
भारत जैसे देश में यदि कोई व्यक्ति हाथ से कुमकुम या राख निकाल दे, खाली हाथ से घड़ी निकाल कर दिखा दे, आँखों से किसी चीज़ को उठा ले, स्टील की चम्मच को मोड़ दे, तो उसे चमत्कार कहा जाता है। और ऐसे चमत्कार करने वाले व्यक्तियों को लोग सत्पुरुष मानकर उनकी पूजा भी करते हैं।
परम पूज्य दादाश्री हमें लौकिक मान्यताओं से हटकर एक अनोखी समझ देते हुए कहते हैं, कि चमत्कार करने वाले सत्पुरुष नहीं, बल्कि जादूगर कहलाते हैं। साधना में ऊँचे स्तर पर पहुँचे हुए सत्पुरुष कुमकुम, राख या घड़ी निकालने जैसे चमत्कार नहीं करते, बल्कि जिनसे हमारे भीतर आंतरिक परिवर्तन हो, सुख और शांति का अनुभव हो, वे ऐसे चमत्कार करते हैं। बाकी जो अन्य चमत्कार दिखाए जाते हैं, उनमें जादूगरी और हाथ की सफाई काम करती है। उनसे लोग कुछ समय के लिए चकित हो जाते हैं, पर खुद को कोई लाभ नहीं होता।
परम पूज्य दादाश्री चमत्कार की मान्यता के संदर्भ में एक तार्किक दृष्टांत देते हुए कहते हैं, कि "बाक़ी, चमत्कार जैसी वस्तु नहीं है और तू चमत्कार करने वाला हो तो ऐसा चमत्कार कर न कि भाई, इस देश को अनाज बाहर से नहीं लाना पड़े। इतना कर न, तो भी बहुत हो गया। वैसा चमत्कार कर। ये यों ही राख निकालता है और कुमकुम निकालता है, वैसे लोगों को मूर्ख बनाता है! दूसरे चमत्कार क्यों नहीं करता? वही का वही कुमकुम और वही की वही राख! और कुछ निकाल दिया, फलाना निकाल दिया, तो हम कहें न कि भाई, अनाज निकाल न, ताकि फ़ॉरेन से लाना नहीं पड़े।" वास्तव में देखने जाएँ तो कोई ऐसा चमत्कार क्यों नहीं करता, जिससे कहीं सोने की गिन्नियाँ बरसने लगें या रुपये के नोट गिरने लगें? यदि ऐसा हो, तो लोगों की समस्याएँ दूर हो जाएँ और कुछ काम भी बन जाए। लेकिन ऐसा नहीं होता।
मान लीजिए, कोई व्यक्ति आम का पत्ता लेकर लोगों के सामने ही कोई चमत्कार करके दिखाए और हम उससे कहें कि यही चमत्कार महुए के पत्ते से करके दिखाइए, तो क्या वह करेगा? नहीं। वह कहेगा, “मुझे तो आम का ही पत्ता दीजिए।” यदि यह वास्तव में चमत्कार है, तो उसे किसी भी पत्ते से किया जा सकता है। इस प्रकार, जिस बात को लोग समझ नहीं पाते कि यह कैसे हो रहा है, उसे वे चमत्कार मान बैठते हैं। इससे लोग मूर्ख बनते हैं और वह व्यक्ति खुद भी अपने लिए जोखिम खड़ा करता है।
परम पूज्य दादाश्री चमत्कार और अंधश्रद्धा के बीच क्या संबंध है, वह समझाते हैं।
प्रश्नकर्ता: तो फिर चमत्कार का जीवन में कितना स्थान है? चमत्कार अंधश्रद्धा की ओर ले जा सकता है क्या ?
दादाश्री: यह सारी अंधश्रद्धा, वही चमत्कार है। इसलिए चमत्कार करते हैं न, वह कहने वाला ही अंधश्रद्धालु है। खुद अपने आप को मूर्ख बनाता है, तो भी नहीं समझता! मैं तो इतना आपको सिखाता हूँ कि हमें चमत्कार करने वाले से पूछना चाहिए कि, 'साहब, कभी संडास जाते हो?' तब वह कहे, 'हाँ।' तो हम उसे पूछें, 'तो वह आप बंद कर सकते हो? या फिर उसकी आपके हाथ में सत्ता है?' तब वह कहे, 'नहीं।' 'तो फिर संडास जाने की आपमें शक्ति नहीं है, तो किसलिए इन सब लोगों को मूर्ख बनाते हो?' कहें।
इसलिए जीवन में चमत्कार का कोई स्थान नहीं है! भगवान श्रीकृष्ण जैसे महान पुरुषों ने भी चमत्कार के बारे में कुछ नहीं कहा, तो फिर साधारण मनुष्यों में ऐसी शक्ति कहाँ से आ सकती है? यह तो भोले-भाले लोगों को ठगकर उनका लाभ उठाने के लिए जगह-जगह चमत्कारी लोग खड़े हो गए हैं। यदि कोई विचारशील वैज्ञानिक सामने ही चुनौती देकर कहे कि, “जो यह साबित कर देगा कि यह चमत्कार है, तो उसे मैं एक लाख रुपये का इनाम दूँगा,” तो सभी भाग खड़े होंगे। कोई भी उस चुनौती को स्वीकार नहीं करेगा। क्योंकि, एक लाख रूपये देने वाला व्यक्ति बारीकी से पूरी जाँच-पड़ताल करेगा, हर पहलू से प्रश्न पूछेगा और सामने वाले को पूरी तरह से परखेगा। वहाँ बड़े-बड़े न्यायाधीश बैठे होते हैं और यदि कोई हाथ की सफाई या जादूगरी हो, तो उसे तुरंत पकड़ लेंगे। इसलिए वहाँ चमत्कार नहीं चलेगा। यह तो लोगों को सांसारिक लाभ उठाने की लालच है, इसलिए वे चमत्कारों में विश्वास करते हैं। जिसे कोई लालच ही नहीं है, वह इन चमत्कारों में विश्वास नहीं करेगा।
परम पूज्य दादा भगवान ऐसे स्पष्ट शब्दों में चमत्कार के पीछे के रहस्यों का खुलासा करते हैं कि हम इस लौकिक मान्यता पर विचार करने लगते हैं।
प्रश्नकर्ता: ये सब लोग जो चमत्कार करते हैं, ये चमत्कार करके वे क्या सिद्ध करना चाहते हैं?
दादाश्री: चमत्कार करके उनकी खुद की महत्ता बढ़ाते हैं। महत्ता बढ़ाकर इस भेड़चाल में चलने वाले के पास से खुद का लाभ उठाते हैं सारा। पाँच इन्द्रियों के विषय संबंधी सभी लाभ उठाते हैं और कषाय संबंधी भी लाभ उठाते हैं, सभी प्रकार का लाभ उठाना है। इसलिए अब हम चमत्कार वस्तु को ही उड़ा देना चाहते हैं कि भाई, ऐसे चमत्कार में फँसना नहीं। पर भेड़चाल वाला प्रवाह तो फँसनेवाला ही है, लालची है इसलिए। और कोई भी व्यक्ति यदि लालची हो, तो उसे बुद्धिशाली कह ही नहीं सकते। बुद्धिशाली को लालच नहीं होता और लालच हो तो बुद्धि है नहीं!
इसलिए यदि कहीं कोई चमत्कार देखने को मिले, तो सबसे पहले यह प्रश्न उठना चाहिए कि, “क्या इससे मेरे जीवन में कोई परिवर्तन आएगा?” या “क्या इससे मुझे सुख और शांति का रास्ता मिलेगा?” यदि इसका उत्तर ‘न’ हो, तो ऐसे चमत्कारों की अंधश्रद्धा में फँसने की ज़रूरत नहीं है।
कुछ स्थानों पर देव-देवियाँ लोगों में श्रद्धा उत्पन्न करने के उद्देश्य से कुमकुम या चावल गिराते हैं। कभी-कभी भगवान की प्रतिमा से अमृत वर्षा या केसर के छींटे भी निकलते हैं और या मंदिर के घंटे अपने आप बजने लगते हैं। ये गलत नहीं है। इससे लोगों में ईश्वर के प्रति श्रद्धा दृढ़ होती है। अगले दिन मंदिर में दर्शन के लिए लोगों की लंबी लाइन लगती है। परम पूज्य दादाश्री सही रास्ता बताते हुए कहते हैं, कि हम देवलोकों और ईश्वर को भावपूर्वक नमस्कार करें। किंतु यदि हम सच्चे भगवान को पहचानकर वीतराग मार्ग में आगे बढ़ना चाहते हैं और जीवन के सुख-दुःख से परे ऐसे मोक्षमार्ग की खोज कर रहे हों, तो ऐसे देवकृत चमत्कारों में भी नहीं उलझना चाहिए। इसके बजाय हमें उन्हीं भगवान और देव-देवियों से प्रार्थना करनी चाहिए कि, “मेरे क्रोध-मान-माया-लोभ कम हो जाए और मेरे जीवन में शांति हो, ऐसा कुछ कर दीजिए।” यह तो जैसे किसी छोटे बच्चे को चॉकलेट का लालच दें तो वह दौड़कर जाता है, उसी प्रकार मनुष्य भी लाभ पाने की लालच में अंधश्रद्धा की ओर खिंचा चला जाता है। मंदिर का कलश हिले, तो कुछ लोगों को दिखाई देता है और कुछ लोगों को नहीं दिखाई देता। इसलिए, ऐसी बातों में बहुत गहराई में जाने की ज़रूरत नहीं है। जिसे दिखाई देता है, उसके लिए ठीक है। बाकी विज्ञान इन बातों को स्वीकार नहीं करता। विज्ञान स्वीकार करे, उतनी बात सच माननी। दूसरा सब तो अंधश्रद्धा है।
यदि कोई थोड़ी-सी चित्तशक्ति का प्रयोग करके स्टील की चम्मच मोड़ दे, मेज़ को हवा में उठा दे या किसी वस्तु को बिना छुए हिला दे, तो वह हमारे किस काम का? लेकिन आजकल चमत्कार देखने के लिए लोगों की लंबी लाइनें लगती हैं। यदि हमारा अज्ञान दूर हो जाए और आत्मा का साक्षात्कार हो जाए, तो वही सच्चा चमत्कार है। यदि हमारे भीतर ठंडक और जीवन में हमेशा के लिए शांति हो जाए, तो वही काम का है। आत्मा की प्राप्ति हो जाए तो हमेशा के लिए सुख और शांति प्राप्त हो जाती है। और यदि आत्मा प्राप्ति के लिए कोई भूमिका है, तो वह केवल मनुष्यगति ही है। जहाँ हमें यह पक्का यकीन हो जाता है कि यहाँ से संसार के सुख-दुःख से मेरी मुक्ति अवश्य होगी, यही सही जगह है। बाकी, अन्य चमत्कार और सब कुछ अंधश्रद्धा हैं।
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