
अतिक्रमण करने का तरीका किसी को सिखाना नहीं पड़ता। अतिक्रमण तो अपने आप होते रहते हैं। किसी को धक्का मारना हो, किसी का मज़ाक उड़ान हो, तो वह सीखने कहीं जाना नहीं पड़ता, वह तो दूसरों को देख-देखकर हम सीख ही जाते हैं। लेकिन, अतिक्रमण होने के बाद उसका प्रतिक्रमण किस तरह करना चाहिए, यह सीखना पड़ता है।
प्रतिक्रमण पढ़कर, ऊँची आवाज़ में बोलकर या किसी को दिखाकर करना आवश्यक नहीं है। वास्तव में तो मन में ही अपनी भूल को याद करके प्रतिक्रमण करना है। चाहे किसी को शब्द से दुःख हुआ हो या मानसिक रूप से दुःख हुआ हो, दोनों के लिए प्रतिक्रमण करना चाहिए। कुछ दोष थोड़े प्रतिक्रमण करने से ही शुद्ध हो जाते हैं और कुछ दोषों के लिए बहुत प्रतिक्रमण करना पड़ता है, तब जाकर खाता साफ होता है। अर्थात् दोषों की चिकनाई के ऊपर प्रतिक्रमण का आधार रहता है। प्रतिक्रमण समूह में ही करना ज़रूरी नहीं है। हम अकेले करें तो भी चलेगा। सोते-सोते मन में करें तो भी चलेगा। संक्षेप में, जिस तरह से हमारे दोष कम हो, उस तरह से प्रतिक्रमण करना चाहिए।
प्रतिक्रमण किसकी साक्षी में करना चाहिए? हमें जिस भगवान या ज्ञानी पुरुष में श्रद्धा हो, उन्हें याद करके माफ़ी माँगनी चाहिए। या प्रत्येक जीव के भीतर आत्मा विद्यमान है, उनके आत्मा की हाज़िरी में प्रतिक्रमण करना चाहिए। सबसे पहले दोष की आलोचना करनी चाहिए, कि “हे भगवान! मुझसे यह भूल हो गई, यह गलत हुआ।” फिर दोष का पछतावा करना, कि “मेरी भूल करने की इच्छा नहीं है, फिर भी हो जाती है, इसलिए मुझे क्षमा करें।” उसके बाद प्रत्याख्यान लेना है, यानी “फिर से ऐसा दोष न हो, इसके लिए प्रतिज्ञा करनी चाहिए।”
मान लीजिए कि, किसी व्यक्ति को ऊँची आवाज़ में बोल दिया और उन्हें हमसे दुःख हुआ हो, तब उस व्यक्ति के भीतर बैठे हुए आत्मा या इष्टदेव को याद करके कहना चाहिए, कि “हे भगवान! मैंने ऊँची आवाज़ में बोला, यह भूल हो गई। इसलिए इसकी माफ़ी माँगता हूँ। और ऐसी भूल अब फिर नहीं करूँगा, यह निश्चय करता हूँ। यह भूल फिर से नहीं करने की शक्ति दीजिए।” आत्मा को याद करके यह कहना, की “यह भूल हो गई” वह आलोचना है, उस भूल को धो डालना वह प्रतिक्रमण है और यह भूल फिर कभी नहीं करूँगा, ऐसा निश्चय करना वह प्रत्याख्यान है।
इसी प्रकार, हसबैंड-वाइफ के अलावा बाहर किसी अन्य व्यक्ति के लिए विषय-विकारी विचार आएँ, तो उनके भीतर बैठे भगवान की साक्षी में माफ़ी माँगनी चाहिए, कि “हे भगवान! इस बहन/भाई के लिए मुझे जो खराब विचार आया, उसकी मैं दादा भगवान के पास आलोचना करता हूँ, मुझे क्षमा करें। और फिर ऐसे विचार कभी भी नहीं करने की मेरी इच्छा है। मुझे किसी भी देहधारी के लिए ऐसे विचार न आएँ, ऐसी मुझे शक्ति दीजिए।” कहीं भी अणहक्क के विषय-विकारी दोष हुए हों तो, “हे भगवान! नासमझी से, ख़राब बुद्धि से, कषायों से प्रेरित होकर मैंने जो ये दोष किए हैं, भयंकर दोष किए हैं, इनकी क्षमा माँगता हूँ।” ऐसे माफ़ी माँगनी चाहिए।
घर में नज़दीक की व्यक्तियों को हमसे किसी न किसी तरह दुःख पहुँचाता ही है। इसलिए, उनके लिए रोज़ प्रतिक्रमण करने चाहिए। नज़दीक से लेकर दूर के रिश्तेदार जैसे कि, भाई-बहन, माता-पिता, मित्र, सगे-संबंधी, काका-काकी, बुआ-फूफा, मामा-मामी, उनके बच्चे, और अगर हम बड़े हैं तो बेटे-बहुएँ, बेटी-दामाद, समधी-समधन, सास-ससुर, साली-साढू, आदि को याद करके प्रत्येक का एक घंटा प्रतिक्रमण किया जाए, तो भीतर के भयंकर पाप भस्मीभूत हो जाते हैं और हमारे अंदर आनंद उमड़ने लगता है। इतना ही नहीं, यदि सच्चे प्रतिक्रमण हों तो उन लोगों के मन भी हमारे प्रति शुद्ध हो जाते हैं।
कुटुंबियों के प्रतिक्रमण हो जाने के बाद, हमारें शहर या गाँव के परिचित लोगों के साथ जो राग-द्वेष हुए हों, उन्हें याद करके उनके प्रतिक्रमण करने चाहिए। घर के अड़ोसी-पड़ोसी, पुराने घर के अड़ोसी-पड़ोसी, स्कूल-कॉलेज और ट्यूशन में मिले लोग, नौकरी-व्यवसाय के सहकर्मचारि और लोग, गाँव के परिचित और नज़दीकी लोग, या किसी ग्रुप में जुड़े हों तो उसके लोग, ऐसे जिन जिन लोगों के साथ जो भी राग-द्वेष हुए थे, वो हमें याद आएँ, उन सब के प्रतिक्रमण करने चाहिए।
अगर रात में नींद न आ रही हो, तो ऐसे प्रतिक्रमण शुरू कर देने चाहिए। जैसे आज रात सारे कुटुंबियों का प्रतिक्रमण करें, फिर समय कम पड़ जाए, तो कल रात फिर से करें। अगर फिर भी समय कम पड़े, तो परसों रात को भी करें। जीवन में जितने भी लोग मिलें हों, उन सभी के साथ राग-द्वेष, विषय-कषाय से जो भी भूलें हुई हों, इस जन्म, पिछले जन्म, गिनत-अनगिनत जन्मों में जो भी दोष हुए हों, उन सभी की माफ़ी माँग लेनी चाहिए।
जिस व्यक्ति को बहुत तरछोड़ मारी हो, जिसका तिरस्कार या भयंकर अपमान किया हो, तो कभी मौका मिलने पर उनसे प्रत्यक्ष मिलकर, उनके पैरों छूकर माफ़ी माँग लेनी चाहिए। लेकिन, अगर सामने वाला उसका दुरुपयोग करे, तो वहाँ प्रत्यक्ष प्रतिक्रमण करने की बजाय, मन में ही प्रतिक्रमण कर लेने चाहिए। मानवता तो उसे कहते हैं कि हम माफ़ी माँगें उससे पहले ही सामने वाला व्यक्ति झुक जाए। ऐसे व्यक्तियों से प्रत्यक्ष में माफ़ी माँग लेनी चाहिए। लेकिन यदि सामने वाले व्यक्ति का स्वभाव उल्टा हो और वह ऊपर से ऐसा कहे, कि “अब आए न सही ठिकाने पर!” तो वहाँ प्रत्यक्ष माफ़ी माँगने की बजाय, अंदर ही अंदर उनके शुद्धात्मा को याद करके माफ़ी माँग लेनी चाहिए।
प्रतिक्रमण वह कोई क्रिया नहीं है, बल्कि हमारे कषाय, हमारे दोषों को कम करने का एक साधन है। यह प्रतिक्रमण हमें जिस भाषा में समझ में आए, उसी भाषा में करना चाहिए। जैसे कि, “मैंने इस व्यक्ति का अपमान किया, या इनके प्रति मेरी दृष्टि बिगड़ गई, या इन्हें वाणी से दुःख दिया, इन सब की माफ़ी माँगता हूँ।” शास्त्रों में लिखी हुई कठिन भाषा में नहीं, बल्कि हमें आती हो उस भाषा में, सरल शब्दों में भूलों को स्वीकार करना और माफ़ी माँगना वही सच्चा प्रतिक्रमण है। दूसरों के लिखे हुए दोषों के नहीं, बल्कि अपने खुद के ही दोषों को पहचानकर उनका प्रतिक्रमण करना चाहिए। क्योंकि, जैसे कोई व्यक्ति खाकर डकार ले, तो हमारा पेट नहीं भरता। वैसे ही शास्त्रों में लिखे हुए दोषों का प्रतिक्रमण करें, तो हमारे एक भी दोष ख़त्म नहीं होते, बल्कि दोषों का भंडार खड़ा हो जाता है।
प्रतिक्रमण के पीछे भगवान का आशय यह था, कि “जो भाषा समझ में आए उस भाषा में प्रतिक्रमण करो। अपनी-अपनी भाषा में प्रतिक्रमण करना है! वर्ना लोग प्रतिक्रमण को पाएँगे नहीं।” प्रतिक्रमण का मूल हेतु क्रिया करना या शब्द बोलना नहीं है, बल्कि खुद के अभी के अभिप्रायों को बदलना है। पुराने अभिप्राय के अनुसार लोगों को दुःख देने वाले विचार, वाणी और वर्तन के सामने “ऐसा नहीं होना चाहिए” ऐसा नया अभिप्राय सेट करने के लिए ही प्रतिक्रमण है।
प्रतिक्रमण सच्चे दिल से होना चाहिए। शब्द सही तरह से आएँ या न आएँ, वह महत्त्वपूर्ण नहीं है, लेकिन सच्चे दिल और भाव से किया गया प्रतिक्रमण ही प्रभावशाली होता है।
सच्चे दिल के प्रतिक्रमण का महत्त्व समझाते हुए परम पूज्य दादाश्री कहते हैं, “यह सब गलत है, ऐसा नहीं करना चाहिए, ऐसा सब बोलते हैं, वे दिखावे के लिए बोलते हैं। ‘सुपरफ्लुअस’ बोलते हैं। हार्टिली नहीं बोलते। वर्ना यदि ऐसा ‘हार्टिली’ बोलते तब तो उनका दोष कुछ टाइम के बाद चला जाता। कोई चारा ही नहीं था! आपका दोष चाहे कितना भी खराब हो जाए, लेकिन यदि आपको उसका बहुत ‘हार्टिली’ पछतावा होता है, तो वह दोष फिर से नहीं होगा। यदि फिर से हो जाए तो उसमें भी हर्ज नहीं है, लेकिन बहुत पश्चाताप करते रहो।”
हम अक्सर "सॉरी" कह देते हैं, वह तो ऊपरी व्यवहार है, वह सच्चा प्रतिक्रमण नहीं कहलाता। सच्चे प्रतिक्रमण में भूल का स्वीकार यानी आलोचना करना, भूल की माफ़ी माँगना यानी प्रतिक्रमण करना, और फिर से वह भूल न हो ऐसा निश्चय करना यानी प्रत्याख्यान करना, महत्त्वपूर्ण हैं। क्रिया से किया गया प्रतिक्रमण सच्चा नहीं होता। वास्तव में तो भाव प्रतिक्रमण की ही ज़रूरत है, जो क्रियाकरी है। अंदर भाव ऐसा रखना चाहिए कि "ऐसा नहीं होना चाहिए", यह भाव प्रतिक्रमण कहलाता है। जबकि, अंदर बिना किसी भाव के केवल शब्दों को बोल देना, उसे द्रव्य प्रतिक्रमण कहते हैं।
गलत काम हो जाने के बाद यदि कोई उसका सच्चे हृदय से पछतावा करे, तो गलत काम करने का दंड जगत में तो भुगतना पड़ता है, लेकिन आने वाले भव का गुनाह नहीं बँधता। सच्चे दिल से किया गया प्रतिक्रमण तो काम निकाल देता है।
प्रतिक्रमण के लिए हमारा भाव कैसा होना चाहिए, इसका एक सुंदर दृष्टांत देते हुए परम पूज्य दादाश्री कहते हैं, “स्त्री से जितनी पहचान है, उतनी पहचान प्रतिक्रमण से हो जानी चाहिए। जैसे स्त्री को भूल नहीं पाते हैं, वैसे ही प्रतिक्रमण नहीं भूलाना चाहिए। सारे दिन माफी माँग-माँग करनी है। माफी माँगने की आदत ही डाल देनी है।” वे कहते हैं कि जैसे हम खाते हैं, पीते हैं और पूरा दिन सांस के ज़रिए हवा लेते हैं, वैसे ही पूरे दिन प्रतिक्रमण करते रहना चाहिए।
परम पूज्य दादाश्री कहते हैं कि प्रतिक्रमण ‘शूट ऑन साइट’ होना चाहिए। ‘शूट ऑन साइट’ प्रतिक्रमण यानी जैसे पुलिस किसी अपराधी के लिए वारंट निकालती है कि अपराधी को “जहाँ देखो, वहीं मार गिराओ”, उसी तरह जैसे ही अपना दोष दिखे, वहीं उन्हें प्रतिक्रमण से खत्म कर देना चाहिए। हमसे एक भी शब्द थोड़ा सा गलत निकल गया हो, तो फिर अंदर प्रतिक्रमण शुरू हो ही जाना चाहिए, तुरंत ही, ऑन द मोमेन्ट। प्रतिक्रमण में उधार रखें या बासी रखें, यह नहीं चलेगा।
मान लो कि, सुबह-सुबह घर में किसी से कप-प्लेट टूट गई और हम चिढ़कर गुस्से में कुछ बोले या मुँह फुलाएं, तो उससे सामने वाले को दुःख होता है। उस समय हमें मन में ऐसा होना चाहिए कि “यह मैंने उसे दुःख दिया है, वहाँ प्रतिक्रमण करना चाहिए।” ऐसे कई प्रसंग घर में होते रहते हैं। थोड़ा सा भोजन खराब हो गया, किसी ने टाइम पर काम नहीं किया, या किसी ने मदद नहीं की, तो मुँह बिगड़ जाता है। “मैं कहता हूँ, तो भी क्यों नहीं करता?”, “मेरा क्यों नहीं मानते?” इन सारी मान्यताओं के कारण व्यवहार में क्रोध उत्पन्न होता है और सामने वाले को दुःख हो जाता है।
सामने वाले को कुछ दुःख हो जाए, ऐसा आचरण करें तो वह अतिक्रमण कहलाता है और अतिक्रमण के ऊपर प्रतिक्रमण होना चाहिए। उससे अतिक्रमण मिट जाता है, कर्म हल्का हो जाता है। लेकिन, प्रतिक्रमण साल में केवल एक बार करते है, ऐसा नहीं है, बल्कि यह ‘शूट ऑन साइट’ होना चाहिए, तो वह दोष चला जाता है और परिणामस्वरूप हमें दुःख नहीं आता। स्थिरता से बैठकर न हो पाएँ, लेकिन चलते-फिरते ऐसा ‘शूट ऑन साइट’ प्रतिक्रमण करते रहें, तो भी चलेगा। उसको लंबा करने की भी ज़रूरत नहीं है, संक्षेप में कर देना चाहिए। सामने वाले के आत्मा को हाज़िर करके क्षमा माँगना कि “यह भूल हुई, मुझे माफ करो।”
अगर ‘शूट ऑन साइट’ प्रतिक्रमण न हो, तो दो घंटे बाद भी कर सकते हैं। वह भी न हो, तो रात में याद करके करना चाहिए कि आज पूरे दिन में किसके साथ टकराव हुआ या किसे दुःख हुआ। वह भी न हो तो सप्ताह में एक दिन, पूरे सप्ताह में जितने अतिक्रमण हुए हों, लोगों को दुःख हुआ हो, उन्हें याद करके एक साथ प्रतिक्रमण करने चाहिए। लेकिन, जो तुरंत हो जाए, उसकी तो बात ही कुछ और है। जैसे सफेद कपड़ों पर चाय का दाग़ पड़ने के बाद, हम तुरंत धो डालें, तभी वह पूरी तरह साफ़ होता है। हम दाग़वाले कपड़ों को महीने में एक बार या साल में एक बार साफ़ करने के लिए नहीं छोड़ते।
इसलिए ‘शूट ऑन साइट’ प्रतिक्रमण उत्तम है। नहीं तो, एक घंटा बैठकर जितने भी प्रसंग दिखाई दें, उन्हें याद कर-करके प्रतिक्रमण करना चाहिए। बाकी जो याद न आएँ, उनके लिए एक साथ यानी सामूहिक प्रतिक्रमण हो सकता है कि “हे भगवान! जो भी भूल-चूक हुई है, वह आज मुझे याद नहीं आ रही है, लेकिन प्रकृति के स्वभाव से ऐसी वाणी बोली गई, जिससे लोगों को बहुत दुःख पहुँचा है। कई वर्षों से ऐसा हो रहा है। उसका बहुत हृदय से पछतावा करता हूँ और क्षमा माँगता हूँ। जो भी भूलें की हों, दूसरों को दुःख पहुँचाया हो, उन सभी के लिए बहुत पछतावा करता हूँ और क्षमा माँगता हूँ।“ अगर किसी एक व्यक्ति के साथ सौ प्रकार के दोष हुए हों और अब सारे दोष याद न आते हों, तो भी उनका सामूहिक प्रतिक्रमण कर देना चाहिए कि उन सभी दोषों की मैं आपके पास क्षमा माँगता हूँ।
परम पूज्य दादा श्री कहते हैं, “भगवान ने हर रोज़ बहीखाता लिखने के लिए कहा था, जबकि अब तो बारह महीने बाद बहीखाता लिखते हैं। जब पर्युषण आता है, तब। भगवान ने कहा था कि ‘यदि सचमुच में व्यापारी है तो हर रोज़ लिखना और शाम को हिसाब निकालना’। बारह महीने बाद बही लिखने पर फिर क्या याद रहेगा? उसमें कोई भी रकम याद रहेगी? भगवान ने कहा था कि ‘सचमुच का व्यापारी बनना और रोज़ की बही रोज़ लिखना और बही में कुछ भूल हो जाए, अविनय हो जाए तो तुरंत ही प्रतिक्रमण कर लेना, उसे मिटा देना’।”
A. प्रतिक्रमण यानी वापस लौटना। जैसे हम किसी गलत रास्ते पर आगे बढ़ गए हों, तो फिर यू-टर्न लेकर सही... Read More
A. जहाँ-जहाँ अतिक्रमण होता है, वहाँ-वहाँ प्रतिक्रमण करने की आवश्यकता है। सामान्य व्यवहार यानी क्रमण।... Read More
Q. प्रतिक्रमण करने का महत्त्व क्या है?
A. परम पूज्य दादा भगवान कहते हैं, “अतिक्रमण से जगत् खड़ा हुआ है तो प्रतिक्रमण से जगत् बंद हो जाता है।... Read More
Q. संबंधों को सुधारने के लिए प्रतिक्रमण किस तरह से करना चाहिए?
A. अक्सर हम अपने नज़दीक की व्यक्तियों के संबंधों में सबसे अधिक दुःख दे देते हैं। कई बार दुःख देने के... Read More
Q. जीवन में पाप कर्मों से किस तरह छूटें?
A. भयंकर काल आने वाला है। भयंकर दुःख आने वाले हैं! बहुत अधिक अतिक्रमण का फल ही पशुयोनि होगी और उससे... Read More
Q. मिच्छामि दुक्कड़म् अर्थात् क्या?
A. मिच्छामि दुक्कड़म्, यह अर्धमागधी (संस्कृत से निकली हुई प्राकृत भाषा) भाषा का शब्द है, जिस भाषा में... Read More
subscribe your email for our latest news and events
