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अर्जुन ने विराट दर्शन में क्या देखा था?

भगवद् गीता के ग्यारहवें अध्याय में अर्जुन श्रीकृष्ण भगवान से विनती करते हैं कि, “हे योगेश्वर! यदि आप मानते हैं कि मैं दर्शन के लिए समर्थ हूँ, तो अपने अव्यय (अविनाशी) स्वरूप का दिखाने की कृपा करें!” और तब श्रीकृष्ण भगवान ने अर्जुन को विराट विश्वदर्शन करवाया था। वह विराट दर्शन अर्थात् क्या? उसमें क्या देखा? अर्जुन ने विश्वदर्शन किस दृष्टि से देखा? उससे अर्जुन में क्या परिवर्तन हुआ? इन सभी का खुलासा करते हुए परम पूज्य दादा भगवान कहते हैं कि, “वह विश्वदर्शन, वह आत्मज्ञान नहीं है। ये कितने सारे जन्म लेते हैं और मर जाते हैं, फिर जन्मते हैं, ऐसे कालचक्र में सभी खपते रहते हैं, इसलिए कोई मारने वाला नहीं है, कोई जिलाने वाला नहीं है, इसलिए हे अर्जुन, तुझे जो मोह है, 'मैं मार रहा हूँ', वह गलत है, उसे छोड़ दे। इसलिए कृष्ण ने अर्जुन को भयानक रौद्र रूप दिखाया था, सभी को मृत दिखाया था। वह विराट स्वरूप अर्जुन को बताया। एक बार तो अर्जुन घबरा गया। फिर उसे समझ में आ गया, इसलिए वह लड़ने के लिए तैयार हो गया। फिर उन्होंने उसे सौम्य रूप बताया।"

श्रीकृष्ण भगवान अर्जुन से कहते हैं कि, “तुम अपने चर्मचक्षु से मेरे स्वरूप का दर्शन नहीं कर सकते, इसलिए मैं तुम्हें दिव्यदृष्टि प्रदान करता हूँ। उससे तुम मेरा भव्य ऐश्वर्य देखो।”

वह दिव्यदृष्टि अर्थात् सुदर्शन। हम श्रीकृष्ण भगवान के सुदर्शन चक्र को पहचानते हैं, जो उनकी उँगली पर गोल-गोल घूमता हुआ एक हथियार था, जिससे शत्रु का मस्तक कट जाता था, ऐसा जानते हैं लेकिन श्रीकृष्ण भगवान का सुदर्शन वह कोई चक्र नहीं था। सुदर्शन अर्थात् ‘सु’ + ‘दर्शन’। श्रीकृष्ण भगवान को तीर्थंकर प्रभु श्री नेमिनाथ भगवान से सम्यक् दर्शन की प्राप्ति हुई थी, उसे सुदर्शन कहा गया।

श्रीकृष्ण भगवान ने भगवद् गीता का उपदेश देते समय कुछ समय के लिए अर्जुन को जो दिव्यचक्षु दिए थे, उनसे अर्जुन को “आत्मवत् सर्वभूतेषु” अर्थात्, सभी जीव आत्मा स्वरूप में दिखते हैं।

श्रीकृष्ण भगवान ने कहा है कि, ज्ञानी पुरुष आपके अनंतकाल के पापों को भस्मीभूत कर देते हैं। केवल पापों को जला देते हैं इतना ही नहीं, बल्कि साथ ही साथ उन्हें दिव्यचक्षु देते हैं और स्वरूप का लक्ष्य बिठा देते हैं!”

श्रीकृष्ण भगवान के विराट स्वरूप के दर्शन से पहले तो अर्जुन भयभीत हो गए, लेकिन उसे देखने के बाद अर्जुन ने अपना सारा अहंकार भगवान श्रीकृष्ण को अर्पण कर दिया। परम पूज्य दादाश्री कहते हैं कि, “जो दूसरों का अहंकार ले लेते हैं, वे विराट पुरुष कहलाते हैं।"

वे यहाँ हमें विराट दर्शन क्या होता है, यह समझाते हैं।

दादाश्री: विराट के दर्शन अर्थात् ज्ञानीपुरुष को पहचानना। सही अर्थ में विराट किसे कहते हैं कि जो हमारे अंहकार को भी खा जाएँ। जो हमारे अंहकार का भक्षण कर लें, उन्हें विराट कहते हैं! और उसका फल क्या आता है? वे हमें विराट बनाते हैं। विराट स्वरूप के बगैर कोई झुकता ही नहीं है न! कृष्ण भगवान ने अर्जुन को ऐसा विराट स्वरूप बताया था, तभी वह झुका था न, वर्ना तो नहीं झुकता था।

लाखों जन्मों में भी यह अहंकार जाए, ऐसी चीज़ नहीं है। तब एक व्यक्ति ने मुझसे कहा, 'आपने मेरा अहंकार ले लिया!' तो वही विराट पुरुष हैं! और पुस्तकों में विराट पुरुष खोजने जाते हो? जो हमारा अहंकार ले लेते हैं, वे विराट पुरुष हैं; इस दुनिया में और कोई विराट पुरुष कैसे हो सकता है?

विराट स्वरूप किन्हें कहते हैं कि जिनमें बिल्कुल भी बुद्धि नहीं होती, नाम मात्र को भी बुद्धि नहीं होती। वे तो इधर-उधर से मारकर अहंकार को निकाल देते हैं जैसे टायर में से हवा निकालते हैं न! अतः जिनका अहंकार संपूर्ण रूप से चला गया हो, वे ही (किसी का अहंकार) ले सकते हैं। अतः जिनका खुद का अहंकार खत्म हो चुका है, वे ही ले सकते हैं। जिनका खुद का अहंकार खत्म हो चुका है, वही आत्मज्ञानी हैं। जो औरों का अहंकार ले लेते हैं, वही विराट पुरुष !

कुरुक्षेत्र के बीच श्रीकृष्ण भगवान ने “मैं अपने संबंधियों के विरुद्ध युद्ध नहीं करूँगा” ऐसा कहकर हताश हुए अर्जुन को अद्भुत गीता बोध दिया और अंत में विराट विश्वदर्शन करवाया। इस विश्वदर्शन में जगत् की वास्तविकता का, उसके विनाशीपन का दर्शन हुआ, जिसके परिणामस्वरूप अर्जुन के कर्तापन का अहंकार पूरी तरह पिघल गया और उन्होंने भगवान के शरण में समर्पण कर दिया।

श्रीकृष्ण भगवान ने चौथे अध्याय में ऐसा भी कहा है कि ऐसे विराट ज्ञानी पुरुष बार-बार अवतार लेते रहते हैं।

यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत ।
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम् ॥ ७॥

परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम् ।
धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे ॥ ८॥

अर्थात्, “हे अर्जुन! जब-जब धर्म का अस्त होता है और अधर्म का उदय होता है, तब-तब मैं इस पृथ्वी पर प्रकट होता हूँ। सज्जनों की रक्षा करने के लिए, दुष्टों का विनाश करने के लिए और धर्म की स्थापना के लिए मैं युग-युग में जन्म लेता हूँ।”

इसका अर्थ यह नहीं है कि श्रीकृष्ण भगवान खुद बार-बार अवतार लेते हैं। जैसे एक प्रधानमंत्री होता है,
वह चला जाता है, फिर दूसरा प्रधानमंत्री आता है, और प्रधानमंत्री के पद पर जो होता है वह देश की मदद करता है। उसी प्रकार श्रीकृष्ण भगवान जैसी स्थिति वाला आत्मा बार-बार अवतार लेगा। श्रीकृष्ण भगवान का आत्मा प्रकट हुआ है, वैसा ही प्रकट आत्मा दूसरे शरीर में अवतरित होगा। ज्ञानी पुरुष और तीर्थंकर भगवान अवतार लेते रहते हैं और दुनिया में लोगों को सुख-शांति का, सभी दुखों से मुक्ति का और मोक्ष का मार्ग दिखाते हैं, और लोगों का कल्याण करके मोक्ष में चले जाते हैं।

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