भगवान की पहचान

हम बचपन से ही भगवान और देव-देवियों की प्रार्थना करते आ रहे हैं, उनकी भक्ति करते आ रहे हैं और इसी तरह अलग-अलग तरीके से भगवान एवं धर्म से जुड़े हुए हैं। फिर भी, हम पूछते हैं कि भगवान कौन हैं? क्या हकीकत में भगवान का अस्तित्व हैं? क्या वास्तव मे भगवान हैं? कहाँ हैं भगवान? क्या किसी ने भगवान को देखा हैं या उनका अनुभव किया हैं? भगवान का पता क्या हैं? यह ब्रह्मांड किसने बनाया? क्या भगवान के अस्तित्व का कोई सबूत हैं? क्या ये दुनिया भगवान चलाते हैं? भगवान का न्याय क्या है? हम भगवान के साथ अभेद कैसे हो सकते हैं? क्या मैं भगवान का प्रेम पा सकता हूँ? क्या भगवान से की हुई हमारी प्रार्थनाओं का हमें ज़वाब मिलता हैं? क्या भगवान एक है या अनेक हैं? क्या भगवान के प्रेम को महसूस कर सकते हैं? भगवान और विज्ञान के बिच कोई सबंध हैं? नि:शंक भरे विकसित दिमाग़ में ऐसे कई प्रश्न उठते हैं। आखिरकार भगवान को जानने की आपकी खोज ही आपको यहाँ ले आई हैं!

जब हम इस विशाल ब्रह्मांड को देखते हैं, तब हम एक अद्भुत शक्ति का अ भव करते हैं जो सभी को संतुलित रखती हैं ऐसा प्रतीत होता हैं। दूसरा, जब हम सुंदर प्रकृति को देखते हैं, हम इसकी प्रशंसा करते हैं और उसके साथ आत्मीयता का अनुभव करते हैं। फिर भी हम कुदरती आपदा, बीमारी, गरीबी, अत्यन्त दुःख, अन्याय और हिंसा से व्याकुल होते हैं। एक ओर हम देखते हैं किस तरह मनुष्यों ने विज्ञान और तकनिकी में तरक्की की है और दूसरी तरफ हम देखते हैं कि किस तरह ज़्यादा से ज़्यादा लोग तनाव, डिप्रेसन और चिंता से जूझ रहे हैं। दुनिया के प्रति ऐसा दोतरफा दृष्टिकोण कई सारे प्रश्न खड़े करता है जैसे कि - भगवान कहाँ हैं? क्या प्रार्थना में शक्ति है? भगवान का प्रेम कहाँ खो गया? क्यों इतना अन्याय है? क्यों अच्छे कर्म करनेवाले लोगों को सहन करना पड़ता हैं, जबकि दूसरे लोग जो गलत करते हैं फिर भी आज़ाद घुमते हैं? 

तो क्या भगवान हैं? हाँ, वास्तव में भगवान हैं! उतना ही नहीं बल्कि भगवान तो आपके अन्दर ही हैं। परम पूज्य दादाश्री कहते हैं “गोड इज इन एवरी लिविंग क्रिएचर, वेधर विज़ीबल और इनविज़ीबल।”

बहुत लोग परम पूज्य दादाश्री के पास ऐसे प्रश्न लेकर आते थे और न केवल संतोषजनक समाधान पाया बल्कि भीतरवाले भगवान का भी अनुभव उन्होंने किया। हम आशा करते हैं आप भी ऐसा ही अनुभव प्राप्त करेंगे जब आप भगवान को खोजने एवं अनुभव करने हेतु आगे पढ़ेंगे...

भगवान से क्या मांगे?

हमें भगवान से प्रार्थना करनी चाहिए की आपने जैसे आत्मा का अनुभव किया है वैसा ही अनुभव हमे प्राप्त हो और ज्ञानी पुरुष की शरण मिल जाये| सांसारिक वस्तुए मांगने से कुछ नहीं होगा, क्योंकि हम कर्मो का हिसाब लेकर आये है|

Top Questions & Answers

  1. भगवान कहाँ हैं ?
  2. क्या भगवान ने ये दुनिया बनाई हैं?
  3. क्या ब्रह्मा विष्णु महेश ने मिलकर ये दुनिया बनाई हैं?
  4. क्या भगवान के कोई गुण हैं?
  5. भगवान का प्रेम किस तरह प्राप्त किया जा सकता हैं?
  6. क्या भगवान की भक्ति और उनके प्रति हमारी श्रद्धा हमें मुक्ति दिलाएगी?
  7. क्या भगवान हमारे सारे पाप माफ़ कर देते हैं? और सच्चा सुख क्या है?
  8. भगवान के प्रति एकाग्रता को कैसे बढ़ाएँ?
  9. भगवान पद की प्राप्ति कैसे करें?
  10. क्या मूति॔-पूजा या दर्शन करना ज़रूरी है ?
  11. अंबा माता और दुर्गा माता कौन हैं?
  12. देवी सरस्वती क्या दर्शाती हैं?
  13. लक्ष्मीजी कहाँ रहती हैं? उनके क्या कायदे हैं?
  14. क्या भगवान ब्रह्मांड के मालिक हैं? हम जीवन में बंधन मुक्त कैसे हो सकते हैं? हमें मोक्ष कैसे मिलेगा?

Spiritual Quotes

  1. गॉड इज इन एवरी क्रीचर व्हेदर विजिबल और इनविजिबल (भगवान सभी जीवों में रहते हैं, फिर भले ही वे आँख से दिखनेवाले ऐसे हों या न दिखनेवाले जीव हों।) आपके और मेरे बीच में दूरबीन (सूक्ष्मदर्शी) से भी दिखाई नहीं दें, ऐसे अनंत जीव हैं।
  2. यदि भगवान ऊपरी हों और यदि वे ही मोक्ष में ले जानेवाले होते, तो जब वे कहें कि उठ यहाँ से, तो आपको तुरंत उठना पडे़गा। वह मोक्ष कैसे कहलाएगा? मोक्ष अर्थात संपूर्ण स्वतंत्रता। कोई ऊपरी नहीं और कोई अन्डरहैन्ड भी नहीं।
  3. यह देह तो पैकिंग (खोखा) है। भीतर बैठे हैं, वे भगवान हैं।
  4. पुरुष तो कौन कहलाये? क्रोध-मान-माया-लोभ आदि निर्बलताएँ जिसमें नहीं होतीं, उन्हें भगवान ने ‘पुरुष’ कहा है।
  5. जिसमें से ‘हुँकार’ (मैं कुछ हूँ) चला गया हो न, उसके बाद वही भगवान! यदि कभी अधिक दर्शन करने योग्य पद हो तो वह सिर्फ यही एक कि जिनका ‘हुँकार’ समाप्त हुआ हो, पोतापणु (मैं हूँ और मेरा है, ऐसा आरोपण, मेरापन) चला गया हो।
  6. यह संसार ‘साइंटिफिक सरकमस्टेन्शियल एविडन्स’ से चल रहा है। जिसे हम ‘व्यवस्थित शक्ति’ कहते हैं, जो सभी को व्यवस्थित ही रखती है!
  7. कर्ता बने, तो भोक्ता बनना पड़ेगा न! भगवान तो ज्ञाता-दृष्टा और परमानंदी हैं। खुद के अपार सुख में ही मगन रहते हैं।
  8. तू ही तेरा ऊपरी,  तेरा रक्षक भी तू ही है और तेरा भक्षक भी तू ही है। यू आर होल एन्ड सोल रिस्पोन्सिबल फोर योरसेल्फ। खुद ही खुद का ऊपरी है। इसमें और कोई बाप भी द़खल नहीं करता है। हमारा बॉस है वह भी अपनी भूल के कारण और अन्डरहैन्ड है वह भी अपनी भूल के कारण ही है।
  9. आपका ऊपरी दुनिया में कोई नहीं। आपके ऊपरी आपके ब्लंडर्स और आपकी मिस्टेक्स हैं। ये दो नहीं हों तो आप परमात्मा ही हैं।
  10. भगवान तो आपका स्वरूप है। आपका कोई ऊपरी है ही नहीं। कोई बाप भी ऊपरी नहीं है।
  11. ऐसा है, जीव मात्र के अंदर भगवान बैठे हुए हैं, चेतनरूप में है
  12. भगवान के यहाँ तो इतना ही है कि, ‘किसी जीव को दुःख नहीं हो, वही हमारी आज्ञा है !’
  13. माता-पिता की सेवा, प्रत्यक्ष है। भगवान कहाँ दिखते हैं ? भगवान दिखाई नहीं देते,  माता-पिता तो दिखाई देते हैं|
  14. यह नास्तिक है वह भगवान में नहीं मानता, धर्म में नहीं मानता परन्तु अंत में नीति में मानता है और नीति तो सबसे बड़ा धर्म है। नैतिकता के बिना धर्म ही नहीं है।
  15. बढे-घटे, वह आसक्ति कहलाती है। जो बढे-घटे नही वह परमात्मप्रेम है। सभी प्रेम के वश रहा करते हैं। 
  16. जो बढे़-घटे नही वह परमात्मप्रेम है।
  17. ‘भुगते उसी की भूल’, यह भगवान की भाषा। और यहाँ तो जिसने चोरी की, उसे लोग गुनहगार मानते हैं।

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