कर्म क्या है ? : कर्म का विज्ञान

कर्म क्या है ?  क्या अच्छें कर्म करने से गलत कर्मों का असर खत्म हो जाता है ? भले लोगों को दुःख क्यों उठाने पड़ते हैं ? कर्म बंधन कब और कैसे रूकता है ?

जब तक आप कर्म बांधते हैं, तब तक आपके लिए हमेशा पुनर्जन्म है ही। अगर आप को कर्म बंधन होगा तो अगले जन्म में आपको उसके परिणाम भुगतने ही पड़ेगें। क्या इस सच्चाई से कि भगवान महावीर को अगला जन्म नहीं लेना पड़ा, यह सिद्ध नहीं होता कि रोज़मर्रा का जीवन जीते हुए भी कर्म बंधन न हो?

ऐसा विज्ञान है कि रोज़मर्रा का जीवन जीते हुए भी आप को कर्म बंधन न हो। आत्मविज्ञानी परम पूज्य दादाश्री ने दुनिया को यह"कर्म का विज्ञान"दिया है।

जब आप इस विज्ञान को पूरी तरह से समझ जाएँगें तो आप की भी मुक्ति हो जाएगी।

 


कर्म कैसे बंधते है?

कर्म का मूल कारण कर्ता भाव है| "मैं कौन हूँ", इसकी गलत समझ ही कर्म बंधन का मुख्य कारण है| कर्ता-भाव से कर्म बंधन होते हैं|

Spiritual Quotes

  1. मात्र भाव से ही कर्म बँधते हैं, क्रिया से नहीं। क्रिया में वैसा हो या नहीं भी हो, परन्तु भाव में जैसा हो वैसा कर्म बँधता है। इसलिए भाव को बिगाड़ना मत।
  2. स्थूलकर्म यानी तुझे एकदम गुस्सा आया, तब गुस्सा नहीं लाना फिर भी वह आ जाता है। ऐसा होता है या नहीं होता? गुस्सा होना वह स्थूल कर्म है, और गुस्सा आया उसके भीतर आज का तेरा भाव क्या है कि गुस्सा करना ही चाहिए। वह आनेवाले जन्म का फिर से गुस्से का हिसाब है, और तेरा आज का भाव है कि गुस्सा नहीं करना चाहिए। तेरे मन में निश्चित किया हो कि गुस्सा नहीं ही करना है, फिर भी गुस्सा हो जाता है, तो तुझे अगले जन्म के लिए बंधन नहीं रहा।
  3. इफेक्ट तो अपने आप ही आता है। यह पानी नीचे जाता है, वह ऐसे नहीं कहता कि, 'मैं जा रहा हूँ', वह समुद्र की तरफ चार सौ मील ऐसे-वैसे चलकर जाता ही है न! और मनुष्य तो किसीका केस (मुकदमा) जितवा दे तो 'मैंने कैसे जितवा दिया' कहता है। अब उसका उसने अहंकार किया, उससे कर्म बँधा, कॉज़ हुआ। उसका फल वापिस इफेक्ट में आएगा।
  4. भगवान ने सबसे बड़ा कर्म कौन-सा कहा? रात को 'मैं चंदूभाई हूँ' कहकर सो गए और फिर आत्मा को बोरे में डाल दिया, वह सबसे बड़ा कर्म!
  5. 'मैं चंदूभाई हूँ' ऐसा मानता है, वही अहंकार है। वास्तव में खुद चंदूभाई है? या चंदूभाई नाम है? नाम को 'मैं' मानता है, शरीर को 'मैं' मानता है, मैं पति हूँ? ये सभी रोंग बिलीफ़ है। वास्तव में तो खुद आत्मा ही है, शुद्धात्मा ही है, परंतु उसका भान नहीं, ज्ञान नहीं, इसलिए मैं चंदूभाई, मैं ही देह हूँ ऐसा मानता है। यही अज्ञानता है! और इससे ही कर्म बंधते हैं।
  6. गालियाँ दे तो उस पर द्वेष नहीं, फूल चढ़ाए या उठाकर घूमे तो उस पर राग नहीं, तो कर्म नहीं बँधेंगे उसे। 
  7. हमेशा किसी भी कार्य का पछतावा करो, तो उस कार्य का फल रुपये में बारह आने तक नाश हो ही जाता है। (उस कार्य का फल पचहत्तर (७५) प्रतिशत खत्म हो जाता है।) फिर जली हुई डोरी होती है न, उसके जैसा फल आता है। वह जली हुई डोरी आनेवाले जन्म में बस ऐसे ही करें, तो उड़ जाएगी। कोई क्रिया यों ही बेकार तो जाती ही नहीं। प्रतिक्रमण करने से वह डोरी जल जाती है, पर डिज़ाइन वैसी की वैसी रहती है। अब आनेवाले जन्म में क्या करना पड़ेगा? इतना ही किया, झाड़ दिया कि उड़ गई।
  8. इन कर्मों के ज्ञाता-दृष्टा रहो तो नया कर्म नहीं बँधेगा और तन्मयाकार रहो तो नये कर्म बँधते हैं। आत्मज्ञानी होने के बाद ही कर्म नहीं बँधते।
  9. वीतराग इतना ही कहना चाहते हैं कि कर्म बाधक नहीं हैं, तेरी अज्ञानता बाधक है! अज्ञानता किसकी? 'मैं कौन हूँ' उसकी।  देह है तब तक कर्म तो होते ही रहेंगे, पर अज्ञान जाए तो कर्म बँधने बंद हो जाएँ!
  10. यह तो आत्मा और जड़ तत्व का संयोग हुआ, और उसमें आरोपित भावों का आरोपण होता ही रहा। उसका यह फल आकर खड़ा हुआ।

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