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भगवद् गीता के अनुसार जगत् कौन चलाता है?

भगवद् गीता के पाँचवें अध्याय के चौदहवें श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि,

न कर्तृत्वं न कर्माणि लोकस्य सृजति प्रभुः ।
न कर्मफलसंयोगं स्वभावस्तु प्रवर्तते ॥ १४॥

अर्थात्, भगवान कर्तापन से, कर्म से, या कर्मफल के संयोग से सृष्टि का सृजन नहीं करते, बल्कि सृष्टि स्वभाव से ही चलती रहती है।

इस बात का गुह्य खुलासा करते हुए परम पूज्य दादा भगवान समझाते हैं कि जगत् स्वभाव से ही उत्पन्न हुआ है और स्वभाव से ही चलता है। उसका सृजन करने वाला या उसे चलाने वाला कोई नहीं है। यदि भगवान जगत् को चलाने वाले होते तो जगत् देर-सवेर बंद हो जाता परंतु जगत् अनादि काल से अस्तित्व में है और अनंत काल तक चलता रहेगा। जैसे बरगद के एक बीज से पूरा बरगद का पेड़ बनता है और फिर बरगद से बीज गिरता है, उसी प्रकार जगत् चलता रहता है। उसका स्वभाव ही परिवर्तनशील है, जो निरंतर बदलता ही रहता है।

भगवद् गीता में श्रीकृष्ण भगवान ने कहा है कि, मैं सृष्टि का निर्माण करता हूँ। इसका रहस्य समझाते हुए परम पूज्य दादा भगवान कहते हैं कि, यह वाक्य श्रीकृष्ण भगवान आत्मारूप होकर बोलते हैं। इसलिए जहाँ ‘मैं’ शब्द है, वह वास्तव में आत्मा को दर्शाता है, किसी देहधारी मनुष्य को नहीं। आत्मा की हाज़िरी में पूर्व जन्म में जीव ने जो-जो भाव किए होते हैं, उनका फल इस अवतार में जन्म से मृत्यु तक भोगना पड़ता है। जन्म होना, देह धारण करना, आकार, रूप, रंग मिलना, यह सब अपने ही भावों का फल है, इसमें किसी ईश्वर का कर्तापन नहीं है।

परम पूज्य दादाश्री विस्तार से समझाते हुए कहते हैं कि मनुष्य जैसे भाव करता है, उसके अनुसार ही कर्म बँधते हैं और फल भोगते हैं। यदि पाशवी विचार करता है तो पशु योनि में जन्म लेता है। यदि सज्जनता या मानवता के विचार करता है तो फिर मनुष्य में जन्म लेता है। जब दैवीय विचार होते हैं जिसमें सामने वाला चाहे कितना भी नुकसान करे, तो भी खुद उसके ऊपर बार-बार उपकार करता रहता है, ऐसे सुपर ह्यूमन स्वभाव वाले मनुष्य देवलोक में जाते हैं। अर्थात् सृजन के वक्त खुद के भीतर जो भाव होते हैं, वह कुदरत के द्वारा नोट की जाती हैं और उसी के अनुसार फिर रूपक आता है तब विसर्जन होता है।

यदि भगवान जगत् के निर्माता हों और जगत् को चलाने वाले हों तो अनेक प्रश्न उठते हैं। जैसे कि, केवल श्रीकृष्ण भगवान ही जगत् को चला रहे होंगे या राम भगवान या महावीर भगवान भी चला रहे होंगे? श्रीकृष्ण भगवान की मृत्यु जहरीले तीर लगने से हुई थी। यदि भगवान जगत् को चलाते हों तो वे अपनी मृत्यु क्यों नहीं रोक सके? महाभारत का युद्ध क्यों नहीं रोक सके? राम भगवान भी अपना वनवास नहीं रोक सके। अपनी पत्नी सीता का हरण हो ऐसी लीला भगवान करवाते होंगे? चौबीस तीर्थंकरों को नहीं आए होंगे इतने उपसर्ग भगवान महावीर को आए थे। यदि भगवान जगत् को चलाते हों तो किसी भी मनुष्य को थोड़ी-सी भी चिंता या दुःख क्यों होने दें? जैसे घर के पिता कुटुंब में किसी को दुःख न पड़े, इसका सारा ध्यान रखते हैं, तो भगवान तो पूरी दुनिया के तात कहलाते हैं। क्या वे अपने बच्चों पर दुःख पड़ने देंगे? किसी की नौकरी छूट जाती है, किसी को दो वक्त का खाना नहीं मिलता, किसी का जवान हष्ट-पुष्ट बेटा गुजर जाता है, तो क्या भगवान जान-बूझकर ऐसे दुःख देंगे? जिन भगवान की हम रोज़ आरती, भक्ति, पूजा करते हैं, वे भगवान हमारे सामने भी न देखें, ऐसा हो सकता है?

श्रीकृष्ण भगवान ने जो कहा है कि "जगत् स्वभाव से चलता है" यह तत्व की सबसे अंतिम बात है। जैसे ढाल पर पानी डालें तो वह ऊपर से नीचे गिरता है। उसमें हम कहते हैं कि पानी कैसे दौड़ा, आगे बढ़ा, परंतु वास्तव में उसका स्वभाव है ऊपर से नीचे आने का। कोई पानी को चलाता नहीं है। उसी प्रकार संयोगों के धक्के से जगत् ऑटोमेटिक, अपने आप ही चल रहा है।

परम पूज्य दादा भगवान कहते हैं कि, "यू आर होल एन्ड सोल रिस्पोन्सिबल। गॉड इज नोट रिस्पोन्सिबल एट ऑल।" अपने कर्मफल में हम खुद ही ज़िम्मेदार हैं, भगवान बिल्कुल भी ज़िम्मेदार नहीं हैं। यदि भगवान कर्ता हों तो कर्म की थ्योरी गलत हो जाएगी। कर्म का सिद्धांत कहता है कि जो कर्ता होता है उसे ही भोक्ता होना पड़ता है। यदि भगवान कर्ता होते तो उन्हें भोक्ता होना पड़ता, कर्म करने के बदले भगवान गुनाहगार ठहराए जाते, लेकिन भोक्ता हम होते हैं, कर्म का फल हम ही भोगते हैं, इसलिए हम खुद ही कर्म के कर्ता हैं।

जिन्हें तत्वज्ञान में गहरा उतरना है, भगवान को सच्चे स्वरूप में पहचानना और पाना है और उनका साक्षात्कार करना है, उन्हें भगवान को सच्चे स्वरूप में पहचानना पड़ेगा। यदि हम ऐसा मानेंगे कि जगत् के कर्ता-हर्ता भगवान हैं और वे ऊपर बैठे हैं, तो हमें कभी भी भगवान नहीं मिल पाएँगे। जब तक भगवान का सच्चा स्वरूप पहचान में नहीं आएगा तब तक उनका साक्षात्कार नहीं होगा। भगवान तो खुद के भीतर ही हैं। श्रीकृष्ण भगवान ने भी भगवद् गीता में कहा है कि, मैं प्रत्येक जीव मात्र में हूँ, आत्मारूप में हूँ, तू उसे देख और पहचान।

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