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आप वास्तव में कौन हैं?

अनादिकाल से, हम खुद देह स्वरूपमें ही रहे और देह को ही सब कुछ माना है। उसके कारण देह को जो कुछ भी होता है तो हम उससे प्रभावित होते हैं। परिणामस्वरूप, हम सुखी या दुखी हो जाते हैं । कायमी सुख की तलाश में हम इधर-उधर भटकते हैं और दुःख से भागने की कोशिश करते हैं। इस उन्माद में, हम असंख्य अच्छे और बुरे कर्मों को बांधते हैं और इस तरह बाकी का जीवन जीते हैं। अपने अगले जीवन में जब हम कर्म के बीज को भुगतते हैं तो सवाल उठता है कि, 'मेरे साथ ऐसा क्यों हो रहा है?' बस इसी तरह हम अनंत जन्मो से गुज़रे हैं और अभी तक हम इस सांसारिक जीवन का हल नहीं खोज पाए हैं। 

सिद्धांत यह है कि आप जिसे भी अपना मानते हो, तो वह आपको प्रभावित (असर) करेगा | जो कुछ भी आप मानते हैं कि वह आपका नहीं है, वह आपको प्रभावित नहीं करेगा। जिस समय से आप मानते हैं कि यह शरीर आपका है, तो वह आपके लिए बंधनकर्ता है और जब आप देह को पराया स्वरूपमें जानेंगे तो आप स्वतंत्र (देह से मुक्त) हो जाते हैं। 

तो अगर आप यह शरीर नहीं हो तो आप कौन हो और खुद की वास्तविक पहचान केसे जान सकेंगे? 

उसके लिए देखिये, परम पूज्य दादा भगवान “आप वास्तव में कौन हैं” के बारे में क्या कहते हैं। 

दादाश्री  : आप कौन हो?

प्रश्नकर्ता : मैं चन्दुलाल हूँ।

दादाश्री : आपका नाम क्या है?

प्रश्नकर्ता : मेरा नाम चन्दुलाल है।

दादाश्री : क्या आप को 'मैं चन्दुलाल हूँ' और 'मेरा नाम चन्दुलाल है' यह कथनों में विरोधाभास देखते हैं? नाम और सत्ता जिसे यह संबंधित है, वह एक और एक ही कैसे हो सकता है? जब कोई व्यक्ति मर जाता है , तो उसके अंतिम संस्कार के दौरान उसका नाम उससे दूर कर दिया जाता है, क्या यह नहीं है? इसे जनगणना के रिकॉर्ड से भी हटा दिया जाता है।

यह हाथ किसका है? यह पैर किसका है?

प्रश्नकर्ता : वे मेरे हैं।

दादाश्री : वे सभी इस शरीर के अंग हैं। उन सब में तुम्हारा क्या है? आपके भीतर का मन किसका है ?

प्रश्नकर्ता : यह मेरा है।

दादाश्री : वाणी के बारे में क्या ?

प्रश्नकर्ता : वह मेरी है।

दादाश्री : यह शरीर किसका है?

प्रश्नकर्ता : वह भी मेरा है।

दादाश्री : जब आप कहते हैं, 'यह मेरा है', तो आपको यह नहीं लगता कि शरीर के इन हिस्सों का मालिक शरीर से अलग है?

प्रश्नकर्ता : हाँ।

दादाश्री : फिर क्या आपने कभी सोचा है कि आप वास्तव में कौन हैं?

"आप कौन हो" के संबंधित विज्ञान

क्या आपको जांच नहीं करनी होगी कि आप वास्तव में कौन हैं? आप कितने समय तक अंधेरे में रहेंगे, अपने असली सवरूप से अनजान रहके? क्या आपको नहीं लगता कि अपने असली सवरूप की जांच ना करना यह अज्ञानता है? केवल आप जब "आप कौन हैं?" यह प्रश्न के उत्तर का अनुभव करेंगे हैं तब आपकी रोंग बिलीफ (अज्ञान मान्यताएँ) बंद हो जाएगी। इस रोंग बिलीफ के कारण ही आप एक जन्म से दूसरे जन्मा में भटक रहे हैं। आप अपनी वास्तविक पहचान नहीं जानते हैं और इसके अलावा आप अपने आप को प्रभावित करते हैं, उस विश्वास को जो आप नहीं हैं। आपने यह रोंग बिलीफ को अपने वास्तविक स्वरूप (आत्मा) पर आरोपित कर दिया है।

अज्ञान मान्यताओं के बारे में अधिक समझ 

दादाश्री : ‘मैं चंदूभाई हूँ’ यह मान्यता, यह बिलीफ तो आपकी, रात को नींद में भी नहीं जाती न! फिर लोग हमारी शादी करवा के हमसे कहते हैं कि ,‘तू तो इस स्त्री का पति है।’ इसलिए हमने फिर पतिपना मान लिया। उसके बाद ‘मैं इसका पति हूँ, पति हूँ’ करते रहे। कोई सदा के लिए पति रहता है क्या? डाइवोर्स होने के बाद दूसरे दिन उसका पति रहेगा क्या? अर्थात ये सारी रोंग बिलीफ बैठ गई हैं।

अत: ‘मैं चंदूभाई हूँ’ वह रोंग बिलीफ है। फिर ‘इस स्त्री का पति हूँ’ वह दूसरी रोंग बिलीफ। ‘मैं वैष्णव हूँ’ वह तीसरी रोंग बिलीफ। ‘मैं वकील हूँ’ वह चौथी रोंग बिलीफ। ‘मैं इस लड़के का फादर हूँ’ वह पाँचवी रोंग बिलीफ। ‘इसका मामा हूँ’, वह छट्ठी रोंग बिलीफ। ‘मैं गोरा हूँ’ वह सातवीं रोंग बिलीफ। ‘मैं पैंतालीस साल का हूँ’, वह आठवीं रोंग बिलीफ। ‘मैं इसका पार्टनर हूँ’ यह भी रोंग बिलीफ। आप ऐसा कहो कि ‘मैं इन्कम टैक्स पेयर हूँ’ तो वह भी रोंग बिलीफ है।

‘मैं चंदू भाई हूँ’ यह अहंकार है। क्योंकि जहाँ ‘मैं’ नहीं है, वहाँ पर ‘मैं’ का आरोपण किया है। इसी को अहंकार कहते हैं।

प्रश्नकर्ता : ‘मैं चंदू भाई हूँ’ कहने में अहंकार कहाँ आया? ‘मैं ऐसा हूँ, मैं वैसा हूँ’ ऐसा करे तो अलग बात है, लेकिन सहजभाव से कहते हैं तो उसमें अहंकार कहाँ आया?

दादाश्री : सहजभाव से बोलने से क्या अहंकार चला जाता है ? ‘मेरा नाम चंदू भाई है’ ऐसा सहजभाव से बोलने पर भी वह अहंकार ही है। क्योंकि आप ‘जो हो’ वह जानते नहीं हो और ‘जो नहीं हो’ उसका आरोपण करते हो, वह सब अहंकार ही है न!

‘आप चंदू भाई हो’ वह ड्रामेटिक चीज़ है। अर्थात् ‘मैं चंदू भाई हूँ’ ऐेसा कहने में हर्ज़ नहीं है लेकिन ‘मैं चंदू भाई हूँ’ ऐसी बिलीफ नहीं होनी चाहिए।

प्रश्नकर्ता : हाँ, वर्ना ‘मैं’ पद आ जाता है।

दादाश्री : ‘मैं’ ‘मैं’ की जगह पर बैठे तो अहंकार नहीं है। ‘मैं’ मूल जगह पर नहीं है, आरोपित जगह पर है। इसलिए अहंकार है। ‘मैं’ आरोपित जगह से हट जाए और मूल जगह पर बैठ जाए तो अहंकार चला जाएगा। अर्थात् ‘मैं’ को निकालना नहीं है, ‘मैं’ को उसके एक्ज़ेक्ट प्लेस (यथार्थ स्थान) पर रखना है।

अपनी रोंग बिलीफ (गलत मान्यताओं) से छुटकारा पाने के लिए, आपको 'मैं' और 'मेरा' के बीच के अंतर को समझने ज़रूर है। आप "'मैं कौन हूँ?' की वैज्ञानिक समझ 'मैं' और 'मेरा' को पढ़कर आप दोनों के बीच के सटीक भेदांकन का पता लगा सकते हैं।

* चन्दुलाल = जब भी दादाश्री ' चन्दुलाल' नाम का उपयोग करते हैं या दादाश्री जिस व्यक्ति का नाम संबोधित करते हैं, पाठक को सटीक समझ के लिए अपना नाम डालना चाहिए।

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