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भगवद् गीता का सार क्या है?

भगवद् गीता में श्रीकृष्ण भगवान ने अर्जुन को युद्ध करने के लिए कहा था। क्योंकि अर्जुन रणभूमि में अपने सगे और स्नेहीजनों के विरुद्ध युद्ध लड़ने के विचार से विषाद में डूब गए थे कि, मैं अपने प्रियजनों को मार डालूँ ये कितना अधम कर्म होगा! तब अर्जुन का मोह दूर हो और वे युद्ध करने के लिए तैयार हो जाए, इसी उद्देश्य से श्रीकृष्ण भगवान ने अर्जुन को ज्ञान दिया था।

परम पूज्य दादा भगवान कहते हैं कि श्रीकृष्ण भगवान जो कहना चाहते थे, उसका सार केवल दो ही शब्दों में आ जाता है – ‘पैकिंग’ अर्थात् विनाशी देह, और ‘माल’ अर्थात् अविनाशी आत्मा। वे कहते हैं कि यदि पैकिंग और माल इन दो शब्दों का यथार्थ समझ में आ जाए तो पूरी भगवद् गीता में श्रीकृष्ण भगवान का जो अंतर आशय था वह इसमें समा जाता है।

परम पूज्य दादाश्री इस सार को यहाँ सरल भाषा में समझाते हैं।

दादाश्री: कृष्ण भगवान क्या कहना चाहते हैं? व्यक्ति मर जाए तब कहते हैं न कि, 'अंदर से चले गए।' वह क्या है? वह 'माल' है और यहाँ पड़ा रह जाता है, वह 'पैकिंग' है। इन चर्मचक्षुओं से दिखता है वह पैकिंग है और अंदर 'माल' है, मटीरियल है। देयर आर वेराइटीज़ ऑफ पैकिंग्स। कोई आम का पैकिंग, कोई गधे का पैकिंग, तो कोई मनुष्य का पैकिंग या स्त्री का पैकिंग है लेकिन अंदर माल शुद्ध है, एक सरीखा है सभी में। पैकिंग तो भले ही कैसा भी हो, सड़ा हुआ भी हो, लेकिन व्यापारी पैकिंग की जाँच नहीं करता, अंदर 'माल' ठीक है या नहीं, उतना देख लेता है। उसी तरह हमें भी अंदर के माल के दर्शन कर लेने हैं।

जब अर्जुन अपने ही प्रियजनों को मारने के विचार से काँप रहे थे, तब श्रीकृष्ण भगवान ने अर्जुन को समझाया कि तू मरे हुओं को ही मार रहा है। पैकिंग यानी शरीर, जो विनाशी है, तू उसी को मार रहा है। जबकि अंदर का माल यानी आत्मा तो अविनाशी है और तेरा खुद भी वही स्वरूप है। विनाशी भाग आमने-सामने खत्म हो रहा है। उन्होंने अर्जुन को दिव्य दृष्टि प्रदान करके विराट स्वरूप के दर्शन कराए और पूरे कालचक्र का ज्ञान कराया कि अनंत अवतार से जीव जन्म लेता है, मरता है और चार गतियों में भटकता रहता है। इतना ही नहीं, श्रीकृष्ण भगवान ने अर्जुन से कहा था कि तेरे भीतर जो माल है वही मैं खुद हूँ, वही कृष्ण है; उसे तू पहचान।

भगवद् गीता में आत्मा के अविनाशी स्वरूप को विस्तार से समझाया गया है। आत्मा को शस्त्रों से छेदा नहीं जा सकता, अग्नि से जलाया नहीं जा सकता, जल उसे भिगो नहीं सकता और वायु उसे सुखा नहीं सकती। जैसे मनुष्य पुराने वस्त्रों को त्याग कर नए वस्त्रों को धारण करता है, उसी तरह मृत्यु के समय आत्मा वृद्ध या बीमार शरीर को त्याग कर नया शरीर धारण करता है।

परम पूज्य दादा भगवान कहते हैं, "जो इस आत्मा को 'मारने वाला' समझते हैं अथवा जो इसे (आत्मा को) मरा हुआ ही मानते हैं, वे दोनों ही नहीं समझते क्योंकि इस आत्मा को कोई नहीं मार सकता। या फिर जो ऐसा मानते हैं कि वह मर गया, वे सभी इसे नहीं समझते क्योंकि यह आत्मा मरता नहीं है और न ही मारा जा सकता है। यह आत्मा कभी जन्म भी नहीं लेता और मरता भी नहीं है। यह पहले नहीं था और फिर से नहीं होगा, ऐसा भी नहीं है। है ही त्रिकाली। यह अजन्म, नित्य, शाश्वत व पुरातन है। इसलिए शरीर के मरने पर भी नहीं मरता। हे पार्थ! जो इसे अविनाशी, नित्य, अजन्म और अविकारी समझता है, वह पुरुष यह सब समझता है कि 'कौन किस प्रकार से मारता है और कौन किसे मरवाता है'। यह तो, पुराने वस्त्र छोड़कर नए वस्त्र धारण करता है। अन्य कुछ भी नहीं है।”

भगवद् गीता के दूसरे अध्याय के १६वें श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण ऐसा भी कहते हैं कि,

नास्तो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सतः।
उभयोरपि दृष्टोऽन्तस्त्वनयोस्तत्त्वदर्शिभिः॥ १६॥

परम पूज्य दादा भगवान इस श्लोक का अर्थ समझाते हुए कहते हैं, “’असत्नो भाव नथी', अर्थात् (असत् का) अस्तित्व ही नहीं है। असत् अर्थात् जो वस्तु ही नहीं है, यहाँ पर उसका अस्तित्व ही नहीं है। और सत् का अभाव नहीं है। सत् अर्थात् वस्तु। जो त्रिकाली वस्तु है, उसे सत् कहा जाता है, जो कि तीनों ही काल में रहता है। जिसका कभी भी विनाश नहीं होता, उसे सत् कहा जाता है और जो विनाशी है, उसे असत् कहा जाता है। 'इन तत्त्वदर्शियों ने दोनों का निर्णय देखा है कि यह अविनाशी है और यह विनाशी। जिसकी वजह से यह सारा व्याप्त है, उसे तू अविनाशी समझ', ऐसा कहते हैं। "आत्मा की वजह से यह सबकुछ व्याप्त है'। आत्मा है, तो यह व्याप्त है, वर्ना यह आत्मा नहीं होता तो व्याप्त नहीं होता, ऐसा कहना चाहते हैं। ‘अव्यय का विनाश करने में कोई भी समर्थ नहीं है। अविनाशी का विनाश करने में कोई भी समर्थ नहीं है, गीता में ऐसा कहा है।"

उसके बाद दूसरे अध्याय के अठारहवें श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं,

अन्तवन्त इमे देहा नित्यस्योक्ता: शरीरिण: ।
अनाशिनोऽप्रमेयस्य तस्माद्युध्यस्व भारत ॥ १८॥

परम पूज्य दादा श्री इसका अर्थ समझाते हुए कहते हैं कि, “'आत्मा नित्य है, अविनाशी है, अप्रमेय है। ऐसे शरीर धारी आत्मा के इन सब शरीरों को नाशवंत कहा गया है। अतः हे भरत ! तू युद्ध कर'।"

वे समझाते हैं कि यह जो देह मरता है, वह तो लोकभाषा में मरता है, बाकी भगवान की भाषा में कोई मरता नहीं और कोई जन्म भी नहीं लेता। ये पुतले जन्म लेते हैं और पुतले मरते हैं। कोई मरता है तो ये मरना किसे कहते हैं ? जो हमेशा के लिए खत्म हो जाए, उसे। लेकिन आत्मा कभी भी खत्म नहीं होता। उत्पन्न हो जाना (उत्पात), फिर व्यय (विनाश) हो जाना, वापस उत्पन्न हो जाना और फिर से व्यय हो जाना ऐसा चलता रहता है। इसमें खुद ध्रुव (हमेशा का) रहता है। अवस्थाएँ उत्पन्न और व्यय, उत्पन्न और व्यय होती रहती हैं। जैसे जन्म के बाद 'जवानी' उत्पन्न होती है, फिर वह भी व्यय हो जाती है और वृद्धावस्था आती है। फिर वृद्धा अवस्था भी व्यय हो जाती है ऐसे सभी अवस्थाएँ उत्पन्न और व्यय होती रहती हैं। परंतु खुद आत्मा शाश्वत है।

इस बात का दुरुपयोग ऐसे नहीं करना है कि “आत्मा मरता ही नहीं तो फिर जीवों को मारने में जोख़िम नहीं है।” किसी भी जीव की, खासकर मनुष्य की हत्या करने में तो भयंकर पापकर्म बँधता हैं। यह संदेश सिर्फ़ श्रीकृष्ण भगवान ने, अपने क्षत्रिय धर्म से विचलित हो रहे अर्जुन को दिया गया था और साथ में ऐसा ज्ञान दिया था जिससे युद्ध करने के बावजूद कर्म नहीं बँधता

प्रत्यक्ष का महत्व

परम पूज्य दादाश्री कहते हैं, “अर्जुन को मोह उत्पन्न हुआ था, क्षत्रिय धर्म होने के बावजूद वह मूर्छित हो चुका था। इसलिए मूर्च्छा निकालने के लिए कृष्ण भगवान ने अर्जुन को सावधान किया और कहा, 'तेरी मूर्च्छा उतार, तू तेरे धर्म में आ जा। कर्म का कर्ता या अकर्ता तू मत बनना।'” लेकिन यह उपदेश हमेशा के लिए नहीं था। यह सिर्फ़ अर्जुन के मोह को दूर करने के लिए उस समय के लिए ही योग्य था। यह बात नहीं समझने से लोगों को प्रश्न हुआ कि श्रीकृष्ण भगवान ने ज्ञानी होकर भी सबको मारने के लिए क्यों कहा? श्रीकृष्ण भगवान को पता था कि थोड़ी देर में अर्जुन का मोह उतरने वाला है और उसके क्षत्रिय परमाणु युद्ध किए बिना नहीं रहेंगे। तब नैमित्तिक रूप से श्रीकृष्ण भगवान ने अर्जुन से कहा था, कि तू तेरा धर्म निभाकर युद्ध का कर्म कर। तू झूठा मोह कि “मैं युद्ध कर रहा हूँ” ऐसा अहंकार मत करना।

इसके अलावा, श्रीकृष्ण भगवान अर्जुन के प्रत्यक्ष थे। प्रत्यक्ष ज्ञानी से अर्जुन को अविनाशी की दृष्टि उत्त्पन्न हुई थी। यह दृष्टि प्राप्त होने के बाद अर्जुन ने अंत में श्रीकृष्ण भगवान से यह कहा कि, “मेरा मोह नष्ट हो गया है, अब मैं आपकी आज्ञा के अनुसार ही करूँगा।” विनाशी और अविनाशी का यथार्थ ज्ञान होते ही, अर्जुन ने युद्ध का कार्य पूरा करने के बावजूद भी अकर्म दशा में रहकर एक भी कर्म नहीं बाँधा। इतना ही नहीं, इस ज्ञान में स्थिर होकर अर्जुन, इसी देह में पूर्णाहुति पाकर मोक्ष में भी गए! प्रत्यक्ष ज्ञानी से सम्यक् दृष्टि प्राप्त करके उनकी आज्ञा में रहकर पूर्णाहुति पाने का मार्ग खुला हो गया!

श्रीकृष्ण भगवान अर्जुन के लिए प्रत्यक्ष थे। उन्होंने अर्जुन से कहा कि, “तू सभी धर्मों का त्याग करके एकमात्र मेरी शरण में आ जा।” इसका अर्थ समझाते हुए परम पूज्य दादाश्री कहते हैं कि श्रीकृष्ण भगवान आत्मरूप होकर यह बात करते हैं, जिसमें ‘मैं’ यानी कृष्ण और कृष्ण अर्थात् आत्मा है। प्रत्येक शरीर में आत्मा है, वह खुद ही कृष्ण है और उसी में ही मोक्ष है। परम पूज्य दादाश्री कहते हैं “यह मैं करता हूँ वह...”, ये श्रीकृष्ण भगवान खुद आत्मस्वरूप में बोलते हैं। पर लोगों को समझने में भूल हुई और वे यह मान बैठे कि वे व्यक्ति रूप में यह बोल रहे हैं, इसलिए “मैं करता हूँ और मैंने ही यह दुनिया बनाई है।“ ऐसा अर्थ निकल लिया। लेकिन वास्तव में ऐसा नहीं है। श्रीकृष्ण भगवान आत्मा रूप में बोलते हैं।“

श्रीकृष्ण भगवान के हृदय की बात

भगवद् गीता में श्रीकृष्ण भगवान के हृदय की बात को समझने में कालक्रम में क्या परिवर्तन आ सकते हैं, उसे परम पूज्य दादाश्री एक प्रैक्टिकल उदाहरण के माध्यम से समझाते हैं।

दादाश्री: बेटा यदि हॉस्टल में पढ़ रहा हो तब फादर उसे कड़े शब्दों में पत्र लिखते हैं, 'तू पढ़ता नहीं है और मेरे पैसे बिगाड़ रहा है, सिनेमा-नाटक देखता रहता है, कुछ भी नहीं करता है।' तब बेटा क्या करता है कि बाप का पत्र खुद के फ्रेन्ड को दिखाता है और कहता है कि, 'देख न, मेरे फादर कैसे हैं? जंगली हैं, क्रोधी हैं और लोभी हैं, कंजूस हैं।' लड़का ऐसा क्यों कहता है? क्योंकि उसे फादर की बात समझ में नहीं आती, वह फादर का अंतर आशय नहीं समझ सकता है। फादर और बेटे में मात्र पच्चीस ही सालों का डिफरन्स है, फिर भी बाप का अंतर आशय बेटा नहीं समझ पाता, तो फिर कृष्ण भगवान को गए तो पाँच हज़ार साल हो गए, तो पाँच हज़ार साल के डिफरेन्स में कृष्ण भगवान का अंतर आशय कौन समझ सकेगा ? उनका अंतर आशय कौन बता सकेगा ? वह तो जो 'खुद' कृष्ण भगवान हैं, वे ही बता सकते हैं! महावीर के अंतर आशय की बात कौन बता सकता है? वह तो जो खुद महावीर हैं, वे ही बता सकते हैं।

भगवद् गीता में श्रीकृष्ण भगवान के हृदय की बात समझना कितना जटिल है, यह बात परम पूज्य दादाश्री हमें यहाँ समझाते हैं

दादाश्री: भगवान ने खुद ने कहा है कि, 'मैं जो गीता में कहना चाहता हूँ उसका स्थूल अर्थ एक हज़ार में से एक व्यक्ति समझ सकेगा। ऐसे एक हज़ार स्थूल अर्थ समझने वाले व्यक्तियों में से एक व्यक्ति गीता का सूक्ष्म अर्थ समझ सकेगा। ऐसे एक हज़ार सूक्ष्म अर्थ समझने वालों में से एक व्यक्ति सूक्ष्मतर अर्थ को समझ सकेगा। ऐसे एक हज़ार सूक्ष्मतर अर्थ को समझने वालों में से एक व्यक्ति गीता का सूक्ष्मतम अर्थ अर्थात् मेरा आशय समझ सकेगा !' कृष्ण भगवान क्या कहना चाहते थे कि 'वही एक' उसे समझ सकेगा। अब इस साड़े तीन अरब की बस्ती में कृष्ण भगवान को समझने में किसका नंबर लगेगा?

केवल एक ज्ञानी पुरुष के पास ही सभी शास्त्रों की यथार्थ बात प्राप्त हो सकती है।

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