क्या ग्रह हमें परेशान कर सकते है?
कुंडली, नक्षत्र, वगेरे सब ग्रह दशा से संबंधित वास्तविकता क्या है? हमारे जीवन में तकलीफे और दुःख लाने में यह ग्रह किस प्रकार कार्य करते है?
अंधश्रद्धा यानी अंधी श्रद्धा, गलत श्रद्धा। लौकिक जगत् में जो गलत मान्यताएँ प्रचलित हैं, इनमें सबसे भयंकर अंधापन लाने वाली अंधश्रद्धा है। सदियों से लोगों में ज्योतिष विद्या, शकुन-अपशकुन, माताजी का आना, काली विद्या, भूत-प्रेत और ओझा, पितृदोष, वास्तुशास्त्र तथा विभिन्न चमत्कारों को लेकर अंधश्रद्धा देखने को मिलती है।
पहले गाँवों में बहुत अंधश्रद्धा थी, लेकिन आजकल शहरों और विदेशों में भी अंधश्रद्धा का प्रभाव बढ़ता जा रहा है। केवल अनपढ़ लोग ही नहीं, बल्कि बड़े-बड़े पढ़े-लिखे लोग भी गुप्त रूप से किसी न किसी अंधविश्वास में पड़े होते हैं। वे बाहर भले ही ऐसा दिखावा करते हैं कि वे आधुनिक विचारधारा वाले हैं और अंधश्रद्धा नहीं होनी चाहिए, लेकिन जब अपने जीवन में कठिन परिस्थिति आती है, तब वे खुद ही जाने-अनजाने अंधश्रद्धा में फंस जाते हैं।
जितना मनुष्य अंधश्रद्धा में उलझता जाता है, उतना ही वह सत्य से दूर होता जाता है। और जितना हम सत्य से दूर जाएँगे, उतना ही सुख हमसे दूर होता जाएगा। बिना समझे, लोगों की बातों में आकर, देखा-देखी में या फिर मुश्किल समय में आश्वासन खोजने के लिए मनुष्य अंधश्रद्धा के पीछे अपना समय और शक्ति बर्बाद कर देता है। जिस मान्यता के अनुसार कभी होता है और कभी नहीं भी होता है, ऐसी मान्यता में श्रद्धा कैसे रखी जा सकती है? वास्तविकता में तो अपने पुण्य कर्मों या पाप कर्मों के हिसाब से ही जीवन में सुख या दुःख आता है। कर्म के सिद्धांत को समझ लें तो अंधश्रद्धा दूर हो जाती है।
मनुष्य जीवन में अपनी भीतर की शक्तियों को प्रकट करनी है और जीवन में आने वाले कर्मों से राग-द्वेष किए बिना पार निकलना है। इसके बजाय, अंधश्रद्धा के कारण गलत मान्यताओं में पड़कर या झूठे आश्वासन लेकर मनुष्य अपनी डेवलप हो रही शक्तियों को खुद ही नष्ट कर देता है। सही समझ के अभाव में ही अंधश्रद्धा उत्पन्न होती है। यहाँ हमें ज्ञानी पुरुष परम पूज्य दादा भगवान से अलग-अलग अंधश्रद्धाओं से बाहर निकलने की सही समझ प्राप्त होती है।


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