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संसार में दु:ख क्यों है? उसका मूल कारण क्या है? अज्ञानता!

मैं स्वयं कौन हूँ? उसकी अज्ञानता। स्वयं को, आत्मा को नहीं जानने से सारे दु:ख हैं। आत्मा को जानने के लिए, आत्मसाक्षात्कार पाने के लिए, तमाम धर्मों में बताया गया है। लेकिन आत्मा कैसे प्राप्त करें? क्या संसार में रहते हुए भी जान सकते है? इन सब प्रश्नों का समाधान कैसे करें? यह ज्ञान कहाँ से प्राप्त हो सकता है?

इतना ही नहीं, किंतु यह संसार क्या है? कौन चलाता है? कर्ता कौन है? भगवान क्या है? मोक्ष क्या है? अक्रम मार्ग से, इस काल में, संसार में रहते हुए भी आत्मज्ञान की प्राप्ति हो सकती है, इसकी पूर्णतया समझ और सही दिशा की प्राप्ति परम पूज्य दादाश्री ने करवाई है।

आत्मा को पहचानने का, दादाश्री का सुंदर भेदज्ञान का प्रयोग है, जिसके ज़रिये सिर्फ दो ही घंटों में आत्मज्ञान प्राप्त होता है! ज्ञानप्राप्ति के पश्चात् बाहर का कुछ भी नहीं बदलता, जीवन पहले जैसा ही चलता है परंतु हरएक परिस्थिति में भीतर पूर्ण शांति, स्थिरता और समाधि रहती है और हमेशा 'मैं शुद्धात्मा हूँ' ऐसा खयाल में भी रहता है। ज्ञान से अंतरशांति तो रहती ही है किंतु सांसारिक जीवन भी बहुत सरल और सहज हो जाता है।

आधि-व्याधि-परेशानी में भी निरंतर स्वसमाधि में रह सकें, ऐसा, अक्रम विज्ञान की प्राप्ति के पश्चात् हजारों लोगों का अनुभव है!

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