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क्या भगवान के कोई गुण हैं?

आत्मा, सगुण-निर्गुण

कितने ही लोग भगवान को निर्गुण कहते हैं। अरे! भगवान को क्यों गाली दे रहा है? पागल को भी निर्गुणी कहते हैं। पागल निर्गुणी कैसे है? पागलपन तो एक गुण हुआ, फिर वह निर्गुण कैसे हैं? इसका अर्थ, आत्मा को निर्गुण कहकर, पागल से भी खराब दिखाते हैं, जड़ समान दिखाते हैं? अरे, जड़ भी नहीं और निर्गुण भी नहीं है। उसके भी गुण हैं। आत्मा को, भगवान को निर्गुण कहकर तो लोग उल्टी राह चल पड़े हैं। यहाँ मेरे पास आ, तो तुझे सही समझ दूँ। ‘आत्मा प्रकृति के गुणों की तुलना में निर्गुण है, लेकिन स्वगुणों से भरपूर है।’ आत्मा के अपने तो अनंत गुण हैं। अनंत ज्ञानवाला, अनंत दर्शनवाला, अनंत शक्तिवाला, अनंत सुख का धाम, परमानंदी है। उसे निर्गुण कैसे कह सकते हैं? उसे यदि निर्गुण कहेगा, तो कभी भी आत्मा प्राप्त नहीं हो सकेगा। क्योंकि, आत्मा उनगुणों से कुछ अलग नहीं है। वस्तु में वस्तु के गुणधर्म रहे हैं, इसलिए यदि उसके गुणधर्मों को पहचानेंगे, तभी वस्तु को पहचान पाएँगे। जैसे कि सभी धातुओं में से सोने को पहचानना हो, तो उसके गुणधर्म जान लिए हों, तो उसे पहचान सकते हैं। सोना अपने गुणधर्मों से अलग नहीं है। फूल और सुगंध दोनों कभी भिन्न नहीं हो सकते। वह तो सुगंध पर से फूल की पहचान होती है। वैसे ही, आत्मा को आत्मा के गुणधर्म से ही पहचाना जाता है। वही धर्म जानना है। आत्मधर्म जानना है। प्रकृति के धर्मों को तो अनंत जन्मों से जानते आए हैं, लेकिन फिर भी हल नहीं निकला, पार नहीं पाया। ये रिलेटिव धर्म, जो लौकिक धर्म हैं, वे सारे ही प्रकृति के धर्म हैं, देह के धर्म हैं। अलौकिक धर्म ही आत्मधर्म है, रियलधर्म है।

इस देह को नहलाएँ, धुलाएँ, खिलाएँ, उपवास करवाएँ वे सभी प्राकृतधर्म हैं। प्राकृत धर्म का पता-ठिकाना नहीं होता। क्योंकि वह खुद की सत्ता से बाहर का धर्म है। यह तो बिना जुलाब की दवाई लिए जुलाब हो जाता है और जुलाब रोकने की दवाई लिए बगैर बंद हो जाता है, ऐसा है प्रकृति का काम!

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