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ब्रह्मसंबंध किसे कहते हैं?

ब्रह्म शब्द संस्कृत भाषा का है, जिसका अर्थ होता है आत्मा। ब्रह्मसंबंध अर्थात् ब्रह्म यानी आत्मा के साथ हमेशा का संबंध। जब खुद के भीतर के आत्मा का निरंतर ख्याल रहे उसे ब्रह्मसंबंध कहते हैं। कंठी बँधवाकर, कान में मंत्र दें, वह तो व्यवहार है, लेकिन खुद के आत्मा के साथ संबंध हो वह खरा ब्रह्मसंबंध कहलाता है।

परम पूज्य दादाश्री ब्रह्मसंबंध की व्याख्या और लक्षण बताते हैं।

दादाश्री: जब ब्रह्मरस टपकता है, तब लगनी लगती है और तब ब्रह्मसंबंध जुड़ता है। 'खुद का स्वरूप' समझ में आए उसी को खरा ब्रह्मसंबंध हुआ कहते हैं। एक क्षण भी स्वरूप भूलें नहीं, वही ब्रह्मसंबंध है, उसके बाद एक भी चिंता नहीं होती।

श्रीकृष्ण भगवान ने भगवद् गीता में ब्रह्मसंबंध की कहीं भी बात नहीं की, लेकिन अर्जुन से आत्मा पहचानने की ही बात कही है। उन्होंने आत्मज्ञान की ही बात की है, जो जैन या वैष्णव धर्म से, मठ और संप्रदाय से और इस देह से भी परे है! बाद में आचार्यश्री वल्लभाचार्य ने खरे ब्रह्मसंबंध को पुष्टि दी थी। उसमें एक बार खुद के आत्मा का आश्रय लेने के बाद दूसरे किसी आश्रय की (अन्याश्रय की) ज़रूरत नहीं पड़ती, कहीं और सुख खोजने की ज़रूरत नहीं पड़ती, ऐसा भावार्थ था। लेकिन काल बदलने पर उसका सही अर्थ भुला दिया गया है। यदि हमें आत्मा का शाश्वत आश्रय मिल गया हो तो अन्याश्रय में न जाएँ, लेकिन जिन्हें आश्रय मिला ही नहीं, उनका क्या?

यह दगा रूपी संसार जो सिर्फ़ दुःख का संग्रह स्थान है, उसमें सुख की एक बूँद भी नहीं है। मोह के कारण संसार अच्छा लगता है, लेकिन जब मोह उतरेगा तब कड़वा ज़हर जैसा लगेगा। इसलिए आत्मा के साथ और आत्मा की पहचान कराने वाले आत्मज्ञानी के साथ ऐसा संबंध बाँध लेना चाहिए जो कभी टूटे नहीं। फिर उनकी दी हुई दृष्टि से पेड़-पौधे, पशु-पक्षी सबमें आत्मा दिखाई दे ऐसा पक्का संबंध बंध जाता है।

ब्रह्मसंबंध से आगे ब्रह्मस्वरूप होना है। भगवान श्रीकृष्ण खुद परब्रह्म स्वरूप हो गए थे, जिसे परमात्मा स्वरूप अर्थात् भगवान पद ही कहा जाता है। श्रीकृष्ण भगवान तो नर से नारायण हुए थे। हम श्रीकृष्ण भगवान को जिस स्वरूप में जानते हैं, जैसे कि, मुरलीवाले, मोरपंख वाले या अर्जुन के सारथी के रूप में, उस स्वरूप को उन्होंने गीता में खुद नकार दिया है। श्रीकृष्ण भगवान ने भगवद् गीता में अर्जुन से कहा है, तू मुझे जिस स्वरूप में देखता है, वह स्वरूप मैं हूँ ही नहीं, मैं तो आत्मा स्वरूप हूँ, तू भी आत्मा स्वरूप है, और इन सभी को आत्मा स्वरूप से देख।

परम पूज्य दादा भगवान कहते हैं कि, खुद परमात्मा है लेकिन जब तक वह पद प्राप्त नहीं हो जाता, तब तक लौकिक धर्म या भगवान के स्वरूप को हृदय में धारण करता है। लेकिन जब तक मूल आत्मा प्राप्त नहीं हो जाता तब तक वह धारणा है, और जब अपना मूल स्वरूप प्राप्त हो जाए, वह ब्रह्मसंबंध है।

श्रीकृष्ण भगवान ने अर्जुन को जिस तरह कदम-कदम पर चलते हुए ब्रह्मस्वरूप अर्थात् आत्मस्वरूप होने का मार्ग दिखाया, उसी तरह कदम-दर-कदम हमें भी चलने के लिए कहते हैं। श्रीकृष्ण भगवान ने अर्जुन को जो आत्मा की पहचान कराई थी, उस आत्मा को पहचानना और कर्म करते हुए भी अकर्म दशा प्राप्त करना यह मार्ग भगवद् गीता में खुला किया है। भगवान श्रीकृष्ण की तरह कोई ज्ञानी पुरुष, इस जगत् से हमारी निष्ठा उठाकर एक आत्मा में, ब्रह्म में बैठाकर, हमें सच्चा ब्रह्मनिष्ठ बना सकते हैं। इस विषय में परम पूज्य दादाश्री यहाँ सुंदर वर्णन करते हैं।

दादाश्री: “मन-वचन-काया से बिल्कुल जुदा ऐसा 'मैं' ब्रह्मसंबंध वाला हूँ”। संसार व्यवहार में आबरू मुठ्ठी में रहे वैसा कर दे, ऐसा है यह मंत्र! इस मंत्र से ब्रह्म की पुष्टि होती रहेगी और ब्रह्मनिष्ठ बन जाओगे। 'ज्ञानी पुरुष' के साथ लगनी लगे, वही ब्रह्मसंबंध। माया के साथ बहुत जन्मों से मित्रता की है, उसे निकाल बाहर करें, फिर भी वापस आ जाती है, लेकिन ब्रह्मसंबंध हो जाए, तब माया भाग जाती है।

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