भारत के गाँवों में यदि सबसे अधिक अंधविश्वास कोई फैला हुआ है, तो वह माताजी के आने के बारे में है। लोग ऐसा मानते हैं कि माताजी किसी व्यक्ति, विशेष रूप से किसी महिला के शरीर में प्रवेश करती हैं और फिर वह झूमने लगती है। झूमते-झूमते वह महिला जो कुछ भी बोलती है, वह सब माताजी ही बोल रही हैं और वह सच साबित होता है। उसमें भी जब नवरात्रि का समय आता है, तब तो घर-घर और गली-गली में माताजी का आना शुरू हो जाता है। फिर तो गाँव के लोग “माताजी आईं, माताजी आईं” कहकर दौड़ पड़ते हैं और लंबे होकर साष्टांग दंडवत प्रणाम करने लगते हैं। महिलाएँ तो बाल खोलकर डरावने तरीके से झूमने लगती हैं और थोड़ी-थोड़ी देर में पूरा कलश पानी पी जातीं हैं। कभी-कभी तो ऐसा भी देखने को मिलता है कि कुछ झूमने वाले व्यक्तियों के शरीर से कुमकुम गिरता है। यह सब देखकर सीधे-साधे भोले लोग प्रभावित हो जाते हैं।
यदि हम जाँच करें, तो जिसे लोग माताजी कहकर नमस्कार कर रहे थे, वही महिला बाद में घर जाकर अपने पति, सास और ननद के साथ झगड़ती रहती है। माताजी जैसी सात्त्विक देवियों को यदि आना हो, तो क्या वे किसी सुपात्र व्यक्ति को नहीं चुनेंगी? जो लोग रोज सुबह पहले प्रहर में उठकर घंटों तक माताजी की दिल से भक्ति और साधना करते हैं, क्या माताजी वहाँ प्रकट नहीं होंगी? उनके ऊपर कुमकुम नहीं बरसाएँगी? ऐसी कलह करने वाली व्यक्ति के शरीर में आकर माताजी उसके ऊपर कुमकुम क्यों बरसाएँगी? इसलिए, वास्तविकता में ऐसा कुछ भी नहीं होता है। अक्सर कुमकुम भी हाथ की सफाई से ही आता है। यदि कोई बुद्धिमान व्यक्ति इसकी जाँच करे, तो पता चल जाएगा कि वे लोग अपने कपड़ों में कुमकुम की पोटलियाँ छिपाकर रखते हैं।

वास्तव में अंबा माँ, पद्मावती माँ, दुर्गा माँ, महाकाली माँ, ये सभी बहुत उच्च कोटि की देवियाँ हैं। जब किसी में बहुत अधिक सात्त्विकता हो, दूसरों के कल्याण के लिए खूब काम किए हों और ज़बरदस्त पुण्य कमाए हों, तब जाकर ऐसी उच्च कोटि की देवी के रूप में जन्म होता है। लाखों-करोड़ों लोग उनकी पूजा करते हैं। ऐसी देवियाँ इतने साधारण प्रश्नों, “माताजी, मेरी भैंस खो गई है, वह वापस मिलेगी या नहीं?”, “मेरा पति किसी दूसरी स्त्री के चक्कर में है, वह सुधरेगा या नहीं?” का जवाब देने के लिए इस पृथ्वी पर नहीं आतीं। उच्च कोटि के देवी-देवता तो पूर्ण वीतराग भगवान की सेवा में ही रहते हैं। वे इस घोर कलियुग में, इस मृत्युलोक में स्थूल रूप में आएँगे ही नहीं। माताजी का राजीपा तो उन लोगों पर अधिक होता है, जिनकी सिर्फ़ मोक्ष मार्ग में आगे बढ़ने की तमन्ना होती है। वहाँ उनकी संपूर्ण कृपा बरसती है और वह कृपा सूक्ष्म रूप में होती है। मोक्ष मार्ग के विघ्नों को दूर करने में वे बहुत सहायता करती हैं।
इसलिए, लोगों में माताजी आईं, वे झूमने लगीं और उन्होंने ऐसा कहा, इस तरह की जो भी बातें होती हैं, वे सब मनगढ़ंत बातें हैं या फिर साइकोलॉजिकल इफेक्ट है। वास्तविकता में माताजी नहीं आतीं। जो व्यक्ति झूमता है, वह लोगों को धोखा देने के लिए या फिर साइकोलॉजिकल इफेक्ट में आकर ऐसा करता है। जबकि, आस-पास के लोग भी माताजी से मुझे कुछ लाभ होगा, इस लालच में आकर ऐसी मान्यताओं में बह जाते हैं।
कलियुग के जीव अपने विपरीत कर्मों के उदय को सहन करने की शक्ति खो चुके हैं। कर्मों की मार पड़ने पर वे इतने व्याकुल हो जाते हैं कि अपनी स्थिरता ही खो देते हैं। फिर “माताजी मेरा कुछ भला करेंगी”, इसी उम्मीद में आश्वासन पाने के लिए ऐसे अंधविश्वास में डूब जाते हैं। दूसरी ओर, कर्मों का चाहे जैसा भी उदय आए, फिर भी “मुझे इसमें से छूटना ही है, इस कर्म को पूरा करना है”, ऐसी समझ रखने वाले लोगों को इसमें किंचित्मात्र भी फेरफार करने का विचार नहीं आता और वे ऐसे अंधविश्वास में नहीं बहते।
यदि माताजी की भक्ति करनी ही है, तो अंधविश्वास से नहीं बल्कि सही समझ के साथ करनी चाहिए। माताजी आद्यशक्ति कहलाती हैं, वे प्राकृतिक शक्ति हैं। उनकी भक्ति करने से हमारी प्रकृति सहज होती है और चाहे जैसे भी कर्म हों, हमें उनसे जूझने की शक्ति मिलती है। हमें उनसे सांसारिक चीजों के बजाय, कर्मों से पार निकलने के लिए शक्ति और सामर्थ्य माँगना चाहिए। क्योंकि, हमने जो कर्म बाँधें हैं, उसका फल भोगे बिना कोई चारा ही नहीं है।
आजकल पढ़े-लिखे हों या अनपढ़, हर तरह के लोगों में मैली विद्या को लेकर अंधविश्वास फैला हुआ नज़र आता है। वे मानते हैं कि जिस व्यक्ति को हमसे ईर्ष्या हो या जिसकी हमारे साथ दुश्मनी हो, वह हमारे ऊपर ऐसी मैली विद्या, ब्लैक मैजिक (काला जादू), जादू-टोना या विचक्राफ्ट करवा सकता है। साथ ही, उनका यह भी मानना है कि मैली विद्या से दूसरों को कई तरह के नुकसान पहुँचाए जा सकते हैं, जैसे कि कोई बीमारी होना, धंधे में नुकसान होना, वैवाहिक जीवन का टूटना आदि। इसलिए, जब लोगों के सामने इस तरह की मुश्किलें आती हैं, तो वे इसे मैली विद्या का असर मानकर उसके निवारण के लिए तांत्रिकों और ओझाओं के पास जाते हैं और पैसों को पानी की तरह बहाते हैं। उसमें भी यदि घर के ही किसी सदस्य पर यह शक होने लगे कि यह व्यक्ति हमारे ऊपर ऐसी मैली विद्या करवा रहा है, तो फिर उस वहम का कोई इलाज नहीं होता। बिना किसी ठोस आधार के ऐसे अंधविश्वास से रिश्ते तो बिगड़ते ही हैं, साथ ही एक-दूसरे के प्रति राग-द्वेष और बैर भी बढ़ता है।

मैली विद्या एक प्रकार की विद्या तो है, लेकिन वह सबको असर नहीं कर सकती। जो लोग कमज़ोर मन के होते हैं और “मुझे कुछ हो जाएगा” इस डर में रहते हैं, उन्हें ही मैली विद्या असर करती है। लेकिन जो मज़बूत मन के हैं, उन पर कोई असर नहीं होता। लाखों में एक-आध मामला ही सच होता है, बाकी ज़्यादातर साइकोलॉजिकल इफेक्ट ही होती है। जो लोग कमज़ोर मन के होते हैं और जिनका आपस में बैर का हिसाब होता है, वे लोग ही इसकी असर में आते हैं। उनके मन में यही डर बना रहता है कि “यह मुझे कुछ कर देगा तो?”, “मुझे कुछ हो जाएगा तो?” तो फिर सचमुच उसका असर हो ही जाता है। यह मान्यता ही इंसान को बहुत दुःखी कर देती है और अंत में पागल तक बना देती है। यदि हम इसमें न उलझें, तो हमें कोई भी परेशान नहीं कर सकता। मज़बूत मन रखें कि “जिसे जो टोने-टोटके करने हों, वो करें और नींबू-मिर्ची बाँधनी हो, वह बाँधे, लेकिन मुझे कुछ होने वाला नहीं है।” तो सामने वाले की मैली विद्या का असर उसी पर होगा। यदि हम भगवान में श्रद्धा रखें, उनकी भक्ति करें और संतों या ज्ञानी पुरुष से सही समझ प्राप्त करें, तो मैली विद्या हमारा कुछ भी नहीं बिगाड़ सकती।
यदि हमारे पैर में दर्द हो रहा हो और हम घर के ही किसी व्यक्ति पर शक करने लगें कि इन्होंने ही कुछ किया है, तभी दर्द हो रहा है। फिर हम नींबू उतारते रहते हैं या तांत्रिकों के पास जाकर दाने दिखवाते रहते हैं, तो इसी में आधी जिंदगी बीत जाती है। पैरों का दर्द तो जाता नहीं है। वास्तविकता में खट्टा खाने की वजह से पैरों में दर्द हो रहा होता है और संयोगवश यदि वह खाना बंद हो जाए, तो दर्द कम हो जाता है। लेकिन मन में यह अंधविश्वास बैठ जाता है कि नींबू बाँधने की वजह से या दाने दिखवाने से दर्द कम हुआ है, फिर तो तांत्रिकों के पास लोगों की भीड़ बढ़ने लगती है। उस व्यक्ति के साथ बैर बढ़ता है, वह तो अलग। फिर बदला लेने के लिए हम गलत रास्ते अपनाते हैं। इन सब का कोई अंत ही नहीं होता। इससे अच्छा है कि हम डॉक्टर के पास जाएँ या मनोचिकित्सक की सलाह लें, तो बीमारी और अंधविश्वास दोनों से मुक्त हो सकते हैं।
कुछ लोग तो धमकी भी देते हैं कि, “मैं तुम्हें जादू-टोने से देख लूँगा।” इसके बाद यदि सामने वाले व्यक्ति के जीवन में कोई परेशानी आती है, तो उसके मन में यह अंधविश्वास बैठ जाता है कि उसने ही मेरे ऊपर जादू-टोने किए होंगे। नियम ऐसा है कि हमारे हिसाब के बिना कोई भी हमारा कुछ नहीं बिगाड़ सकता। जब हिसाब के बिना एक मच्छर भी नहीं काट सकता, तो जादू-टोना कैसे असर कर सकता है? यदि यह सही समझ हाज़िर रहेगी, तो डर नहीं रहेगा। जो व्यक्ति ऐसी धमकी देता है कि “मैं तुम्हारे ऊपर मैली विद्या करूँगा”, वह वास्तव में कुछ भी नहीं कर सकता। हम उससे जितना ज़्यादा घबराएँगे, वह उतना ही ज़्यादा बोलेगा और यदि हम डरेंगे नहीं, तो सामने वाला अपने आप ही चुप हो जाएगा।
जो कर्म हमने किया है, उसका फल हमें ही मिलेगा। फिर वह फल किसी भी निमित्त से आ सकता है, इसमें उस निमित्त का कोई दोष नहीं है। भगवान महावीर के कानों में कीलें ठोंकी गईं, श्रीकृष्ण भगवान के पैर में तीर लगा, फिर भी वे अपने ही कर्मों का हिसाब है, यह समझकर समता में रहे। जिससे वे कर्मों से मुक्त हुए और मोक्ष में भी गए। यदि ऐसी समझ बरकरार रखें कि, “मेरे कर्मों का हिसाब मुझे ही भुगतना है। मुझे इस हिसाब को पूरा करना है और किसी के प्रति राग-द्वेष करके नए हिसाब नहीं बाँधने हैं।” तो फिर कर्म समतापूर्वक पूरे हो जाते हैं। पहाड़ जैसा भारी कर्म भी पत्थर की तरह हल्का हो जाता है। इसके बावजूद, यदि किसी व्यक्ति के प्रति राग-द्वेष, नापसंदगी या तिरस्कार का भाव हुआ हो, तो मन ही मन उसकी माफ़ी माँग लें, ताकि हम कर्मों के हिसाब से छूट सकें।

दूसरी अंधश्रद्धा जो व्यापक रूप से फैली हुई है, वह है भूत और प्रेत के साए की। जिसे दूर करने के लिए लोग तांत्रिकों और ओझाओं का सहारा लेते हैं। वास्तविकता में भूत व्यंतर देव हैं। वे मनुष्यों को बिना किसी वजह के परेशान नहीं करते, बल्कि उनकी मदद करते हैं। प्रेत और पिशाच, ये सभी प्रेतयोनि के जीव हैं। प्रेतयोनि का जीव यानी जिसे मृत्यु के तुरंत बाद दूसरा शरीर नहीं मिलता और कुछ वर्षों तक बिना शरीर के रहना पड़ता है। सामान्यतः मृत्यु के समय आत्मा जैसे ही एक शरीर छोड़ता है, वैसे ही तुरंत गर्भ में वीर्य और रज के मिलने पर नया शरीर धारण करता है। लेकिन कई बार मृत्यु के समय यदि कोई वासना रह गई हो, तो वह इस अवसर को खो देता है और उसे बिना शरीर के भटकना पड़ता है। उसमें भी दस-बारह साल से ज़्यादा नहीं भटकना पड़ता। प्रेतयोनि के जीवों का स्थूल शरीर नहीं होता, केवल सूक्ष्म शरीर होता है। इसलिए वे खा-पी नहीं सकते। जब उन्हें भूख लगती है, तब जिसके साथ उनका हिसाब बंधा होता है, उस व्यक्ति के शरीर में प्रवेश करके वे भोजन करते हैं। कई बार वे पचास-पचास लड्डू और पूरियाँ खाकर उनका सत्व चूस लेते हैं। लोग इसे ऊपरी साया कहते हैं। लेकिन ऐसा लाखों में एक-आध बार ही होता है। यदि हमारा उनके साथ राग-द्वेष का हिसाब हो, तभी प्रेतयोनि के जीव हमें सुख या दुःख दे सकते हैं। सही रास्ता तो यह है कि जिन-जिन जीवों के साथ राग-द्वेष हुए हों, उन सभी के पश्चाताप करके दिल से माफ़ी माँग लें, ताकि बैर से छूट सकें।
ज़्यादातर मामलों में जहाँ लोग मानते हैं कि व्यक्ति पर प्रेत का साया है, वहाँ वास्तव में कोई मानसिक बीमारी होती है, साइकोलॉजिकल इफेक्ट ही होता है। व्यक्ति को मनोचिकित्सक के पास ले जाने के बजाय लोग ओझा के पास ले जाते हैं। जहाँ उस व्यक्ति को मारा-पीटा जाता है, गर्म चीज़ों से दागा जाता है और बहुत यातनाएँ दी जाती हैं। लेकिन इससे कोई सुधार नहीं होता, बल्कि व्यक्ति की हालत और ज़्यादा खराब हो जाती है। ऐसे बहुत से मानसिक मरीज़ मनोचिकित्सक के पास जाकर ठीक भी हो जाते हैं। इसलिए समझ में आता है कि ये सब सिर्फ़ मान्यताएँ ही हैं।
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