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प्रतिक्रमण कब करना चाहिए?

जहाँ-जहाँ अतिक्रमण होता है, वहाँ-वहाँ प्रतिक्रमण करने की आवश्यकता है। सामान्य व्यवहार यानी क्रमण। लेकिन जिस व्यवहार से किसी को ज़रा सा भी दुःख हो जाए, उसे अतिक्रमण कहते हैं। जहाँ किसी को दुःख नहीं हुआ, ऐसे व्यवहार के लिए प्रतिक्रमण की आवश्यकता नहीं है। जैसा हमारे मन में हो, वैसा ही वाणी में बोलना चाहिए और वैसा ही वर्तन भी करना चाहिए। यदि हम वाणी से तो अच्छा-अच्छा बोलते हैं, लेकिन मन खराब हो, तो उसके लिए भी प्रतिक्रमण करना चाहिए।

प्रतिक्रमण में, हम जिस भगवान को मानते हैं, उन्हें याद करके उनकी साक्षी में क्षमा माँगनी चाहिए, कि यह गलत हुआ, अब दोबारा ऐसा नहीं करूँगा, और इसके लिए मुझे शक्ति दीजिए।“ फिर भी यदि दोबारा वही दोष याद आए या चुभे, तो उतनी बार उसका प्रतिक्रमण करना चाहिए, ताकि वह दोष खत्म हो जाए।

दोष अनेक प्रकार से हो जाते हैं। यदि नीचे दिए गए किसी भी प्रकार से दोष हो गए हों, तो बाद में पश्चाताप करने से हमारे दोष धुल जाते हैं।

जब अतिक्रमण हो जाए तब

दिनभर में कदम-कदम पर इस प्रकार के अतिक्रमण होते रहते हैं। परम पूज्य दादाश्री इसके प्रति सावधान करते हुए कहते हैं, कि “जब तक अतिक्रमण होगा, तब तक फिर ऐसा मनुष्य जन्म नहीं मिलेगा। सतर्क होकर चलना।“ यह जगत बहुत ही नियमबद्ध है। इसमें किसी की जान-पहचान या रिश्वत काम नहीं आती। किसी भी जीव को, चाहे वह मनुष्य हो, जानवर हो या पेड़-पौधे हों, यदि उनको किंचित्‌मात्र भी दुःख होता है, तो उससे पापकर्म बँधता है। और पाप दूर करने के लिए प्रायश्चित के अलावा दूसरा कोई उपाय नहीं है।

लेकिन, कई बार हम समझ ही नहीं पाते कि किन-किन तरीकों से अतिक्रमण होता है। हम घर में खाना बनाने वाले से कहें कि, “खाना दो।” तो इसमें अतिक्रमण नहीं होता। लेकिन खाने के लिए बैठें और थोड़ा खाने के बाद, उसमें गलती निकालें कि "यह कढ़ी आपने खारी कर दी है।" तो यह अतिक्रमण किया कहा जाएगा। यदि कुछ बोले बगैर चुपचाप हमने खारी कढ़ी खा ली या कोई प्रतिक्रिया दिए बगैर उसे एक तरफ़ रख दिया, तो उससे अतिक्रमण नहीं होता है। इसी तरह, अगर कोई देर से आए और उसे गुस्से में कहें, कि "आप हमेशा देर से ही आते हो।" तो यह अतिक्रमण कहलाएगा। संक्षेप में, लोगों को पसंद न आए ऐसा कुछ भी बोलना, उसे अतिक्रमण किया कहा जाएगा।

इसके अलावा, किसी की मज़ाक उड़ाना वह भी अतिक्रमण कहलाता है। सामने वाला व्यक्ति यदि ज़रा कमज़ोर हो, तो व्यवहार में चला लेता है, लेकिन भीतर उसे दु:ख होता है, तो उसका हमें प्रतिक्रमण करना पड़ेगा। हम दूसरों के साथ मज़ाक करें, लेकिन यदि वह निर्दोष मज़ाक होगा तभी सामने वाले को दु:ख नहीं होगा।

इसके अलावा, किसी व्यक्ति के प्रति यदि विकारी भाव हों, तो वह उसे दु:ख पहुँचाने के बराबर है। उसमें खासकर यदि पति-पत्नी के अलावा अणहक्क (बिना हक़ के) संबंधों में विकारी भाव हों, विचार आएँ या दृष्टि बिगड़े तो वहाँ प्रतिक्रमण करना चाहिए।

किसी भी वस्तु का आग्रह रखना वह सबसे बड़ा पॉइज़न है। आगे बढ़कर अपने मत का स्ट्रोंग आग्रह हो जाए, उसे मताग्रह कहते हैं। यह बड़ा अतिक्रमण कहलाता है। हमें अपना मत देकर छोड़ देना चाहिए। लेकिन यदि हम उस बात को पकड़कर रखेंगे तो वह सामने वाले के लिए दुःखदायी हो जाता है, उसका प्रतिक्रमण करना चाहिए। व्यवहार में यदि हमारी अपेक्षा के अनुसार कुछ न हो पाए और हम रूठकर अड़ जाए, तो उसका भी प्रतिक्रमण करना पड़ता है। कई बार कोई काम सहज रूप से चल रहा होता है, लेकिन उसमें प्रकृतिवश इमोशनल होकर हमसे दखल हो जाए, तो हमें वहाँ प्रतिक्रमण करना चाहिए और यह भावना करनी चाहिए कि फिर से ऐसा न हो।

जो बातें लोगों को दुःख देती हैं, केवल उन्हीं बातों के लिए ही पश्चाताप करना है, दूसरों को पसंद आए ऐसे व्यवहार के लिए नहीं करना है। जैसे यदि कपड़े पर दाग़ पड़ जाए तो हम उस दाग़ को रहने नहीं देते, बल्कि उसे साबुन लगाकर, पानी डालकर कपड़े को साफ़ कर देते हैं। ठीक उसी तरह, यदि किसी को दुःख हो जाए ऐसा दोष हुआ हो, तो उसे प्रतिक्रमण करके साफ़ कर देना चाहिए।

शब्दों से आक्रमण हो तब

परम पूज्य दादा भगवान कहते हैं प्रतिक्रमण इन दो शब्दों का करना होता है, एक, ‘अतिक्रमण’ और दूसरा, ‘आक्रमण’। आक्रमण, चीज़ हम में नहीं होनी चाहिए। आक्रमण यानी अटैकिंग नेचर (हमलावर स्वभाव)। आक्रमण यानी बात-बात में, शब्दों में भी अटैक (हमला) करता है।

अतिक्रमण और आक्रमण में क्या अंतर है? अगर कोई ऐसी बात कह दी जाए जिससे सामने वाले को दुःख हो जाए, फिर भले वह मज़ाक में ही क्यों न हो, तो उसे अतिक्रमण कहते हैं। जबकि, आक्रमण का मतलब है शब्दों से सीधे सामने वाले के अहंकार पर चोट करना। किसी के अहंकार पर आक्षेप लगाना, चरित्र पर लांछन लगाना, सामने वाले का मन टूट जाए ऐसे शब्द कहना, ये सब आक्रमण माना जाता है। वहाँ अवश्य प्रतिक्रमण और पश्चात्ताप करना चाहिए।

कई बार हमने अतिक्रमण किया होता है और सामने वाले को दुःख भी हो जाता है और कोई हमसे आकर कहता है, कि "आपने ऐसा गलत काम किया?" तो उस अतिक्रमण का रक्षण करने के लिए हम दूसरा बड़ा अतिक्रमण कर बैठते हैं। सामने वाले को तोड़ देते हैं, कि "आप बीच में मत बोलिए, ऐसा करेंगे तभी वह सुधरेगा!" तो यह आक्रमण कहलाता है। अगर कोई हमारी ज़रा सी भी भूल बताता है और हम सामने से "आप अपना संभालिए, मुझे कहने की ज़रूरत नहीं है", ऐसा गुस्से में कह देते हैं, तो यह भी आक्रमण कहलाता है। इससे गाँठें बढ़ती हैं और फिर उन गाँठों से मुक्त होने के लिए दो पैरों में से चार पैरों में जाना पड़ता है।

स्थूल हिंसा हो जाए तब

अतिक्रमण और आक्रमण ये कषायों (क्रोध, मान, मोह, लोभ) के द्वारा होने वाली हिंसा कहलाते हैं। जबकि, किसी जीव को मार डालना वह स्थूल हिंसा कहलाती है। यदि अनजाने में भी स्थूल हिंसा हो जाए, तो तुरंत पछतावा करना चाहिए कि यह मुझसे गलत हो गया, मैं उस जीव हिंसा के लिए माफ़ी माँगता हूँ और ऐसा दोबारा नहीं होगा ऐसा दृढ़ निश्चय करना चाहिए।

हमारी पूरी-पूरी इच्छा हो कि हमें हिंसा करनी ही नहीं है, लेकिन फिर भी हमारे पाँव के नीचे कोई जीव दबकर मर जाए, तो हमें प्रतिक्रमण करना चाहिए, नहीं तो वह जीव हमसे वैर बाँधेगा। यदि रात में मच्छर काटते हों और हम नींद से उठकर उसे मारने लगें, तो यह भी स्थूल हिंसा हुई कहलाएगी।

यदि हमनें खटमल या इसी तरह के किसी दूसरे जीव-जंतु को सुई चुभो-चुभोकर मारा हो, तो कल्पना में एक कटोरी में खटमल को रखकर, उसके शरीर को देखकर प्रतिक्रमण करना चाहिए। परम पूज्य दादाश्री कहते हैं, कि अगर कोई भी जीव-जंतु घर में पसंद न आए, तो उसे बाहर रखकर आ जाएँ, लेकिन उसे मारने का विचार तक नहीं करना चाहिए।

हमें लगता है कि अगर कोई जीव-जंतु भूल से कुचल जाए तो उसमें वह क्या वैर बाँधेगा? लेकिन जैसे मनुष्यों की दुनिया में पति-पत्नी और बच्चों के ऋणानुबंधी संबंध होते हैं, वैसे ही अन्य जीवों का भी अपना संसार होता है ना? अगर कोई हमारे सगे-संबंधी को मार दे, तो हमें कितना दुःख होगा! तो किसी पशु-पक्षी या जीव-जंतु का संसार उजड़ जाए, तो उन्हें भी दुःख तो होता ही है। जैसे भूल से आग में हाथ डालें तो भी हम जल जाते हैं, वैसे ही अज्ञानतावश हुई हिंसा का फल भी हमें भोगना पड़ता है। परम पूज्य दादा भगवान यहाँ स्थूल हिंसा से मुक्त होने के लिए एक सुंदर उपाय बताते हैं।

दादाश्री: अनजाने में हिंसा हो जाए, लेकिन पता चलने पर आपको तुरंत ही पश्चाताप होना चाहिए कि ऐसा नहीं हो। फिर से ऐसा नहीं हो, उसके लिए जागृति रखना, ऐसा अपना उदेश्य रखना। भगवान ने कहा था, किसी को मारना नहीं है, ऐसा दृढ़ भाव रखना। किसी जीव को ज़रा सा भी दु:ख नहीं देना है, ऐसी हर रोज़ पाँच बार भावना करना। ‘मन, वचन, काया से किसी जीव को किंचित्‌मात्र दु:ख न हो’ सुबह में ऐसा पाँच बार बोलकर संसारी प्रक्रिया शुरू करना, तो ज़िम्मेदारी कम हो जाएगी। क्योंकि, भाव करने का अधिकार है। क्रिया अपनी सत्ता में नहीं है।

दूसरों के दोष दिखाई दें तब

आमतौर पर हमें अपने दो-तीन बड़े-बड़े दोष ही दिखाई देते हैं, लेकिन सामने वाले के देखने हों तो हम सौ-सौ दोष ढ़ूँढ निकालते हैं। जब सामने वाला व्यक्ति दोषित दिखे तब उसका प्रतिक्रमण करना चाहिए।

परम पूज्य दादा भगवान कहते हैं, "इस जगत् में जीवमात्र का दोष है ही नहीं, वह ज्ञानी की दृष्टि है। दोषित दिखाई देता है, वह अपना दृष्टिदोष है, अपने राग-द्वेष हैं।"

जब कोई व्यक्ति हमें कुछ भी कह जाए या हमारा नुकसान कर दे, तब हमें उसका विरोध करने के विचार आएँ, तो हमें उनका भी प्रतिक्रमण करना चाहिए। यदि किसी भी व्यक्ति के लिए ऐसा अभिप्राय बँध जाता है कि “यह तो बुरा ही है, हमेशा ऐसा ही करता है”, तो उसका भी प्रतिक्रमण करना चाहिए। जब ​​अभिप्राय गाढ़ हो जाता है, तब पूर्वग्रह बन जाता है। फिर उस व्यक्ति को देखते ही पूर्वग्रह उत्पन्न होता है कि “यह वैसा ही करेगा।” तो उसका भी प्रतिक्रमण करना चाहिए।

कोई हमारे साथ जैसा व्यवहार करता है, वह हमारे ही कर्म के उदय के अनुसार वर्तन करता है। वह व्यक्ति तो सिर्फ़ निमित्त बनता है। इसलिए हमें उसके प्रति मन में भाव नहीं बिगाड़ने चाहिए। उल्टा ज्ञानियों की दृष्टि तो ऐसी होती है कि सामनेवाले का भला हो, वे ऐसा भाव करते हैं, क्योंकि वह व्यक्ति हमें हमारे कर्मों से मुक्त करता है। ज्ञानी पुरुष परम पूज्य दादाश्री कहते हैं, “चार गालियाँ खाकर भी छूट तो गए न, यानी हल्के हो गए न! अब छूटते समय बीज उल्टे नहीं डले, बस इतना ही देखना है।“

खराब बीज डालना यानी क्या? अगर सामनेवाला हमें एक कड़वा वचन बोले और हम जवाब में उसे चार कड़वे वचन सुना दें, वह। हमसे एक कड़वा तो सहन नहीं होता, बदले में चार कड़वा और दे देते हैं। जब बाद में वह हिसाब चुकता होगा, तब क्या हमसे सहन हो पाएगा? वास्तव में, इसी तरह हम कर्मों के गुनाह में फँसते जाते हैं और बंधन में आते ही जन्म-मरण की भटकन चालू ही रहती है। इसलिए, इस संसार में किसी के लिए भी भाव बिगाड़ने जैसा नहीं है। लेकिन फिर भी अगर भाव बिगड़ जाएँ, तो तुरंत सुधार लेना चाहिए। उसके लिए प्रतिक्रमण करना चाहिए।

वास्तविकता में, बाहर जो क्रिया होती है, उसके बजाय, क्रिया करते समय अंदर कौन से भाव होते हैं, उसके आधार पर कर्म बँधता है। क्रिया अनिवार्य होती है, लेकिन भीतर का भाव वैकल्पिक होता है। यदि हमारे भाव बिगड़ें तो हमें प्रतिक्रमण करना चाहिए। यदि बाहर क्रोध हो गया तो अनिवार्य भाग बिगड़ता है, लेकिन यदि हम अंदर पछतावा करें और माफी माँग लें, तो वैकल्पिक भाग को सुधार सकते हैं।

यदि किसी भी धर्म, धर्मगुरु या धर्म के उपासकों के दोष हमें दिख जाएँ, तो उनका भी प्रतिक्रमण अवश्य करना चाहिए। आजकल टीवी, अखबारों या इंटरनेट पर वीडियो के माध्यम से प्रेरित होकर हम विभिन्न धर्मों के विषय में नेगेटिव चर्चाएँ करते हैं। इसे धर्म की विराधना माना जाता है और इसका बहुत भयंकर गुनाह बँधता है। उसमें वीतराग भगवान की विराधना का फल कई गुना होकर हमारे पास लौटता है।

खुद के दोषों से बाहर नहीं निकल पाएँ तब

हम झूठ बोलते हैं, तो भी पापकर्म बँधता है। हमारी इच्छा न होने के बावजूद भी हम बार-बार झूठ बोल दे, तब हमें पश्चात्ताप करना चाहिए कि मुझसे झूठ बोला गया, उसकी माफी माँगता हूँ, ऐसा नहीं होना चाहिए।” झूठ बोलना एकदम से बंद नहीं हो जाएगा, लेकिन झूठ बोलने के अभिप्राय को प्रतिक्रमण करके बदल देना चाहिए। अब आज से मैं झूठ नहीं बोलूँगा, झूठ बोलना वह महापाप है, महा दुःखदायी है और झूठ बोलना वही बंधन है।” अगर हमारा ऐसा अभिप्राय बन जाए, तो झूठ बोलने से बँधने वाले पाप बंद हो जाएँगे।

इसी प्रकार से सिगरेट, तंबाकू या शराब जैसे व्यसनों से बंधे हुए लोगों के लिए, व्यसन से मुक्ति का प्रतिक्रमण ही श्रेष्ठ उपाय है। शुरूआत में खुद शौक से व्यसन से चिपकते हैं, लेकिन फिर व्यसन खुद को ही जकड़ लेता है और जब नहीं छूटता तब हम खुद ही तंग आ जाते हैं। "यह व्यसन गलत है, बहुत नुकसान करता है, मुझे इसे छोड़ना ही है।" ऐसा तय हुआ तब से ही व्यसन से छूटने की तैयारी शुरू हो जाती है। फिर जितनी बार आदत से व्यसन हो जाए, उतनी बार सच्चे दिल से पछतावा करना चाहिए। प्रतिक्रमण करने से खुद का अभिप्राय व्यसन के विरुद्ध हो जाता है और बार-बार पछतावा करने से अंत में व्यसन से मुक्ति मिल जाती है।

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