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किसीके साथ टकराव होना हमारे पिछले जन्म का कर्म है?

प्रश्नकर्ता : लेकिन दादाजी, टकराव नहीं हो ऐसा भाव तो निरंतर रहना चाहिए न?

दादाश्री : हाँ, रहना चाहिए। यही करना है न! उसका प्रतिक्रमण करना है और उसके प्रति भाव रखना है! फिर से ऐसा हो जाए तो फिर से प्रतिक्रमण करना, क्योंकि एक परत चली जाएगी, फिर दूसरी परत चली जाएगी। ऐसा परतवाला है न? मेरा तो जब टकराव होता था, तब नोट करता था कि आज अच्छा ज्ञान पाया! टकराने से फिसल नहीं जाते, जागृत ही जागृत रहते हैं न! वह आत्मा का विटामिन है। अर्थात् इस टकराव में झंझट नहीं है। टकराने के बाद एक दूसरे से अलगाव नहीं होना, वह पुरुषार्थ है। यदि सामनेवाले से हमारा मन जुदा हो रहा हो, तो प्रतिक्रमण करके राह पर ले आना हम इन सभी के साथ किस प्रकार तालमेल रखते होंगे? आपके साथ भी तालमेल बैठता है या नहीं बैठता? ऐसा है, शब्दों से टकराव पैदा होता है। मुझे बोलना बहुत पड़ता है, फिर भी टकराव नहीं होता न!

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