने वाले की ‘मशीनरी’ में बदलाव आ जाता है, वह उल्टे में से सीधा घूम जाता है और सुधर सकता है।

उपरी-अन्डरहैन्ड के प्रतिक्रमण

नौकरी या व्यापार करते समय अपने नीचे काम करने वालों की गलती निकालने से गुनाह लगता है। उसके प्रतिक्रमण करने चाहिए। सभी अपनी-अपनी जिम्मेदारियाँ निभाते हैं। जो काम करते हैं, उन्हीं से गलती होती है। बाहर अगर पुलिस या मजिस्ट्रेट से गलती होती है, तो हम उन्हें कहने नहीं जाते। तो हमारे नीचे काम करने वाले, हमारे आश्रित कहलाते हैं, उनकी गलतीयाँ नहीं निकालनी चाहिए। उन्हें समझाकर कहना चाहिए और बार-बार कहने के बावजूद भी गलती हो, तो नटकीय रूप से कहना चाहिए कि "अगर ऐसे ही चलता रहा, तो आपकी नौकरी कैसे रहेगी?" जो लोग बिल्कुल काम ही नहीं करते, उन्हें हमें चेतावनी देनी चाहिए कि "अगर ऐसा चलता रहा तो, आपको कम से निकालना पड़ेगा, ड‍िसमिस करना पड़ेगा, इसलिए आप सतर्क होकर काम करिए।" और कभी संयोगवश किसी को ड‍िसमिस करना भी पड़े, तो भीतर ही भीतर माफी माँग लेनी चाहिए। अगर सत्ता या सीट के अहंकार के कारण लोगों का अपमान किया हो, लोगों को दुत्कारा हो या अपने कठोर स्वभाव के कारण लोगों को दुःख पहुँचाया हो, तो उसके प्रतिक्रमण ज़रूर करने चाहिए। जिस ऑफिस में हम नौकरी कर रहे है, वहाँ अपने असिस्टेंट को बेवकूफ कहते है, तो वह हमारी ख़ुद की अक्ल में अंतराय का कारण बनता है।

यदि हम किसी व्यक्ति से अच्छे तरीके से बात करें, फिर भी वह हमारे साथ मुँह फुलाकर बात करे, बिना किसी कारण के हमारे साथ कपट करे या हमारे प्रति बैर या द्वेष रखे, तो समझना कि यह अपने ही गुनाह का रिएक्शन है। इसलिए, उसके प्रतिक्रमण करने चाहिए। यदि हमें किसी व्यक्ति के प्रति ईर्ष्या हो या हमारे अहंकार और अभिमान के कारण सामने वाले को दुःख हो जाए, तो भी हमें पश्चात्ताप करना चाहिए।

दूसरी ओर, अगर हमारे बॉस या उपरी हमें डाँट दे, तो उनकी गलती नहीं देखनी चाहिए, बल्कि हमारी किस गलती के कारण उन्हें ऐसा कहना पड़ा, वह ढूँढ निकालना चाहिए। अपनी गलतियों को सुधारते रहना चाहिए और उपरी के साथ विनयपूर्वक व्यवहार रखना चाहिए। “मैं तो किसी की सुनूँगा ही नहीं” ऐसे अहंकार के कारण अगर हमारे उपरी के दोष दिखते हों, तो वहाँ अपने अहंकार को लघु रखकर व्यवहार पूरा करना चाहिए।

साथ में काम करने वालों में टकराव तो होते ही है। लेकिन, उस टकराव में एक-दूसरे से अलग न हो जाएँ, बस इतना ध्यान रखना चाहिए। फिर भी टकराव हो जाए, तो प्रतिक्रमण कर लेना चाहिए, ताकि दोष की एक परत खत्म हो जाए।

अभिप्राय के विरुद्ध प्रतिक्रमण

भूतकाल के अनुभवों के आधार पर हमें घर या नज़दीक के व्यक्तियों के प्रति अभिप्राय पड़ जाते हैं। जैसे कि, “उस दिन उसने ऐसा किया था, आज भी ऐसा ही करेगा। उन्हें ऐसा नहीं करना चाहिए। व्यवहार तो ऐसा होना चाहिए।” इस प्रकार अभिप्रायों के आधार पर व्यक्ति को दुःख दे देते हैं। कई बार किसी व्यक्ति के प्रति इतने पूर्वग्रह होते हैं, कि उसे देखते ही वह जागृत हो जाता है कि वह “ऐसा ही करेगा।” और उसे देखते ही अभाव होने लगता है। हमें सामने वाले व्यक्ति के लिए खराब भाव हों, तो उसकी असर सामने वाले को पहुँचती है और उसका स्वाभाव भी चिढ़ने लगता है। इसलिए उसके प्रतिक्रमण बार-बार करते ही रहने चाहिए।

व्यक्ति के अभिप्राय के विरुद्ध प्रतिक्रमण के दो भाग होते हैं। एक तो, उस व्यक्ति के लिए ऐसे गलत अभिप्राय दिए, उसकी माफी माँगते जाएँ। इससे सामने वाले पर उसकी असर नहीं रहती। दूसरा, सामने वाले के लिए जो नेगेटिव अभिप्राय हैं, ठीक उनके विपरीत पोज़िटिव अभिप्राय मन में बिठा लेनी चाहिए। अगर किसी व्यक्ति के लिए हमें लगता हो कि “यह व्यक्ति खराब है, नलायक है”, तो उसकी जगह “यह व्यक्ति बहुत लायक है, आखिरकारबहुत अच्छा इंसान है, उपकारी है।” ऐसे सेट करना देना चाहिए।

दोषित दिखे उसके प्रतिक्रमण

जब भी किसी व्यक्ति के लिए हमारे भाव बिगड़ें, तो भीतर भेद रूपी एक दीवार खड़ी हो जाती है। फिर सामने वाले को भी नेगेटिव स्पंदन पहुँचते हैं और वह दीवार लंबी और चौड़ी होती जाती है। यदि हम भाव बिगड़ने के प्रतिक्रमण कर लें, तो हमारी तरफ़ की दीवार टूट जाती है, फिर व्यक्ति के प्रति भेद धीरे-धीरे कम होकर समाप्त हो जाता है।

संबंधों में जैसे-जैसे हम प्रतिक्रमण करते जाएँगे, वैसे-वैसे दोष हल्के होते जाएँगे और व्यक्तियों के साथ व्यवहार में हमारा मन शुद्ध होता जाएगा। परम पूज्य दादाश्री कहते हैं, कि, “एक व्यक्ति के साथ आपको बिल्कुल रास नहीं आता है। उसका यदि आप पूरे दिन प्रतिक्रमण करो, दो-चार दिन तक करते रहो, तो पाँचवें दिन तो आपको खोजता हुआ यहाँ आएगा।“

यदि कोई व्यक्ति हमारा ज़बरदस्त अपमान करे, तब भी उसे दोषित देखने के बजाय प्रतिक्रमण करने चाहिए, कि "मेरे कर्मों के उदय से ही सामने वाले को ऐसा करना पड़ा। उसका मैं प्रतिक्रमण करता हूँ और फिर ऐसा नहीं करूँगा, जिससे किसी को मेरे कारण कर्म बाँधना पड़े।" क्योंकि, अपमान करने वाले पर बड़ी ज़ोखिमदारी आती है। हमारा अपमान हुआ, वह आज की भूल का दंड नहीं है। इस जन्म में जितना भी हमें झेलना पड़ता है, वह हमारे पूर्व के भावों का परिणाम है। हमारे जीवन में जो भी इफेक्ट आती हैं, वे हमारे ही कॉज़ेज़ की हैं। इफेक्ट देने के लिए अलग-अलग व्यक्ति या संयोग माध्यम बनते हैं। अगर यह समझ और जागृति हाज़िर रहे, तो अपमान करने वाला हमें निर्दोष दिखेगा और हमें अपनी ही भूल का पछतावा होगा। अगर अपमान करने वाला दोषित दिखेगा, तो दो व्यक्ति मिलकर उसकी बुराई करेंगे, कि "यह कितना गलत कर रहा है" जिससे और अधिक कर्म बँधेंगे और हमारा अगला जन्म बिगड़ेगा।

तिरस्कार के प्रतिक्रमण

घर के सदस्य पूर्व के ऋणानुबंध से हमारे नज़दीक आते हैं। परम पूज्य दादाश्री कहते हैं, “हमें जिसके साथ पूर्व का ऋणानुबंध हो और वह हमें पसंद ही ना हो, उसके साथ रहना ही पसंद ना हो और फिर भी अनिवार्य रूप से सहवास में रहना पड़ता हो, तो क्या करना चाहिए? बाहर का व्यवहार उसके साथ रखना चाहिए, लेकिन अंदर उसके नाम के प्रतिक्रमण करने चाहिए। क्योंकि, हमने पिछले जन्म में अतिक्रमण किया था, यह उसका परिणाम है। कॉज़ेज़ क्या किए थे? तो उसके साथ पूर्व जन्म में अतिक्रमण किया था। उस अतिक्रमण का इस जन्म में फल आया। यानी उसका प्रतिक्रमण करेंगे तो प्लस-माइनस (जोड़ना-घटाना) हो जाएगा। अत: अंदर आप उसके लिए माफी माँग लो। माफी माँगते रहो कि ‘मैंने जो-जो दोष किए हैं, उसके लिए माफी माँगता हूँ’। किसी भी भगवान की साक्षी में माफी माँग लो, तो सब खत्म हो जाएगा।”

जिस व्यक्ति का सहवास पसंद न हो, उसके बहुत दोष दिखाई देते हैं। जिनके बहुत दोष देखते हैं, उनके प्रति तिरस्कार उत्पन्न होता है और परिणामस्वरूप हमें उस व्यक्ति से भय लगने लगता है। उसे देखते ही घबराहट होने लगती है। उस भय से छूटने के लिए जिस व्यक्ति के प्रति तिरस्कार हुआ हो, उस व्यक्ति के भीतर बैठे भगवान से माफी माँगनी चाहिए कि “हे भगवान! मैं क्षमा माँगता हूँ।” तब दोष धुल जाएँगे और तिरस्कार ख़त्म हो जाएँगे।

तिरस्कार सहित दुत्कारने के प्रतिक्रमण

यदि सामने वाले का मन टूट गया हो, तो उनके रूबरू जाकर कहना चाहिए कि "मैं मूर्ख हूँ। मुझसे ऐसी भूल हो गई, मैंने आपको बहुत मुश्किल में डाल दिया, उसकी माफी माँगता हूँ।" इससे हमारे अहंकार का पारा नीचे उतरता है और सामने वाले के अहंकार के घाव भरते हैं, जिससे उसे शांति मिलती है और फिर वह हमें माफ कर देता है।

हमें तब तक प्रतिक्रमण करते रहना चाहिए, जब तक सामने वाले का मन हमारे लिए फिर से बदल नहीं जाता। किसी व्यक्ति को हमसे जितना दु:ख हो गया हो, उतने ही प्रतिक्रमण करने पड़ेंगे। किसी व्यक्ति के शरीर को जो दु:ख पड़ता है, उससे कहीं ज्यादा अहंकार के घाव का दुःख बहुत ज़्यादा होते है। हमें वह दुःख मिटाना आना चाहिए।

शंका के प्रतिक्रमण

जीवन में कदम-कदम पर शंका होती रहती है। नज़दीक की व्यक्तियों के प्रति जहाँ अत्यंत राग होता है, वहाँ शंका अधिक होती है। पति-पत्नी में यदि एक-दूसरे के लिए अत्यधिक मालिकी भाव हो तो वहाँ या बच्चों के युवावस्था में आने पर उनका चरित्र बिगड़ जाएगा, इस विचार से सबसे अधिक शंका होती है।

शंका वह आत्मघाती लक्षण है। शंका मनुष्य को भीतर से खोखला कर देती है। इसलिए, शंका को उत्पन्न ही नहीं होने देना चाहिए और अगर हो जाए तो तुरंत उसका प्रतिक्रमण करना चाहिए। किसी के लिए ज़रा सा भी उल्टा विचार आए तो उसे तुरंत धो देना चाहिए। “अगर ऐसा होगा तो?” ऐसी शंका अगर बहुत हो, तो जाँच कर लेनी चाहिए और आकर आराम से सो जाना चाहिए। वास्तव में तो, जब भी शंका करने वाला विचार आए, तो उसे तुरंत उखाड़कर फेंक देना चाहिए।

वैर से छूटने के लिए प्रतिक्रमण

जब किसी भी व्यक्ति को दुःख होता है या उसके अहंकार को चोट पहुँचती है, तो अहंकार उसे नोट कर लेता है और फिर वैर लेता है। अगर सामने वाला व्यक्ति ताकतवर हो और बोल सके ऐसा हो तो, तो पलटकर जवाब दे देता है, जबकि कमज़ोर व्यक्ति कुछ बोल नहीं पाता, तो वह भीतर गाँठ बाँध लेता है। कुदरत का नियम ऐसा है कि अगले जन्म में वह कमज़ोर व्यक्ति ताकतवर होता है और ताकतवर अगले जन्म में कमज़ोर होता है और इस तरह वह वैर वसूल होता है।

यदि हम जाने-अनजाने सामने वाले व्यक्ति के अहंकार को ठेस पहुँचा दें, तो वह उसे भूलता ही नहीं है। "मैं देख लूँगा, बदला लूँगा" ऐसे गाँठ बाँधता है और फिर हम पूरी जिंदगी न भूल पाएँ, ऐसा दुःख दे देता है। पार्श्वनाथ भगवान ने जब अपनी पत्नी और भाई के व्यभिचार की शिकायत राजा से की थी, तो उनके सगे भाई ने ऐसा वैर बाँधा जो अगले नौ जन्मों तक चला। किसी जीव को कष्ट न हो, इस तरह से जीवन जीना चाहिए और कोई हमें कष्ट दे तो हमारा हिसाब है, ऐसा समझकर जमा कर लेना चाहिए, तभी वैर से छूटेंगे। वैर से वैर बढ़ता है, इसलिए किसी भी प्रकार से माफी माँगकर वैर से छुटकारा पाना चाहिए। जिन-जिन व्यक्ति को हमसे दुःख हुआ है, उनके प्रतिक्रमण करने चाहिए। जितना अधिक दुःख दिया हो, उतने ही अधिक प्रमाण में प्रतिक्रमण करना पड़ेगा। वैर से छूटने का प्रतिक्रमण ही एकमात्र उपाय है।

निकट संबंधियों में, यदि वे एक ही गुरु के शिष्य जो धर्मबंधु होते हैं, उनमें भी स्पर्धा और ईर्ष्या के कारण वैर बँध जाता है। जन्म-जन्मांतर से "मैं ऊँचा, तू नीचा", "मैं आगे, तू पीछे" ऐसे अहंकार के तूफान चलते रहते हैं, जिसके कारण सहाध्यायियों में सबसे ज़्यादा वैर बँधते हैं। मान लीजिए, कोई नया शिष्य आए तो पुराने शिष्य को पहले उस पर राग होता है, फिर जैसे-जैसे वह शिष्य गुरु के अधिक नज़दीक आता है, वैसे-वैसे उसके प्रति द्वेष बढ़ता है। इसलिए, सहाध्यायियों के तो प्रत्यक्ष रूप से चरण स्पर्श करके प्रतिक्रमण करने चाहिए, जिससे इस वैर से छूट सकें।

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