
भारत में लोग जीवन में कोई दुःख या परेशानी आने पर ज्योतिषी, ओझा और तांत्रिकों के पास जाते हैं। वे लोग कहते हैं कि आपकी समस्याओं का कारण पितृदोष है, आपके पितर आपसे नाराज़ हैं और वे आपको कष्ट पहुँचा रहे हैं। फिर पितरों को शांत करने के लिए ब्राह्मणों द्वारा पिंडदान करवाने का रिवाज़ भी बताया जाता हैं। जिससे पितरों को मुक्ति मिल जाए और हमारे दुःख दूर हो जाएँ। इसके अलावा, पितरों की तृप्ति के लिए वर्ष में एक बार श्राद्ध की क्रिया भी की जाती है। कहा जाता है कि पितर कौए बनकर आते हैं और उन्हें खीर-पूरी खिलाने से उनकी मुक्ति होती है।
हमारे पितर यानी हमारे ही माता-पिता, दादा-दादी या बुजुर्ग। क्या कभी सोचा है कि हमारे ही बाप-दादा, जिन्होंने हमें बचपन से इतने लाड-प्यार से पाला हो, प्रेम दिया हो, जिन्होंने अपनी पूरी जिंदगी अपने बच्चों और आने वाली पीढ़ियों की सुरक्षा में न्योछावर कर दी हो, वे लोग हमें कष्ट पहुँचाने कैसे आ सकते हैं? वह भी कौआ बनकर ही क्यों आएँ? मोर, तोता या मैना जैसे पक्षियों के रूप में क्यों नहीं? जिन शहरों में कौए देखाई ही नहीं देते, वहाँ पितर कैसे आते होंगे?

नियम यह है कि आत्मा जैसे ही एक शरीर को छोड़ता है, वैसे ही तुरंत दूसरा शरीर धारण कर लेता है। तो हमारे जो पितर मृत्यु को प्राप्त हो चुके हैं, वे अभी कोई न कोई शरीर धारण कर चुके होंगे। यदि वे मनुष्य देह में होंगे, तो कौआ बनकर कैसे आ सकते हैं? जैसे हम वर्षों तक अपने पितरों को याद करके श्राद्ध करते हैं, वैसे ही हमारे पिछले जन्म के बेटा-बेटी या पोता-पोती भी हमारे नाम पर आज श्राद्ध करते ही होंगे। तो क्या हम आज मनुष्य से कौआ बनकर उनकी छत पर खीर-पूरी खाने जाते हैं? नहीं। तो फिर यह कैसे संभव हो सकता है? अपना कर्म बदलकर कोई कौआ बन सके, ऐसी शक्ति मनुष्य के हाथ में है ही नहीं। ऐसे ही देखादेखी में ऐसी मान्यताएँ समाज में घुस गई हैं और लोग बिना सोचे-समझे अंधविश्वास में बहते जा रहे हैं।
ये सभी मान्यताएँ गलत हैं। वास्तविकता में कागवास (श्राद्ध में कौए को भोजन देने की प्रथा) जैसा कुछ होता ही नहीं है। कर्म का सिद्धांत यह है कि हमारे कर्म का फल हमें ही भुगतना पड़ता है। इतना ही नहीं, बल्कि ऐसी बाहरी क्रियाएँ करने से हमारी समस्याएँ बंद हो जाएँगी, इस बात में कोई तथ्य नहीं है। उल्टा इस प्रकार हम पितरों पर दोष लगाकर, उन्हें अपनी तकलीफों के लिए ज़िम्मेदार ठहरातें हैं, दोषित देखते हैं, उसके लिए हमें उनसे क्षमा माँगनी चाहिए। हमें अपने पितरों को याद करके प्रार्थना करनी चाहिए कि वे जहाँ भी हों, वहाँ सुख और शांति पाएँ। उनके प्रति जो भी राग-द्वेष हुए हों, उन सभी को उनकी पुण्यतिथि पर याद करके माफ़ी माँग लेनी चाहिए, ताकि हमारे हिसाब-किताब साफ़ हो जाएँ और वे जहाँ भी हों, वहाँ उन्हें शांति के स्पंदन पहुँच जाएँ। ज़्यादा से ज़्यादा पितरों के नाम पर दान-पुण्य करके अच्छे कामों में पैसे खर्च कर सकते हैं। ऐसा करने का उद्देश्य यह है कि बाद की पीढ़ियाँ बुजुर्गों की पूरी संपत्ति हड़प लें और परोपकार का कोई कार्य न करें, ऐसा न हो। लेकिन यदि हम पुण्य के कार्य करेंगे तो उसका फल हमें ही मिलेगा, हमारे पितरों को नहीं मिलेगा, यही कर्म का सिद्धांत है।
हमारे जो बुजुर्ग मृत्यु को प्राप्त हुए हैं, उनकी याद में मृत्यु के बाद की धार्मिक क्रियाएँ और श्राद्ध करने की व्यवस्था हमारे ऋषि-मुनियों ने एक विशेष आयुर्वेदिक और वैज्ञानिक उद्देश्य से की थी। आज वह उद्देश्य भुला दिया गया है। आज श्राद्ध केवल एक क्रिया बनकर रह गया है और वह भी अंधविश्वास के साथ किया जाता है। बरसों पहले भारत के गाँवों में जब मलेरिया जैसी बीमारियों की दवा नहीं खोजी गई थी, तब श्राद्ध करने की शुरुआत हुई थी। हर साल भादो की शुक्ल पूर्णिमा से भादो की कृष्ण अमावस्या तक का समय श्राद्ध पक्ष कहलाता है। उस समय भादो के महीने में गाँवों में हर एक घर के बाहर कोई न कोई बीमार व्यक्ति खाट बिछाकर सोया हुआ दिखाई देता था। क्योंकि, भादो के महीने में शरद ऋतु के वातावरण के कारण पित्त का प्रकोप बढ़ जाता है। मानसून के मौसम में मच्छरों का उपद्रव बहुत बढ़ जाता है और उसमें भी पित्त प्रकृति वाले लोगों को मच्छर बहुत काटते हैं। मलेरिया को पित्त का बुखार कहा जाता है। जब मच्छर एक व्यक्ति को काटकर दूसरे व्यक्ति को काटता है, तब मलेरिया का बुखार फैलता है। उस समय तक मलेरिया का कोई इलाज नहीं मिल पाया था। बुखार बहुत तेज़ आता था, पर कोई दवा न मिलने के कारण लोगों की मृत्यु हो जाती थी। महामारी बढ़ने पर लोगों की एक के बाद एक मृत्यु होने लगी। ऐसी परिस्थिति उत्पन्न हो गई थी कि यदि इसे नहीं रोका जाता, तो भारत की आबादी आधी हो जाती!

उस समय पित्त के बुखार को शांत करने के लिए ऋषि-मुनियों और संतों ने यह खोज की कि इस समय के दौरान रोज़ दूधपाक या खीर खानी चाहिए। दूधपाक में दूध और चीनी होती है, जिससे पित्त शांत हो जाता है और मलेरिया की महामारी को बढ़ने से रोका जा सकता है। लेकिन ऐसा करने में एक समस्या यह थी कि उस समय बहुत बड़े परिवार होते थे। घर में इतने सारे लोगों के लिए रोज़-रोज़ दूधपाक बनाना, हर किसी की आर्थिक स्थिति के लिए संभव नहीं था। इसलिए, लोग दूधपाक बनाकर नहीं खाते थे, जिससे बीमारी बढ़ती ही जा रही थी। इसका समाधान निकालने के लिए धर्म के नाम पर यह प्रथा समाज में शामिल कर दी गई। अपने घर पर रोज़ दूधपाक न बना पाएँ, तो श्राद्ध के नाम पर दूधपाक बनाकर लोगों को खिलाएँ, ऐसा रिवाज बनाया गया। इसलिए, लोग भादो की पूर्णिमा से सोलह दिनों तक श्राद्ध करने लगे, जिसमें उनके जो परिवारजन गुजर गए थे, उनके नाम पर दूधपाक बनाकर लोगों को खिलाने लगे। एक दिन एक व्यक्ति के घर दूधपाक बनता और सब लोग खाते। दूसरे दिन दूसरे के यहाँ दूधपाक बनता और वह सबको खिलाता। इस तरह बारी-बारी से एक के बाद एक घर में दूधपाक बनता और इस बहाने लोग रोज़ दूधपाक खाते। यदि कोई आनाकानी करता कि “मैं दूधपाक नहीं बनाऊँगा”, तो लोग दबाव डालते कि “बाप-दादा के नाम पर श्राद्ध भी नहीं कर रहे हो?” अंततः सामाजिक दबाव के कारण उसे भी सबको खिलाना ही पड़ता था। यह तरीका लोगों को पसंद आ गया, इसलिए लोगों ने इसे करना जारी रखा। दूधपाक खाने से लोगों का पित्त शांत हो जाता था, जिससे मलेरिया होने की संभावना कम हो गई और मृत्यु दर घट गई। इसीलिए लोग कहते थे कि सोलह श्राद्ध के बाद जो जीवित रहे, वे ‘नवरात्रि’ में आए, यानी उन्होंने नई रात देखी! इस प्रकार नवरात्रि का त्योहार मनाया जाता था। इस प्रकार, श्राद्ध करने के पीछे पूर्वजों को जोड़ने का उद्देश्य कुछ और ही था। वास्तविकता में खीर खिलाने की प्रथा का फल सचमुच किसी भी पूर्वज तक नहीं पहुँचता है।
कुदरत का नियम ऐसा है, कि निकट संबंधियों के साथ सभी ऋणानुबंध पूरे होने के बाद ही उस व्यक्ति के शरीर से आत्मा अलग होता है। इसलिए मृत्यु के बाद वे फिर कभी एक-दूसरे से नहीं मिलते। अतः, श्राद्ध जैसी धार्मिक क्रियाएँ यदि अंधविश्वास से नहीं बल्कि समझदारी के साथ की जाएँ, तभी उसका वास्तविक उद्देश्य पूरा हो सकता है। आज जब अंधविश्वास को बढ़ावा देने वाली ऐसी मान्यताओं के आधार पर समाज में व्यापार शुरू हो गया है, तब यह विचार करना आवश्यक हो जाता है कि किसी भी आत्मा की मुक्ति इस प्रकार कैसे संभव हो सकती है।
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