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ज्योतिष में विश्वास करना चाहिए या नहीं?

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विश्वभर में और खासकर भारत में, लोग आर्थिक, पारिवारिक या शारीरिक समस्याओं के समाधान के लिए, उसमें भी खास तौर पर विवाह, करियर, संतान और कोर्ट केस संबंधी मामलों में ज्योतिष शास्त्र का सहारा लेते हैं। ज्योतिष शास्त्री कुंडली में ग्रहदशा देखकर कुछ उपाय बताते हैं, जैसे कि मंत्र, जाप, पाठ करवाना; ग्रहों के अनुसार मणि या कीमती पत्थरों की अंगूठी पहनना; विशेष यंत्रों की स्थापना करना; अशुभ ग्रह योग जैसे कालसर्प, मंगल, शनि, राहु के प्रभाव को नष्ट करने के लिए विधियाँ करवाना आदि।

ज्योतिष शास्त्र तो सच्चा है। लेकिन, ज्योतिष देखने वाले जब व्यापारी बन जाते हैं और पैसे कमाने की लालच में विद्या का उपयोग करते हैं, तब वह सटीक नहीं रहता। गहरा अभ्यास किए बिना जगह-जगह दुकानों में यह विद्या बेची जा रही है, जो लोगों की अंधश्रद्धा बढ़ाने का कारण बनती है। ज्योतिष शास्त्र ग्रहों की स्थिति के आधार पर रचा गया है। खासकर ज्योतिषी यह दिमाग में बैठा देते हैं कि, “आपको ये ग्रह बाधा पहुँचा रहे हैं”, इसीलिए लोग अंगूठियों, यंत्रों और विधियों के पीछे पैसों को पानी की तरह बहा देते हैं। इसके पीछे पैसा खर्च करके लोग आर्थिक और मानसिक रूप से बर्बाद हो जाते हैं।

मान्यता के सामने वास्तविकता

वास्तव में सूर्य, चंद्र, ग्रह और नक्षत्र ये सभी ज्योतिषीय देव-देवियाँ हैं। आकृति ग्रह की है और उसके भीतर देव-देवियों का अस्तित्व है। वे हमें बाधा पहुँचाने क्यों आएँगे? जो पूजनीय हैं, जिन्हें हम नमस्कार करते हैं, वे हमें दुःखी क्यों करेंगे? ग्रह तो वीतराग हैं, उन्हें किसी के साथ कोई वैर या दुश्मनी नहीं है कि बाधा पहुँचाने आएँ। तर्कों के आधार पर सोचा जाए तो, यदि ग्रह किसी के लिए बाधक होते, तो उन्हें पूरी दुनिया के मनुष्यों को बाधा पहुँचाने के बदले में कर्म नहीं बंधता?

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कुछ ज्योतिषी हमारे ग्रहदोष के लिए अन्य ब्राह्मण या जापक से लाख-लाख जप करवाते हैं। अब पैसे लेकर कोई तीसरा व्यक्ति हमारे लिए जप करे, तो वह जप हमें कैसे फल दे सकता है? यह तो ऐसा हुआ, जैसे कोई और खाए और हमारा पेट भर जाए। जाप करने वाला व्यक्ति पूरी निष्ठा से एक लाख जाप कर रहा है या घोटाला कर रहा है, यह किसको पता है? जहाँ दस मिनट भी स्थिरता से बैठना कठिन है, वहाँ एक लाख जप करना क्या आसान है? इसलिए, इन सब में पड़ने की कोई आवश्यकता नहीं है।

चाहे जितनी भी जन्म-कुंडलियाँ मिलाकर शादी की जाए, फिर भी शादी के बाद क्लेश होता ही है, तो फिर जन्मकुंडली मिलाने का अर्थ क्या है? ऐसा भी देखने में आता है कि कुंडली में जिनके बत्तीस गुण मिलते हों, वे पति-पत्नी दिन में बत्तीस बार झगड़ते हैं। बहुत से लोग जन्मकुंडली मिलाए बिना ही शादी कर लेते हैं, फिर भी उनका वैवाहिक जीवन निभता है। संक्षेप में, विवाह का मुहूर्त निकालकर शादी करने वाले सभी हमेशा सुखी ही रहते हैं, ऐसा देखने में नहीं आता। यह केवल मान्यता ही है। हिंदुस्तान के अलावा किसी अन्य देश में कुंडली मिलाकर विवाह करने की परंपरा देखने को नहीं मिलती।

ज्योतिषी स्वयं ही अपने कर्मों के जाल में फँसे होते हैं। यह देखा जाता है कि उनके अपने जीवन में ही अनेक परेशानियाँ होती हैं। यदि वे हमारा जीवन सुधार सकते हैं, तो अपना जीवन क्यों नहीं सुधार पाते? जैसे हम डॉक्टर के पास जाएँ और कोई रोग न हो, तो डॉक्टर हमें यह कहकर वापस भेज देता है कि आपको कोई बीमारी नहीं है। लेकिन, किसी ज्योतिषी के पास हम गए हों, तो क्या वह कभी कहता है “आपके ग्रहों में कोई दोष नहीं है, जाइए निश्चिंत होकर जीवन जिएँ!” तो क्या हम यह न समझें कि पूरी तरह से यह एक व्यापार बन गया है? जो ज्योतिषी खुद ही अपने जीवन में अशांति अनुभव करते हैं, जिसके अपने ही घर में पत्नी के साथ रोज़ झगड़े होते हों, वह हमारा भाग्य बदल दे ऐसा कैसे हो सकता है? यदि हम इसकी जाँच करें, तो हकीकत पता चलेगी। ज्योतिषियों के पास दौड़कर जाने से या अंगूठियाँ पहनने से वास्तव में जीवन में शांति नहीं मिलती।

विदेश के लोग अधिकतर ज्योतिष में विश्वास नहीं करते, फिर भी वे सुखी जीवन जीते हैं। उनकी नौकरी चली जाती है तब भी वे दुःखी नहीं होते, चिंता नहीं करते और कुछ ही दिनों में उन्हें दूसरी नौकरी भी मिल जाती है। जो ज्योतिष शास्त्र नहीं जानते वे लोग भी सुख से जीते हैं! जबकि भारत के गाँवों में तो ऐसी अंधश्रद्धाएँ बहुत व्यापक रूप से फैली हुई हैं। यहाँ जितनी प्रकार की विद्याएँ होती हैं, उतने ही प्रकार के विद्वान खड़े हो जाते हैं और अनपढ़, भोले-भाले लोग इसमें उलझकर और अधिक दुःखी हो जाते हैं।

कर्म में कोई परिवर्तन नहीं होता

वास्तव में ज्योतिष शास्त्र यह दर्शाता है कि आप इस जन्म में किस प्रकार के कर्मफल भोगेंगे। इस जन्म के कर्मफल हमने पिछले जन्म में कौन से कर्म किए हैं, इस आधार पर तय होते हैं। पिछले जन्म में जो-जो कर्म किए थे, उसके परिणाम स्वरूप इस अवतार में फल प्राप्त होते हैं। फल नहीं बदले जा सकते। जैसे कि, हमने परीक्षा दी हो, तो पेपर लिखने के कुछ दिनों बाद परिणाम आता है। परिणाम देखकर हमें पता चल ही जाता है कि कितने मार्क्स आए हैं, हम पास हुए या फेल। अब परीक्षा देने से पहले हम पूछने जाएँ कि मेरे कितने मार्क्स आएँगे, तो इसका कोई अर्थ है? ज्योतिष का आधार लेना भी ऐसा ही है कि हमें कैसा फल भुगतना पड़ेगा, यह पूछने जाना। वास्तव में, हमने जैसी मेहनत की है और जैसी परीक्षा दी है, वैसा ही परिणाम आएगा, वह निश्चित ही है। उसी प्रकार जीवन में भी हमारे कर्मों के अनुसार फल मिलने ही वाले हैं, जिनमें कोई परिवर्तन नहीं होने वाला है। तो फिर उसे जानकर क्या फ़ायदा? इसके बजाय हम अपनी नई परीक्षा सुधारें और आज ऐसे कर्म करें कि उनका अच्छा फल मिले।

कई बार हमें लगता है कि “मैंने बुद्धि से बहुत अच्छा निर्णय लिया।” लेकिन बुद्धि पाप-पुण्य के अधीन काम करती है। यदि पुण्य का उदय हो, तो व्यक्ति द्वारा लिए गए सभी निर्णय सही साबित होते हैं और यदि पाप का उदय हो, तो उसी व्यक्ति के निर्णय गलत होने लगते हैं। यानी हमारे ही पापकर्म और पुण्यकर्म के आधार पर हमें फल मिलता है। यदि पाप बाँधा होगा, तो पाप का फल आएगा और हमें दुःख भुगतना पड़ेगा। और यदि पुण्य बाँधा होगा, तो उसका फल आएगा और हमें सुख भोगना पड़ेगा।

हम जानते ही हैं कि भगवान श्री राम के समय में बड़े-बड़े विद्वान ज्योतिष शास्त्रियों और ऋषि-मुनियों ने भविष्यवाणी की थी कि, “अगली सुबह शुभ मुहूर्त में रामचंद्र जी का राज्याभिषेक होगा और वे अयोध्या की राजगद्दी पर बैठेंगे।” लेकिन अगले ही दिन कैकेयी ने सब कुछ बदल दिया। रामचंद्र जी को राजगद्दी तो दूर, जंगल में रहने के लिए झोंपड़ी भी नहीं मिली, उल्टा चौदह वर्ष का वनवास मिला। जब सतयुग के प्रखर विद्वान ज्योतिषियों की भविष्यवाणी भी गलत साबित हुई थी, तो फिर कलियुग में किस पर भरोसा किया जाए?

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भगवान श्री कृष्ण जैसे प्रखर वासुदेव के तो वश में कितने ही ग्रह थे। वे साक्षात् ग्रहों को नीचे उतार लाने में सक्षम थे और ऐसा करके वे महाभारत के विनाशकारी युद्ध को भी रोक सकते थे। लेकिन उसमें भगवान भी कोई बदलाव नहीं कर सके। श्री कृष्ण भगवान की मृत्यु भी पैर में तीर लगने से ही हुई थी। यदि कर्म के सामने समर्थ भगवान भी कुछ न कर सके, तो साधारण जीवों का क्या सामर्थ्य है? जब इतना सटीक कर्म का विज्ञान हो, फिर तरह-तरह के कीमती पत्थरों की अंगूठियाँ पहनने से, जप करवाने से या विधियाँ करने से कर्म में परिवर्तन कैसे हो सकता है, यह प्रश्न सोचने जैसा है।

जब महावीर भगवान का निर्वाण नज़दीक था, तब संसार पर दुःख न आए इस उद्देश्य से देवताओं ने भगवान से विनती की कि, “प्रभु, दो घड़ी के लिए आयुष्य बढ़ा दीजिए, ताकि भस्मक ग्रह के प्रभाव को टाला जा सके।” क्योंकि, भगवान महावीर के निर्वाण के बाद ढाई हज़ार वर्षों तक भस्मक ग्रह की विपरीत दशा रहने की भविष्यवाणी थी। तब भगवान ने कहा कि एक राई के दाने जितना भी आयुष्य बढ़ाया या घटाया नहीं जा सकता। भस्मक ग्रह तो केवल उस निश्चित भविष्य का एक मात्र संकेत है। ग्रह बुरा प्रभाव डालने वाले नहीं हैं, बल्कि पाँचवें आरे के विपरीत काल का मनुष्यों पर बुरा असर पड़ेगा, जिसे रोका नहीं जा सकता।

शांति के लिए सही मार्ग

मनुष्य जीवन में आए हुए कर्मों का हिम्मत के साथ सामना नहीं कर पाते, इसलिए दुःखों में आश्वासन पाने के लिए ज्योतिष का सहारा लेते हैं। लेकिन भविष्य में क्या होगा, यह जान लेने से वास्तव में दुःख दूर नहीं हो जाते। लाख उपाय करने के बावजूद भी सामने आए कर्मों में कोई परिवर्तन नहीं होता। इसलिए, ऐसी गलत मान्यताओं की उलझन में पड़ने के बजाय, हमारे कर्मों के हिसाब से जो कुछ भी सामने आ रहा है, उसका हिम्मत के साथ सामना करें।

जीवन में यदि शांति चाहिए, तो शांति का सही मार्ग खोजना चाहिए। हम जिस भी भगवान या इष्टदेव को मानते हों, उनसे प्रार्थना करें कि, “हे भगवान! जो कर्म सामने आए हैं, उनसे मुक्त होने और उन्हें पार करने की मुझे शक्ति दें।” मंदिर जाकर प्रभु से प्रार्थना करें या धर्म के शास्त्रों को पढ़ने से कुछ शांति मिल सकती है। यदि हम किसी सात्त्विक संत या ज्ञानी पुरुष की शरण लें, तो कर्मों से बाहर निकलने की सही समझ प्राप्त हो सकती है। इससे कर्म में कोई परिवर्तन नहीं होगा, कर्म तो वैसे के वैसे ही रहेंगे, लेकिन उन्हें पार करने की शक्ति और हिम्मत मिल जाएगी। यानी सूली का घाव सुई से टल जाएगा।

कोई भी परिणाम आता है, तो उसके पीछे कारण होते हैं। यदि परीक्षा देते समय गड़बड़ की हो, तो हम फेल हो जाते हैं। इसलिए, कैसे कर्मों के परिणाम स्वरुप हमारे सामने ऐसी परिस्थितियाँ आ गई हैं, ऐसा सोचकर नए कर्मों को सुधारना चाहिए। सही समझ सेट करने से, परिस्थितियाँ कैसी भी हों अंदर राग-द्वेष और चिंता नहीं होगी। वास्तव में बाहर के कोई भी ग्रह हमें परेशान नहीं करते। लेकिन हमारे अंदर के ही ग्रह जैसे कि, आग्रह, विग्रह, दुराग्रह, सत्याग्रह, अभिग्रह, परिग्रह, पूर्वग्रह, मिथ्याग्रह और हठाग्रह हमें परेशान करते हैं। इसलिए, इन दोषों से मुक्त होने का प्रयास करते रहना चाहिए।

कई बार हमारे परिवार में सभी लोग ज्योतिष में विश्वास करते हैं, लेकिन हमें उसमें श्रद्धा न हो, तो उन्हें मानने देना चाहिए। उसमें हमें शंका-कुशंका खड़ी न हो और उनकी मान्यताएं हमें विचलित न कर सकें, इस बात का हमें ध्यान रखना चाहिए। यदि हमारा उससे कोई लेना-देना नहीं है और हम पर इसका कोई असर नहीं होता, तो कुछ नहीं होगा।

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