मैं कौन हूँ ? : अपने सच्चे स्वरूप को पहचानें!

इस जीवन में ज़िंदगी जीने के अलावा भी बहुत कुछ है। यों ही जीवन जीने के अलावा भी इसमें बहुत कुछ होना चाहिए। जीवन का कोई ऊँचा हेतु होना चाहिए। जीवन का हेतु इस प्रश्न के सही जवाब तक पहुँचना है कि ' मैं कौन हूँ? ' यह प्रश्न कितने ही जन्मों से निरुत्तर है। ' मैं कौन हूँ ? ' की इस खोज में बाकी बची कड़ियाँ ज्ञानीपुरुष के शब्दों में मिलती हैं।

मैं कौन हूँ?  मैं क्या नहीं हूँ? आत्मा क्या है ? क्या मेरा है? क्या मेरा नहीं है? बंधन क्या है ? मोक्ष क्या है ? क्या भगवान हैं?  भगवान क्या हैं? जगत कर्ता कौन है? क्या भगवान कर्ता हैं या नहीं? भगवान का सच्चा स्वरूप क्या है ? इस संसार के सच्चे कर्ता का स्वभाव क्या है? यह जगत कौन चलाता है? यह किस तरह से काम करता है ? माया का सच्चा स्वरूप क्या है? जो कुछ भी हम जानते हैं, वह सच है या भ्रांति? जो कुछ भी ज्ञान हमारे पास है, उससे क्या हमारी मुक्ति होगी या बंधन ही रहेगा?

यहाँ पर इन सभी प्रश्नों का सही जवाब मिलेगा। यह एक असीम नया खज़ाना है। इस विज्ञान (अक्रम विज्ञान) में अदभुत शक्ति है। अधिक जानने के लिए पढ़ें....

खुद की पहचान

मैं' और 'मेरा' यह दो अलग चीजें है, जब कोई कहता है मेरा शारीर तब कहनेवाला मालिक अलग है| गलत मान्यताओं के कारण दो अलग चीजों का मिश्रण हुआ है| ज्ञान विधि के द्वारा इन दो चीजों को अलग करना संभव है|

Spiritual Quotes

  1. ज्ञानविधि तो सेपरेशन (अलग) करना है, पुद्गल (अनात्मा) और आत्मा का! शुद्ध चेतन और पुद्गल दोनों का सेपरेशन।ज्ञानी पुरुष आत्मा के गुणधर्म को जानते हैं और अनात्मा के गुणधर्म को भी जानते हैं।
  2. ज्ञानी पुरुष आत्मा के गुणधर्म को जानते हैं और अनात्मा के गुणधर्म को भी जानते हैं।
  3. ज्ञान और ज्ञानी की कृपा के अलावा शुद्धात्मा अनुभव प्राप्त करने की और कोई पद्धति नहीं है। ज्ञान प्राप्ति के पश्चात, प्रतीति, लक्ष्य और अनुभव की तरफ जाते हैं। फिर प्रतीति कभी नहीं जाती।
  4. "जगत् एक पज़ल (पहेली) है।" यह खुद ही पज़ल बन गया हैं। भगवान ने यह पज़ल नहीं बनाया। "इस पज़ल को हल करने के दो दृष्टिकोण(व्यू-पोइन्ट) हैं। एक रिलेटिव दृष्टिकोण और एक रियल दृष्टिकोण। रियल पर्मनेन्ट (शाश्वत) है, और रिलेटिव टेम्पररी (अस्थाई) है। ये सारे रिलेटिव्स टेम्पररी एडजस्टमेन्ट हैं, तुम खुद(रियल) पर्मनेन्ट हो।" 
  5. मोक्ष याने अपने स्वभाव में आना और संसार यानी अपने विशेष भाव में जाना। यानी आसान क्या ? स्वभाव में रहना! यानी मोक्ष कठिन नहीं होता।
  6. अर्थात 'My' की वजह से मोक्ष नहीं होता है। 'मैं कौन हूँ' का ज्ञान होने पर 'My' छूट जाता है। 'My' छूट गया तो सब छूट गया।
  7. परमात्मा है ? परमात्मा है ही और वह आपके पास ही है। बाहर कहाँ खोजते हैं ? पर कोई हमें यह दरवाज़ा खोल दे तो दर्शन कर पायें न! यह दरवाज़ा ऐसे बंद हो गया है कि खुद से खुल पाये, ऐसा है ही नहीं। वह तो जो खुद पार हुए हों, ऐसे तरणतारण ज्ञानी पुरुष का ही काम है।
  8. 'आपका ऊपरी दुनिया में कोई नहीं। आपके ऊपरी आपके ब्लंडर्स और आपकी मिस्टेक्स हैं। ये दो नहीं हों तो आप परमात्मा ही हैं।'
  9. इस लिफ्ट में जो बैठ गये, उसका हल निकल आया न! हल तो निकालना ही होगा न ? हम मोक्ष में जानेवाले ही हैं, उस लिफ्ट में बैठे होने का प्रमाण तो होना चाहिए कि नहीं होना चाहिए ? उसका प्रमाण यानी क्रोध-मान-माया-लोभ नहीं हो, आर्तध्यान-रौद्रध्यान नहीं हो।
  10. संसार के दुःख में भी दुःख लगे नहीं, उपाधि में भी समाधि रहे, वह पहला मोक्ष। और फिर यह देह छूटने पर आत्यंतिक मोक्ष है। पर पहला मोक्ष यहाँ होना चाहिए।

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