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भगवान, मुझे आपकी जरूरत है आप कहाँ हो? भगवान कृपया मेरी मदद कीजिये!

बचपन से ही हमें सिखाया जाता है कि भगवान दयालु है, वह क्षमाशील है और वह हमसे बेहद प्यार करते है; भगवान सर्वशक्तिमान है, वह हमेशा हमारी रक्षा करते है और वह हमारे तारणहार है।

इसे ध्यान में रखते हुए, हमारे मन में भगवान की एक छवि बनने लगती है। उस छवि में हम भगवान को किसी ऐसे व्यक्ति के रूप में देखते हैं जो शक्तिशाली, विश्वसनीय है और हमे मदद की ज़रूरत हो तो हमेशा वे हमारे साथ रहेंगे। और भगवान की इस छवि की अपेक्षा से, हम पूरे विश्वास और श्रद्धा के साथ उनकी प्रार्थना करते हैं!

लेकिन हम सभी जानते हैं कि उतार-चढ़ाव हर किसी के जीवन का एक हिस्सा है। हम तरककी पसंद करते हैं और उतार नहीं! जब जीवन में सब कुछ अच्छा चल रहा होता है तब हम आत्मविश्वास और उत्साह के साथ सब कुछ करते हैं । लेकिन जब निराशाजनक संजोग आते हैं, तब हम इस उम्मीद के साथ भगवान के पास अपेक्षा रखते हैं कि वह आयेंगे और हमें मुश्किल स्थिति से बाहर निकालेंगे |

यदि परिस्थितियाँ बदल जाती हैं, तो हम भगवान के प्रति आभार मानते हैं और उनके प्रति हमारा विश्वास और श्रद्धा कई गुना बढ़ जाती है। लेकिन क्या होगा जब चीजें बेहतर नहीं होंगी? इससे भी बुरा हाल तब होता हो, जब वे चारों ओर से मुश्केल भरे संजोग आते है - जीवन भर के संबंध टूट जाते है, स्वास्थ्य बिगड़ जाता है, नौकरी में हमारे काम की प्रशंसा में कमी आती है। हम सख्त रोते रहते हैं, 'भगवान, कृपया मेरी मदद करें', लेकिन कोई मदद नहीं मिलती है...

जीवन में ऐसे संजोग हमें परेशान करते हैं और हमें यह सवाल पूछने के लिए मजबूर करते हैं कि, ‘जब मुझे आपकी ज़रूरत है तब भगवान आप कहाँ हो?'

वह दयालु और प्रेममय है, फिर वह मेरी मदद क्यों नहीं कर रहे है? वह सर्वशक्तिमान है, फिर वह मुझे क्यों नहीं बचा रहे है?

कुछ ऐसे भी हैं जो भगवान को दोषित देखते हैं, और एसा मानते हैं कि भगवान ही उन्हें पीड़ा और दुःख दे रहे है; जबकि काफ़ी कम लोग एसी परिस्थिति में शांत रहना पसंद करते हैं और परमेश्वर उनकी परीक्षा ले रहे है एसी समझ रखते है।

एसी असंख्य मान्यताऐ हैं, जिसमें व्यक्ति उलझ जाता है, और मनचाहा परिणाम प्राप्त करने के प्रयास में एक से दूसरे में कूद जाता है; लेकिन जब उन्हें असफलता पर असफलता मिलती है, तब जा के उनको यह जानने की जिज्ञासा उत्पन्न होती है कि वास्तव में सही क्या है; वह खुद जो अनुभव कर रहे है उनके पीछे वास्तविक तथ्य क्या हैं।

तो चलिए, हम कोशिश करते है अपने प्रश्न का सही उत्तर प्राप्त करने कि - ‘जब मुझे आपकी ज़रूरत है तब भगवान आप कहाँ हो?'

भगवान आप कहाँ हो, जब मुझे तुम्हारी आवश्यकता है?'

1) इस पहेली को हल करने के लिए पहला कदम यह जानना है कि ‘भगवान वास्तव में कौन है?'

वास्तव में, क्या आप जानते हैं कि भगवान हमारा वास्तविक स्वरुप है?

हाँ! हमारा स्वरूप ये शरीर नहीं है, लेकिन हमारे शरीर में रहनेवाले शुद्धात्मा है, और वास्तव में वही भगवान है!

तो, भगवान आसमान में बिराजमान कोई चमत्कारिक व्यक्तित्व नहीं है। वास्तव मे, भगवान एक शाश्वत आत्मा है जो प्रत्येक जीवमात्र में बिराजमान है। भगवान प्रत्येक व्यक्ति में मौजूद है, जो जीवित है, भले ही हमें उनकी आवश्यकता हो या न हो, चाहे हम उन्हें देख सके या न देख सके, चाहे हम उन्हें खोजे या न खोजे।

2) हमारे दुःख के लिए किसे दोषी ठहराया जाए? भगवान या कोई और?

जब दुःख आता है, तो हम अपनी गलतिया देखना भूल जाते हैं, और हम तुरंत ही दूसरों पर दोष डाल देते हैं; हम उस मामले के लिए भगवान पर आरोप लगाने से भी नहीं हिचकते।

आपने लोगों को शिकायत करते सुना होगा, मैंने क्या गलत किया है? भगवान मुझे इतना दुःख और कष्ट क्यों दे रहे हैं? ’ऐसा इसलिए है क्योंकि उनका ये विश्वास हैं कि, ‘भगवान इस दुनिया के निर्माता हैं और वह दुनिया को चलानेवाले हैं। इस दुनिया में कुछ भी उनकी इच्छा के विरूद्ध नहीं होता है, और इसलिए प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से एक वही मेरे सभी दुखों का कारण है। '

तार्किक रूप से सोचें, अगर भगवान यह सभी देनेवाले है, तो वह हमें दुःख क्यों दे रहे है और सुख क्यों नहीं? हम एसे अभिव्यक्ति को भगवान कैसे कह सकते हैं, जिन्हें लोगों को दुखी देखकर आनंद मिलता है?

सही समझ यह है कि भगवान ने इस दुनिया में किसी चीज़ के कर्ता नहीं है। वह न तो निर्माता है और न ही वह दुनिया को चलाते है। वास्तव में, इस दुनिया में हम जो कुछ भी देख और महसूस कर सकते हैं, उन सब में से किसी में भी भगवान का कर्तापन किंचितमात्र भी नहीं है। इन सभी में भगवान बिल्कुल भी दखल नहीं देते हैं।

वास्तविकता में कर्ता कौन है यह बात कि अज्ञानता से, हम भगवान पर आरोप लगाते है। और ऐसा करते हुए, हम केवल अपने सिर पर अधिक जिम्मेदारियाँ ले लेते हैं, क्योंकि हमें इस गलती के लिए भी भारी दुःख से गुज़रना पड़ेगा। जब भगवान कर्ता है ही नहीं, तो हम उन्हें कैसे दोषित देख सकते हैं?

3) यदि भगवान कर्ता नहीं है, तो कौन है? मेरे जीवन में दुःख कौन भेजता है?

इस दुनिया में जो कुछ भी होता है, वह कुदरत के नियमनुसार ही होता हो – कॉज़ेज (कारण) और इफेक्ट (परिणाम) का नियम!

हमने कॉज़ेज (कारण) बनाए है और उसके इफेक्ट (परिणाम) भी हमे ही आयेंगे। हम सभी को अपने खुद के कर्म ही भुगतने पड़ते है। आज जो कुछ भी दुःख भुगत रहे है वह हमारे अपने पिछले कर्मों का फल (परिणाम) है।

कर्म का नियम ऐसा है कि हम किसी भी जीव को जो किंचितमात्र भी दुःख देते हैं तो वह हमें स्वयं दुःख भुगतना पड़ता है। और अगर हम किसी भी जीवित व्यक्ति की थोड़ी सी सहायता करे तो उसके परिणाम स्वरुप हमे भी योग्य समय पर सहायता प्राप्त होती हैं।

इसलिए, अगर हम खुश रहना चाहते हैं, तो हमें अपने विचारों, शब्दों या कार्यों के माध्यम से किसी भी जीवित व्यक्ति को कभी चोट नहीं पहुंचानी चाहिए। अगर हम इसे सिर्फ इतना समझ लें, तो हमें अपनी सभी सांसारिक समस्याओं का समाधान मिल जाएगा!

4) अगर भगवान कर्ता नहीं है, तो हमारे शरीर में भगवान की भूमिका क्या है?

जब अंधेरा होता है तो हम अपने आस-पास मौजूद किसी भी चीज को देख या जान सकते हैं?

नहीं!

और एक बल्ब से प्रकाश की उपस्थिति में?

हम अपना हर काम कर सकते हैं। तो, क्या हम कह सकते हैं कि 'प्रकाश की हाज़िरी से हुआ'?

नहीं, प्रकाश कोई कार्य का ‘कर्ता’ नहीं है, लेकिन इसके बिना, हम अंधेरे में कुछ भी नहीं कर सकते हैं। जिस तरह बल्ब कमरे में रोशनी प्रदान करता है, उसी तरह आत्मा यानी भगवान प्रत्येक जीवमात्र को प्रकाश प्रदान करते है। भगवान की भूमिका प्रत्येक जीवमात्र को प्रकाश (ज्ञान) प्रदान करने की है।

हम भगवान के प्रकाश का उपयोग कैसे करते हैं,यह हमे तय करना है। जैसे बल्ब की रोशनी की उपस्थिति में, यह हमारे ऊपर है कि हम प्रकाश का उपयोग धार्मिक पुस्तकों को पढ़ने के लिए करते हैं या कार्ड और जुआ खेलने के लिए। इसके अलावा, प्रकाश न तो हमें अच्छा काम करने के लिए पुरस्कार देता है और न ही उनकी उपस्थिती मे, वह हमें बुरे काम करने के लिए दंडित करता है, क्या ऐसा नहीं है? इसी तरह, भगवान को हमें दंड देने के लिए नहीं आना पड़ता है, यह हमारे अपने कर्म हैं जिनके आधार पर कुदरत हमें पुरस्कार या दंड देती है।

इस प्रकार से, यह निष्कर्ष निकलता है कि:

भगवान हर जीव में रहते है। लेकिन वह हमें कभी भी सुख या दुःख नहीं देते | हम अपने ही कर्मो के वजह से जीवन में सुख और दुःख का अनुभव करते हैं। अन्यथा भगवान केवल अपने परमानन्द स्वाभाव में ज्ञाता द्रष्टा पद में रहते है।

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