ગીતાનો મર્મ જ્ઞાનીની દ્રષ્ટિએ
ગીતામાં 'આત્મા તત્ત્વ' માટે 'હું' શબ્દ વપરાયો છે. એ સિવાય બધો અનાત્મા વિભાગ. આત્મા પ્રાપ્ત થયો છે તેવા જ્ઞાની તમને ભેદ પાડી આપે ત્યારે આત્મા અને અનાત્માની ઓળખાણ થાય.
श्रीमद् भगवद् गीता एक अत्यंत गहन ग्रंथ है। रणभूमि पर अपने भाइयों, चाचा, मामा, गुरु आदि को विपक्ष में खड़ा देखकर, उन्हें मार डालने के विचार से अर्जुन अत्यंत हतप्रभ हो गए थे। उन्हें युद्ध के लिए खड़ा करने के उद्देश्य से श्रीकृष्ण भगवान ने जो ज्ञान दिया, वह भगवद् गीता के रूप में जाना गया।
हजारों वर्षों बाद, आज भगवद् गीता के अलग-अलग अर्थघटन हुए हैं, परंतु श्रीकृष्ण भगवान के हृदय की बात यथार्थ रूप में शायद ही कोई समझ सका है। जैसे नई जनरेशन, पच्चीस-तीस वर्षों के अंतर पर पुरानी जनरेशन के आशय को नहीं समझ पाती, तो हज़ारों वर्षों पहले के श्रीकृष्ण भगवान के आशय को हम आज कैसे समझ सकते हैं?
श्रीकृष्ण भगवान ने भगवद् गीता में भगवान अर्जुन से सार रूप में केवल इतना ही कहा है कि तू जिसे मारने की बात कर रहा है, वह देह विनाशी है और आत्मा अविनाशी है। “आत्मवत् सर्वभूतेषु”, अर्थात् सभी जीवों को आत्मरूप से देख। अर्जुन, तू मुझे कृष्ण नहीं, बल्कि अविनाशी स्वरूप से पहचान! मैं नित्य हूँ, शाश्वत हूँ, अविनाशी हूँ, प्रकृति स्वरूप मेरा नहीं है। श्रीकृष्ण भगवान ने समझाया कि मनुष्य अज्ञान दशा में प्रकृतिमय रहता है, मोहवश अहंकार करता है, बुरे कर्म बाँधकर अधोगति में जाता है। लेकिन जब मनुष्य आत्मा को पहचानता है, आत्मज्ञान को प्राप्त करता है, प्रकृति से अलग हो जाता है, तब वह अविनाशी पद को, मोक्ष पद को प्राप्त करता है। फिर वह जन्म-मरण के चक्र में दोबारा नहीं फँसता।
भगवद् गीता में अलग-अलग खुलासे किए हैं, जो पहली बार समझने पर विरोधाभासी लग सकते हैं। जैसे कि, एक ओर श्रीकृष्ण भगवान कहते हैं कि परमात्मा ही जगत् का संचालन करने वाले हैं, वे ही कर्ता-धर्ता और भोक्ता हैं। प्रकृति का सर्जन और विनाश सब कुछ मेरे हाथ में है। जबकि दूसरी ओर यह भी कहते हैं कि मनुष्य के कर्तापन, कर्म और कर्मफल में भगवान दखल करते ही नहीं, जगत् स्वभाव से ही चलता है। एक ओर उन्होंने सात्त्विक, राजसी और तामसी ऐसी तीनों गुणों से युक्त प्रकृति का विस्तृत वर्णन किया है। तो दूसरी ओर ऐसा भी कहा है कि आत्मा तो त्रिगुणात्मक प्रकृति से परे है। एक ओर उन्होंने अर्जुन से यह कहा है कि तू क्षत्रिय है, लड़े बिना नहीं रह सकता। तो दूसरी ओर तामसी प्रकृति, जो दूसरों को दुःख देती है, वह अधोगति में ले जाती है ऐसा भी कहा है। एक ओर श्रीकृष्ण भगवान अर्जुन से कहते हैं कि तू आसक्ति रहित हो जा, कर्तुत्व का अभिमान न करना, कोई कामना न रखना। फिर आगे यह भी कहते हैं कि आत्मा कुछ करता ही नहीं और ऐसा जिसे श्रद्धा में बैठा है, वह मोक्ष में जाता है। जबकि जो ऐसा मानता है कि आत्मा करता है, वह कर्म बाँधकर चार गतियों में भटकता है।
भगवद् गीता में केवल अर्जुन के विषाद को दूर करने तक की ही बात थी। श्रीकृष्ण भगवान का अर्जुन को दिया उपदेश “तू युद्ध कर” वह एकांतिक नहीं था। आज हम उसका ऐसा अर्थघटन करें कि, “मेरे परिवार वाले मुझे पैसा नहीं देते, मैं भी कोर्ट में केस लड़ूँगा।” तो यह उचित नहीं है। श्रीकृष्ण भगवान ने तो यह भी कहा है कि “तू आत्मा को पहचान”, लेकिन यह बात हम ग्रहण नहीं कर सके। उन्होंने यह भी कहा कि, “ज्ञानी ही मेरा आत्मा है, तू ज्ञानी की शरण में जा।” लेकिन इस बात की महत्त्व ही नहीं रहा।
हज़ारों अज्ञानी एक ही पुस्तक के हज़ार अर्थघटन कर सकते हैं। लेकिन लाख ज्ञानियों का मत एक ही होता है, उसमें विरोधाभास नहीं होता। ज्ञानी पुरुष, जो भगवद् गीता की गहनता को समझकर बैठे हैं, वही हमें श्रीकृष्ण भगवान के हृदय की बात समझा सकते हैं। भगवद् गीता के समग्र रहस्यों को यथार्थ रूप से समझें तो कोई विरोधाभास नहीं रहता। उस समझ को प्राप्त करने की सम्यक् समझ हमें परम पूज्य दादा भगवान से यहाँ प्राप्त होती है।


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