भगवद् गीता में भगवान के साथ अनुसंधान करने और पूर्ण दशा तक पहुँचने के विभिन्न मार्ग दर्शाए गए हैं, जैसे कि, ज्ञानयोग, कर्मयोग और भक्तियोग।
इनमें, भक्तिमार्ग पर प्रकाश डालते हुए श्रीकृष्ण भगवान गीता के सातवें अध्याय में भक्तों के प्रकार बताते हैं।
चतुर्विधा भजन्ते मां जनाः सुकृतिनोऽर्जुन ।
आर्तो जिज्ञासुरर्थार्थी ज्ञानी च भरतर्षभ ॥ १६॥
अर्थात्, चार प्रकार के भक्त मेरी भक्ति में लीन होते हैं। एक वे जो आर्तभक्त हैं, अर्थात् जो दुःखी है। दूसरे प्रकार के भक्त जो अर्थार्थी हैं, अर्थात् जो सांसारिक लाभ की इच्छा रखते हैं। तीसरे प्रकार के भक्त जो जिज्ञासु हैं। जबकि चौथे प्रकार के भक्त ज्ञानभक्त हैं।
वास्तव में, पाँच इन्द्रियों के माध्यम से ईश्वर प्राप्ति के लिए जो कुछ भी किया जाता है, वह भक्ति है। भक्ति के द्वारा भगवान के साथ अनुसंधान स्थापित होता है, और इससे धर्म के मार्ग पर प्रगति की शुरुआत करते हैं।
इन प्रकारों में पहले प्रकार के भक्त हैं आर्तभक्त हैं। ऐसे भक्त जो संसार के अनुभवों से दुःखी हो गए हैं, और कहीं सुखी होने का रास्ता नहीं मिलता है, इसलिए अंत में वे भगवान के पास उनका दुःख दूर करने की प्रार्थना करते हैं। हालांकि, ये भक्त दुःख पड़ने पर ही भगवान को याद करते हैं और जब सुख आता है तब उन्हें भूल जाते हैं। उदाहरण के तौर पर, यदि पैर में दर्द हो रहा हो तो आर्तभक्त भगवान से प्रार्थना करता है, “हे भगवान! मुझ पर दया करें, मेरा दुःख दूर करें, दया करें!” यदि किसी भक्त का जवान बेटा बहुत बीमार हो और अनेक प्रयत्नों के बावजूद ठीक न हो रहा हो, तो वह भगवान से प्रार्थना करता है, “हे भगवान! मेरा बेटा ठीक हो जाए तो मैं पंद्रह पूर्णिमा का व्रत करूँगा।” इसलिए भगवान भी समझ जाते हैं कि यह दुःख के कारण मुझे याद कर रहा है। इस तरह दुःख से व्याकुल होकर भगवान को याद करें ऐसे आर्तभक्त जगह-जगह देखने को मिल जाते हैं।
दूसरे प्रकार के अर्थार्थी भक्त हैं, जो अर्थ अर्थात् सांसारिक लाभ को प्राप्त करने के लिए भगवान को भजते हैं। जैसे कि बच्चे न होते हों ऐसे दंपती पुत्र की आशा में प्रार्थना करते हैं कि, “भगवान, हमारे यहाँ पुत्र होगा तो मैं इतने नारियल चढ़ाऊँगा।” या व्यापार अच्छा चलने की इच्छा से मन्नत माँगता है कि, “माताजी, मेरा व्यापार अच्छा चले तो मैं चुनरी चढ़ाऊँगा।” ये सभी अर्थार्थी भक्त कहलाते हैं। किसी भी भगवान या देवी-देवता में श्रद्धा रखकर मन्नतें माँगना यह अपनी-अपनी श्रद्धा का विषय है। लेकिन सिर्फ़ स्वार्थ के हेतु से ही भगवान को याद करें और हेतु पूरा होने के बाद भगवान को भूल जाएँ यह अर्थार्थी भक्त के लक्षण हैं।
तीसरे हैं जिज्ञासु भक्त। इन भक्तों को भगवान के दर्शन की तीव्र उत्कंठा रहती है। उन्हें कुछ सच्चा जानने की कामना रहती है। वे संसार के दुःख से या मोह से प्रेरित होकर नहीं, बल्कि भगवान की प्राप्ति की जिज्ञासा से भक्ति करते हैं। भगवान क्या होंगे? कैसे होंगे? कहाँ रहते होंगे? क्या करते होंगे? क्या नहीं करते होंगे? ऐसे प्रश्न उन्हें हमेशा उठते रहते हैं। जिन भगवान को स्वयं समर्पित होते हैं, उन्हें पूरी तरह पहचानने की जिज्ञासा से ये भक्त भगवान की खोज में ही रहते हैं। आगे बढ़कर जिनका सांसारिक चीज़-वस्तुओं का मोह पूरी तरह छूट गया हो और केवल आत्मा को ही जानने की कामना शेष रहती है, उसे तीव्र मुमुक्षुता कहते हैं।
फिर चौथे प्रकार के भक्त ज्ञानी भक्त कहलाते हैं। उन्हें अपने भीतर विराजमान भगवान का साक्षात्कार हो चुका होता है और उसके बाद वे निरंतर आत्मस्वरूप में ही रहते हैं। वहाँ भगवान और भक्त में कोई भेद नहीं रहता। क्योंकि परमात्मा तो खुद का ही स्वरूप है, पर जब तक उसका भान नहीं होता तब तक भक्त और भगवान अलग-अलग हैं। जब व्यक्ति स्वयं खुद का स्वरूप प्राप्त कर लेता है, तब वही परमात्मा है। भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि ज्ञानी में और मुझमें कोई भेद नहीं है।
ज्ञान अर्थात् ऐसा आत्मज्ञान जो व्यक्ति को अपने ही आत्मा का साक्षात्कार कराए। ज्ञान होने के बाद खुद के ही भीतर विराजमान परमात्मा की भजना करना वही प्रत्यक्ष भक्ति है। प्रत्यक्ष भक्ति अर्थात् जहाँ भगवान प्रगट हुए हैं, उनकी भक्ति करना। मोक्ष प्राप्ति के लिए प्रगट की भक्ति अनिवार्य है। प्रत्यक्ष भक्ति के लिए अपने सच्चे स्वरूप की पहचान होना ज़रुरी है।
जबकि भगवान की मूर्ति को स्थापित करके जो भक्ति की जाती है वह परोक्ष भक्ति है। परोक्ष भक्ति से धीरे-धीरे उर्ध्वीकरण होता रहता है। जब तक खुद के भीतर विराजमान परमात्मा के दर्शन नहीं होते, तब तक मूर्ति के माध्यम से परोक्ष भक्ति करने से अंत में वह प्रत्यक्ष की ओर ही ले जाती है। परोक्ष भक्ति मार्ग में भक्त भगवान की भक्ति करता है, इसलिए भक्त और भगवान अलग-अलग अस्तित्व होते हैं। जबकि “मैं खुद ही परमात्मा हूँ” ऐसा जहाँ भान हो, वहीं ज्ञानमार्ग है!
भगवान श्रीकृष्ण ने कहा है कि इन चार प्रकार के भक्तों में ज्ञान भक्त मुझे सबसे अधिक प्रिय है। परम पूज्य दादा भगवान कहते हैं कि ज्ञानी भक्त सबसे ऊँचे होते हैं। इसके अलावा बाकी तीन प्रकार के भक्तों में जिज्ञासु भक्त काम निकाल लेते हैं। हमें भी जिज्ञासु भक्त की तरह भगवान से किसी अन्य सांसारिक लाभ के बदले खुद के सच्चे स्वरूप की पहचान हो ऐसा माँगना चाहिए।
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