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क्या आपको कभी अपने सच्चे सवरूप के बारे में शंका हुई है? खोज करें अपने सच्चे सवरूप की!

वास्तव में,'मैं कौन हूँ' के मुद्दे पर किसी को कोई संदेह या शंका नहीं है? हालाँकि, यह शंका पहली बार में नहीं उठता! इसके विपरीत, हम अपनी अज्ञानता की पहचान को मज़बूत करते हैं और इसके कारण, क्रोध-गर्व-मोह-लालच बरकरार रहता है। एक गैर-सत्य को पकड़ रखा है, इसी कारण से यह गैर-सत्य एक सत्य कि तरह जागरूकता पैदा कर रहा है। अगर कोई लंबे समय तक गैर-सत्य को पकड़ के रखता है, तो वह गैर-सत्य उसके लिए सत्य बन जाता है। यदि गैर-सत्य उसके विश्वास में गहराई से जुड़ जाता है, तो वह सत्य बन जाता है और फिर उसे कभी भी यह एहसास नहीं होगा कि यह गैर-सत्य है; यह हमेशा उसके लिए सच्चाई होगी।

इसलिए क्रोध-मान-मोह-लोभ दूर हो जायेंगे यदि वास्तविक पहचान के बारे में संदेह पैदा हो जाए, लेकिन ऐसा संदेह कभी नहीं होता। वे कैसे करेंगे? ऐसा करने में आपकी मदद कौन करेगा? अंतहीन जीवन के लिए अपनी वास्तविक पहचान के बारे में मनुष्य को संदेह-मुक्त किया गया है, कौन इस मामले में संदेह उत्पन्न कर सकता है? इस जीवन में जो भी नाम दिया गया है, उसने इसे सत्य माना है। इसके बारे में संदेह कभी पैदा नहीं हुआ है, हुआ है क्या? यह कितना मुश्किल है? और इसी कारण से क्रोध-मान-मोह-लोभ बरकरार रहते हैं । यदि आप क्रोध-मान-मोह-लोभ से मुक्त होना चाहते हैं तो आपको अपने सच्चे सवरूप की अनुभूति करनी होगी। सभी शास्त्रों का 'समाधान' - स्वयं के स्वरुप का ज्ञान जानने से आता है। लेकिन स्वयं का ज्ञान कैसे प्राप्त किया जा सकता है? स्वयं के स्वरूप का ज्ञान प्राप्त करने के बाद, और कुछ भी जानना नहीं रह जाता, पर ये कैसे जाना जए? 

जहाँ शंका करनी है, वहाँ जग नि:शंक 

केवल एक ही स्थान है जहाँ संदेह की आवश्यकता है और वह है अपने आप से सवाल करना 'क्या मैं वास्तव में * चंदुलाल (अपना नाम रखें) हूँ?' यह एकमात्र संदेह है जिसे आपको अपने असली सवरूप खोजने के लिए जारी रखने की आवश्यकता है। 

चलिए देखें स्वयं की खोज पर प्रत्यक्ष परम पूज्य दादाश्री के साथ मुमुक्षु का संवाद: 

प्रश्नकर्ता: मैं चंदूभाई हूँ’ उस बात पर ही शंका हो... 

दादाश्री: तब तो काम ही हो जाएगा! वह शंका तो किसी को होती ही नहीं न! मैं पूछता रहता हूँ तब भी शंका नहीं होती। ‘मैं चंदू ही हूँ, मैं चंदू ही हूँ’ कहता है। वह शंका होती ही नहीं है। नहीं क्या?!  

फिर जब मैं बार-बार हिलाता हूँ तब कुछ शंका होती है, और उसके बाद सोचता है कि ‘ये दादा कह रहे हैं वह भी सही है, बात में कुछ तथ्य है।’ बाकी, अपने आप तो किसी को भी शंका नहीं होती। 

प्रश्नकर्ता: वैसी शंका हो, तभी आगे बढ़ता है? 

दादाश्री: नहीं, ऐसा नहीं है। यह शंका शब्द इसी के लिए है। ‘क्या मैं वास्तव में चंदूभाई हूँ?’ वह शंका ‘हेल्प’ करती है। दूसरी सभी शंकाएँ तो आत्महत्या करवाती हैं। ‘क्या मैं वास्तव में चंदूभाई हूँ? और ये सब कहते हैं कि इनका बेटा हूँ। क्या वास्तव में हूँ?’ यह शंका हुई तब काम का! 

अर्थात् कौन सी शंका रखने जैसी है? आत्मा संबंधी शंका रखने जैसी है कि ‘आत्मा यह होगा या वह होगा!’ वास्तविक आत्मा की जब तक पहचान नहीं हो जाती, तब तक पूरे जगत् को शंका रहती ही है। 

‘मैं निश्चय से चंदूभाई हूँ, वास्तव में यह चंदूभाई मैं ही हूँ?’ ऐसा मानता है उसी से सभी आरोप गढ़े गए लेकिन अब उस पर शंका हो गई न? वहम बैठ गया न? सच में वहम घुस गया! वह वहम तो काम निकाल देगा। ऐसा वहम तो किसी में घुसता ही नहीं न! हम वहम डालने जाएँ फिर भी नहीं डलता न! 

वैसी शंका होगी ही किस तरह? अरे, सरकार भी ‘अलाउ’ करती है! सरकार ‘अलाउ’ नहीं करती? ‘चंदूलाल हाज़िर है?’ कहते ही चंदूलाल जाए तो सरकार ‘अलाउ’ कर देती है! लेकिन खुद को कभी भी शंका होती ही नहीं कि ‘मैं चंदूलाल नहीं हूँ और यह मैंने दूसरी तरह से पकड़ रखा है?!’ 

खुद अपने आप पर शंका हो, ऐसा बाहर कहीं नहीं है न? दस्तावेज में भी लिखते हैं कि वकील साहब ने हस्ताक्षर किए, कि तुरंत ‘एक्सेप्ट’! इतने सारे लोग कबूल करते हैं, फिर उसे शंका होगी ही कैसे?! 

* चंदूलाल (अपना नाम डालें) = जब भी दादाश्री चंदूलाल (अपना नाम रखो)' नाम का इस्तेमाल करते हैं या दादाश्री जिस व्यक्ति को संबोधित कर रहे हैं, पाठक को सटीक समझने के लिए अपना नाम डालना चाहिए। 

स्वयं की शंका कैसे लुप्त हो सकती है? आप स्वयं की ख़ोज केसे कर सकते है?  

अक्रम विज्ञान एक अद्भुत प्रयोग - ज्ञानविधी (आत्मज्ञान की एक घंटे की आध्यात्मिक प्रक्रिया) है जिसकी सहरना करनी चाहिए, कि जहाँ एक घंटे के भीतर, व्यक्ति आत्मा के बारे में संपूर्ण रूप से शंका से मुक्त हो जाता है।  

आत्मा के बारे में शंका किताबें पढ़ने से दूर नहीं कि जा सकती। एक प्रकट ज्ञानी (आत्मज्ञानी) की आवश्यकता होती है। जैसा कि यदि कोई अधिक से अधिक शास्त्रों का जानकर रहता है, तब उसकी शंका अधिक से अधिक बढ़ जाती है; जब वह एसी दशा पर पहुँच जाता है कि 'मैं कुछ नहीं जानता’, तो वह वास्तविक ज्ञान के लिए तैयार हो जाता है। कषाय से छुटकारा पाने वाला ज्ञान अर्थात् क्रोध, लोभ, मान, कपट, वह ज्ञान है; यानि ज्ञान (आत्मज्ञान) है। जहाँ शंका है, वहाँ उत्कंठा है। आत्मा को जानने का संकेत वह एक निशंक दशा कहलाती है।

वह जो आत्मा के संदर्भ में निशंक हो जाते है वही पूर्ण मोक्ष (मुक्ति) की अवस्था है! 

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