Related Questions

क्या वास्तव में शकुन और अपशकुन होते हैं?

शकुन-अपशकुन अर्थात् किसी भी कार्य के शुभ या अशुभ फल का पूर्व संकेत। दुनिया भर में शकुन और अपशकुन से जुड़ी कई मान्यताएँ प्रचलित हैं। कुछ लोग मानते हैं कि बिल्ली का रास्ता काटना, छींक आना, दूध का उबलकर बाहर गिरना, आँख फड़कना, कुछ खास दिनों में ही बाल धोना, शाम को झाड़ू लगाना आदि अपशकुन होने के संकेत हैं। काँच का टूटना कुछ संयोगों में शकुन और कुछ संयोंगों में अपशकुन माना जाता है। कई बार कुछ रंगों और अंकों के साथ भी शकुन-अपशकुन जुड़े होते हैं। इसीलिए, अलग-अलग देशों में अलग-अलग मान्यताएँ प्रचलित हैं, जिसमें एक चीज़ एक जगह शुभ मानी जाती है, तो वहीं दूसरी जगह अशुभ मानी जाती है।

बिना सोचे-समझे शकुन-अपशकुन की लौकिक मान्यताओं का अंधा अनुकरण करने से हमारा समय और शक्ति बर्बाद होती है। वास्तव में, मनुष्य देह में आंतरिक शक्तियों को प्रकट करना है। शकुन-अपशकुन में पड़कर मनुष्य अपने जीवन की सफलता या असफलता के लिए बाहरी निमित्तों को दोषी ठहराकर झूठे आश्वासन लेता है। इससे आंतरिक शक्तियाँ टूट जाती हैं। गलत मान्यताएँ दिमाग में बैठने से खुद ही दुःखी होता है। नियम यह है कि, यदि हमारे मन में कोई वहम या अंधविश्वास ही न हो, तो कोई शकुन या अपशकुन हमें बाधा नहीं पहुँचाते।

अशुभ अंक

bad luck number

पश्चिमी देशों में तेरह नंबर को अशुभ माना जाता है। इसलिए वहाँ किसी भी बहुमंजिला इमारत में तेरहवीं मंज़िल ही नहीं होती, बारहवीं मंज़िल के बाद सीधे चौदहवीं मंज़िल आती है। इसके अलावा, किसी भी रूम का नंबर तेरह नहीं रखा जाता, क्योंकि इस नंबर के रूम में कोई कोई रहेता ही नहीं है। अब यदि तेरह नंबर अशुभ है, तो तेरह तारीख को जन्मा व्यक्ति क्या करें? क्या उससे कोई शादी ही नहीं करेगा? क्या उसे जीवन में सफलता ही नहीं मिलेगी? कुछ देशों में नौ का अंक शुभ माना जाता है, तो दूसरे कुछ देशों में वही नौ का अंक अशुभ माना जाता है। इससे यह समझ सकते हैं कि यह सभी मान्यताएँ ही हैं। सफलता या असफलता का अंकों के साथ कोई संबंध नहीं है।

‘लकी’ वस्तुएँ या व्यक्ति

व्यक्तिगत रूप से हम मानते हैं कि फलाना ड्रेस हमारे लिए लकी है। क्योंकि, जब वह ड्रेस पहना हो, तब संयोगवश हमारा कोई महत्त्वपूर्ण काम सफल हो गया हो। लेकिन फिर, हर ज़रूरी काम के लिए हम बार-बार वही ड्रेस पहनते रहते हैं। यदि किसी बड़े व्यक्ति के घर में कदम पड़ते हैं, तो हम कहते हैं कि उससे घर में लक्ष्मी आई। लेकिन वह व्यक्ति खुद जिस घर में रहता है, वहाँ तो उसके कदम रोज़ पड़ते हैं, तो उसे खुद इसका लाभ क्यों नहीं होता? इसलिए यह सिर्फ मान्यता ही है। हम मान लेते हैं कि आज मेरी आँख फड़की, इसलिए कुछ अनहोनी होने वाली है। घर के दरवाज़े से बाहर निकलते समय बायाँ पैर पहले पड़ गया, इसलिए आज तो सब कुछ बिगड़ने ही वाला है और फिर दुःखी होते रहते हैं। अब भूतकाल में ऐसा तो कितनी ही बार हुआ होगा, हमें उन सभी प्रसंगों को याद करना चाहिए। उनमें से एकाध बार तो हमारा माना हुआ गलत साबित हुआ ही होगा। एक बार कौआ बैठा और डाल टूट गई, इसका अर्थ यह नहीं है कि हर बार कौए के बैठने पर डाल टूटेगी ही। इसी तरह हर बार ऐसा होगा तो अपशकुन ही होगा, यह मान लेने की ज़रूरत नहीं है। ये सभी अंधविश्वास ही हैं।

कदम पड़ते ही परिस्थिति बदल गई

कुछ लोग ऐसा मानते हैं कि इस बेटे या बेटी के जन्म के बाद घर की परिस्थिति सुधर गई या फिर इस बेटी या बेटे के जन्म के बाद घर की परिस्थिति बिगड़ने की शुरुआत हुई। शादी के बाद बहू के घर में कदम पड़े और किसी की मृत्यु हो जाए, तो सारी ज़िंदगी बहू को ताने सुनने पड़ते हैं। सच तो यह है कि हमारे ही कर्म हमें फल देते हैं। जब पापकर्म फल देते हैं, तब प्रतिकूल परिस्थितियाँ उत्पन्न होती हैं और जब हमारे पुण्यकर्म फल देते हैं, तब अनुकूल परिस्थितियाँ उत्पन्न होती हैं। अपने ही कॉज़ेज की इफेक्ट आती है, उसमें समय, स्थान, संयोग और व्यक्ति ये सभी निमित्त होते हैं। इसमें उन लोगों की क्या गलती? इसलिए, किसी व्यक्ति पर आक्षेप लगाना वह एक प्रकार की गलत मान्यता या अंधविश्वास ही है। कोई भी व्यक्ति हमें छू नहीं सकता, दुःख नहीं दे सकता है। इस दुनिया में गलत समझ ही दुःख देती है। कोई वस्तु, व्यक्ति, जीव या परिस्थिति हमें दुःख नहीं दे सकती। यदि हमारी समझ उल्टी हो, तो दुःख, दुःख और दुःख ही है। जब वही समझ सही हो जाए, तो दुनिया में दुःख नाम की कोई चीज़ हमारे लिए नहीं रहेगी। इसलिए, अंधविश्वास की ऐसी गलत मान्यताओं को अपने दिमाग में न घुसने दें, नहीं तो वे हमें बाधा पहुँचाती ही रहेंगी

बिल्ली का रास्ता काटना

black cat

भारत में रास्ते में बिल्ली या गधा रास्ता काटे तो अपशकुन माना जाता है। जबकि, कुछ देशों में काली बिल्ली का रास्ता काटना शुभ माना जाता है। इसमें सच क्या है? हम कहते हैं कि आज रास्ते में बिल्ली ने रास्ता काटा, इसलिए हमारा नुकसान हो गया। अब होता यह है कि हम बिल्ली को देखते-देखते जा रहे हैं, और मन में शंका हो कि कुछ नुकसान होगा, उसी में ध्यान भटकने के कारण कदम चूक जाते हैं और गिर पड़ते हैं। फिर हम कहते हैं कि बिल्ली देखी इसलिए ऐसा हुआ! बिल्ली तो रोज इसी रास्ते से गुजरती थी, पर हमने उसे देखा इसलिए शंका हुई, नहीं तो ऐसा कुछ नहीं था। एक बार शंका हुई कि बिल्ली ने रास्ता काटा, इसलिए फिर अड़चनों की शरुआत हो जाती है और फिर हम पूरा दिन दुःखी होते रहते हैं। वास्तविकता में बिल्ली बाधा नहीं पहुँचाती, बल्कि हमारी शंका ही हमें बाधा पहुँचाती है। हमारे कर्म के हिसाब से जो होने वाला है वह तो होगा ही, उसमें बिल्ली को देखने से कोई बदलाव कैसे हो सकता है? इसलिए, हमें दुःखी करने वाली मान्यताओं को एक तरफ रख देना चाहिए। मानने वाले को ही अपशकुन होता है, न मानें तो कुछ नहीं होता। वास्तव में तो बिल्ली, गधा, उल्लू आदि हर एक जीव में आत्मा है। हर जीव के भीतर भगवान बैठे हैं, परमात्मा हैं, ऐसी दृष्टि से देखें तो अपशकुन कहाँ से होगा? ऐसी दृष्टि से हर जीव को देखेंगे, तो कोई अपशकुन नहीं होगा और हम इस अंधविश्वास से बाहर निकल सकते हैं।

शुभ–अशुभ मुहूर्त

भारत में कोई भी शुभ काम करने से पहले चौघड़िया देखकर शुभ मुहूर्त तय किया जाता है, ताकि काम निर्विघ्न सफल हो सके। लेकिन कई बार शुभ मुहूर्त देखकर शुरू किया गया कार्य भी पूरा नहीं हो पाता। यदि वास्तव में यह चीज़ वैज्ञानिक है, तो इसके सिद्धांत में कभी भी कोई बदलाव नहीं होना चाहिए। सिद्धांत यानी क्या कि हाइड्रोजन के दो परमाणु और ऑक्सीजन का एक परमाणु मिले तो पानी ही बनता है। फिर किसी भी क्षेत्र में, किसी भी समय और किसी भी संयोगों में यह सिद्धांत अपरिवर्तित ही रहता है। लेकिन अगर सिद्धांत में बदलाव हो जाए, तो समझ लेना चाहिए कि उसमें विरोधाभास है और वह वैज्ञानिक नहीं है। चौघड़िया देखकर काम करने में कभी लाभ होता हो और कभी नुकसान होता हो, तो समझना चाहिए कि इसमें कोई सिद्धांत नहीं है। मेरे अच्छे-बुरे कर्मों के आधार पर ही मुझे लाभ या नुकसान होता है। वास्तव में, जिस भगवान या देव-देवियों में हमारी श्रद्धा हो, उनसे प्रार्थना करके जिस समय काम शुरू कर दें, वही सबसे शुभ मुहूर्त होता है। ऐसा भी कहा जाता है कि बरसात में देवता सो जाते हैं, इसलिए उस समय शादी के लिए शुभ मुहूर्त नहीं होते। लेकिन वास्तविकता यह है कि बरसात में शादी करने जाएँ, तो बारिश के कारण बारात निकालना, पटाखे फोड़ना और महंगे कपड़े पहनकर बाहर निकलना, ये सब संभव नहीं होगा। भारत एक कृषि-प्रधान देश है, इसलिए पहले किसान बरसात में खेती करने में व्यस्त रहते थे, इसलिए शादियों के लिए समय नहीं होता था। इसलिए, कुछ मुहूर्त तय करने के पीछे का उद्देश्य समाजिक व्यवस्था को बनाए रखना भी हो सकता है। दूसरी ओर देखें तो धार्मिक कथाएँ बरसात के मौसम में पूरे जोर-शोर से चलती रहती हैं, तो उसमें मुहूर्त बाधा नहीं बनता? इसलिए हमें ऐसी अंधश्रद्धाओं में पड़ना ही नहीं चाहिए। जिस समय जो कार्य किया वह उचित है, ऐसा मानकर चलना चाहिए।

वास्तुशास्त्र

वास्तुशास्त्र और फेंगशुई जैसी प्राचीन प्रणालियों के अनुसार घर की बनावट, फर्नीचर की व्यवस्था और घर में कुछ विशेष चीज़ों को रखने की परंपरा चली आ रही है। इसमें घर का दरवाज़ा, पलंग आदि कुछ खास दिशाओं में रखना शुभ माना जाता है। ऐसा माना जाता है कि इससे घर में सुख, शांति और समृद्धि बढ़ती है। अधिकतर लोग आर्थिक, शारीरिक या पारिवारिक परेशानियाँ दूर करने के उद्देश्य से घर, ऑफिस या फैक्ट्री में तोड़-फोड़ करवाकर निर्माण की दिशाओं में बदलाव भी कराते हैं।

vastu

वास्तविकता में देखें तो, कई लोग वास्तुशास्त्र के नियमों के अनुसार मकान बनवाते हैं और इसके पीछे लाखों–करोड़ों रुपये खर्च कर देते हैं, फिर भी उन्हें हमेशा सफलता नहीं मिलती। कई बार वास्तुशास्त्रियों के पास जाने पर वे कहते हैं कि आप जिस घर में रहते हैं, उसका दरवाज़ा दक्षिण दिशा में है, इसलिए लक्ष्मी घर से चली जाती है। जो व्यक्ति उस घर में बीस साल से रह रहा होता है, वह व्यक्ति भी ऐसी बातों में आ जाता है और घर में तोड़-फोड़ करके दरवाज़े की दिशा बदलवा देता है। अपनी असफलता का दोष दरवाज़े पर डालने से उसे आश्वासन मिलता है। फिर भी नुकसान तो पूरा नहीं होता, ऊपर से दरवाज़ा बदलवाने का खर्च भी आ जाता है। मान लें कि बदलाव हो भी जाए, तो वह संयोगों पर निर्भर होता है। क्योंकि, नुकसान का समय कुछ समय के लिए ही होता है, उसके पूरा होने पर फ़ायदा होना ही था। लेकिन व्यक्ति मान लेता है कि दरवाज़ा बदलने से ही फायदा हुआ है। इस प्रकार अंधविश्वास घर कर जाता है। एक बार मान्यता बैठ जाए कि यह दरवाज़ा गलत दिशा में है या यह अलमारी गलत जगह पर रखी है, तो फिर व्यक्ति हमेशा दुःखी होता रहता है कि इसके कारण परिस्थितियाँ खराब हुई हैं। यदि वास्तुशास्त्र या फेंगशुई के आधार पर सुख-समृद्धि मिलती हो, तो सभी वास्तुशास्त्रियों के जीवन में कोई दुःख नहीं होना चाहिए। लेकिन वास्तव में ऐसा देखने को नहीं मिलता।

शास्त्र के आधार पर की गई कोई क्रिया अगर कभी सफल होती है और कभी सफल नहीं होती, तो समझ लेना चाहिए कि वह सत्य नहीं है। जैसे पानी को गरम करने पर भाप बनती है और भाप के ठंडे होने पर पानी ही बनता है, यह सिद्धांत है। उसी तरह वास्तविकता में, यदि वास्तुशास्त्र या फेंगशुई के पीछे कोई वैज्ञानिक सिद्धांत होता, तो हर व्यक्ति को उसका फल मिलना चाहिए। लेकिन यदि ऐसा नहीं होता, तो वह विज्ञान नहीं, केवल मान्यता है। मनुष्य के पुण्य-पाप के आधार पर ही उसको सुख-दुःख मिलता है, वस्तुएँ या घर बाधक नहीं हैं। पाप और पुण्य का उदय-अस्त होता ही रहता है, इस तरह चक्र चलता ही रहता है। किसी वस्तु की जगह बदलने या दरवाज़े की दिशा बदलने से हमारे कर्मों में कोई बदलाव हो यह नहीं हो सकता। वास्तव में, वास्तुशास्त्र के पहले पन्ने पर लिखा है कि जो आत्म में रहते हैं, उन्हें वास्तुशास्त्र की आवश्यकता ही नहीं होती।

×
Share on