परम पूज्य दादा भगवान की दृष्टि से मोह और आसक्ति, प्रेम नहीं हैं। वे हमें लौकिक मान्यताओं से विपरीत समझ प्रदान करके प्रेम और मोह के बीच का भेद समझाते हैं।

प्रश्नकर्ता: मोह और प्रेम, इन दोनों के बीच की भेदरेखा क्या है?
दादाश्री: यह पतंगा है न, यह पतंगा दीये के पीछे पड़कर और याहोम हो जाता है न? वह खुद की ज़िन्दगी खतम कर डालता है, वह मोह कहलाता है। जब कि प्रेम टिकता है, प्रेम टिकाऊ होता है, वह मोह नहीं होता।
मोह मतलब यूज़लेस जीवन। वह तो अंधे होने के बराबर है। अंधा व्यक्ति कीड़े की तरह घूमता है और मार खाता है, उसके जैसा। और प्रेम तो टिकाऊ होता है। उसमें तो सारी ज़िन्दगी का सुख चाहिए होता है। वह तात्कालिक सुख ढूंढे ऐसा नहीं न!
यानी यह सब मोह ही है न! मोह मतलब खुला दगा-मार। मोह मतलब हंड्रेड परसेन्ट दगे निकले हैं।
जहाँ स्वार्थ पूरा हो वहाँ प्रेम और जहाँ स्वार्थ पूरा न हो पाए वहाँ द्वेष, यह प्रेम नहीं है। प्रेम में विषय, मोह, आसक्ति या स्वार्थ नहीं होते। जैसे कि, हम जिस व्यक्ति से प्रेम करते हैं, अगर उनके जन्मदिन या एनिवर्सरी पर गिफ्ट देना भूल जाएँ, तो झगड़ा हो जाता है और यदि पसंदीदा गिफ्ट खरीदकर दी जाए तो प्रेम उमड़ता है! जहाँ बदले में कुछ भी प्राप्त करने की अपेक्षा होती है, वह प्रेम नहीं, बल्कि सौदेबाजी है।
किसी के प्रति हमारे प्रेम या लगाव की एक सीमा होनी चाहिए। हमें सामने वाले से कोई अपेक्षा नहीं रखनी चाहिए। जिनके लिए हमारे मन में प्रेम या लगाव होता है, उनके लिए ही अपेक्षाएँ जन्म लेती हैं। फिर, इन अपेक्षाओं के पूरा ना होने पर भोगवटा और फ्रस्ट्रेशन आता है, जिससे हम भी दुःखी होते हैं और सामने वाले को भी दुःख दे देते हैं। यह प्रेम नहीं, बल्कि मोह है। मोह का मतलब है, आसक्ति और आसक्ति का फल, क्लेश। जहाँ आसक्ति होगी, वहाँ झगड़ा हुए बगैर नहीं रहेगा। जहाँ प्रेम होता है, वहाँ अपेक्षा नहीं होती, सामने वाले के दोष नहीं दिखते और उन्हें दुःख नहीं देते। सामने वाला चाहे हमारा कितना भी अपमान करे, वह घटता नहीं और मान दे, तो वह बढ़ता नहीं, यही प्रेम है।
समान परमाणु होने पर शुरुआत में तो समानता लगती है। एक-दूसरे के विचार, पसंद सब कुछ मेल खाते हैं, तो प्रेम लगता है। लेकिन कुछ समय साथ में बिताने के बाद मतभेद, एक-दूसरे की गलतियाँ निकालना, एक-दूसरे को बदलने या सुधारने के प्रयास में तर्क-वितर्क, क्लेश आदि शुरू हो जाते हैं। प्रेम में चाहे कितनी भी गलतियाँ हों, उन्हें निभाया जा सकता है।
जैसे थर्मामीटर को झटकने पर उसका पारा नीचे चला जाता है। सिक्के को खड़खड़ाने से उसकी आवाज़ से यह पता चल जाता है कि, सिक्का असली है या नकली। ठीक उसी तरह, यहाँ पर परम पूज्य दादाश्री प्रेम की टेस्टिंग के लिए प्रैक्टिकल थर्मामीटर बता रहे हैं।
प्रश्नकर्ता: पर यह मोह है और यह प्रेम है ऐसा सामान्य व्यक्ति को किस तरह पता चले? एक व्यक्ति को सच्चा प्रेम है या यह उसका मोह है, ऐसा खुद को कैसे पता चले?
दादाश्री: वह तो झिड़कें, तब अपने आप पता चलता है। एक दिन झिड़क दें और वह चिढ़ जाए, तब समझ लें कि यह युज़लेस है! फिर दशा क्या हो? इससे तो पहले से ही खड़काएँ। रुपया खड़काकर देखते हैं, कलदार है या खोटा है वह तुरन्त पता चल जाता है न? कोई बहाना निकालकर और खड़काएँ। अभी तो निरे भयंकर स्वार्थ! स्वार्थ के लिए भी कोई प्रेम दिखाता है। पर एक दिन खड़काकर देखें तो पता चले कि यह सच्चा प्रेम है या नहीं?
प्रश्नकर्ता: सच्चा प्रेम हो वहाँ कैसा होता है, खड़काए तब भी?
दादाश्री: वह खड़काए तब भी शांत रहकर खुद उसे नुकसान न हो वैसा करता है। सच्चा प्रेम हो, वहाँ गले उतार लेता है। अब, बिलकुल बदमाश हो न तो वह भी गले उतार लेता है।
प्रेम तो ऐसा होता है कि, जब कोई व्यक्ति दूर हो और लंबे समय से न मिल पाए, तब भी चित्त उसी में रहता है, कोई दूसरा याद भी नहीं आता। जबकि, आजकल तो रिश्तों में जैसे ही सामने वाला व्यक्ति थोड़ा दूर होता है, दूसरा व्यक्ति किसी और के लफड़े में पड़ जाता है। इसे प्रेम कैसे कह सकते हैं? प्रेम में तो समर्पण होता है। जिसके साथ लगन लग जाती है, वह पूरा दिन याद आता ही रहता है। लगन आंतरिक होती है। बाहर का रूप बिगड़ जाने या खराब हो जाने पर भी प्रेम उतना ही रहता है। जिस हाथ को पकड़कर प्रेम व्यक्त करते हैं, वही हाथ अगर थोड़ा सा जल जाए और पट्टी बांधने की जरूरत पड़े, तो छूना तो दूर, उसे देखते भी नहीं हैं। जहाँ प्रेम है, वहाँ घृणा नहीं और जहाँ घृणा है, वहाँ प्रेम नहीं।

जहाँ ज़रूरत से ज़्यादा आसक्ति होती है, वहीं बैर बंधता है। दुनिया में ऐसी कितनी ही घटनाएँ होती हैं, जिनमें बहुत करीबी व्यक्ति, जिनके ऊपर हमें प्रेम होता है, वही बैर वसूलता है। परम पूज्य दादा भगवान हमें यहाँ यह समझाते हैं कि बैर के बीज आसक्ति से ही पड़ते हैं।
दादाश्री: इसलिए जगत् ने सभी देखा था पर प्रेम देखा नहीं था और जगत् जिसे प्रेम कहता है, वह तो आसक्ति है। आसक्ति में से ये बखेड़े खड़े होती हैं सारे। और लोग समझते हैं कि, प्रेम से यह जगत् खड़ा रहा है। पर प्रेम से यह जगत् खड़ा नहीं रहा है, बैर से खड़ा रहा है। प्रेम का फाउन्डेशन ही नहीं है। यह बैर के फाउन्डेशन पर खड़ा रहा है, फाउन्डेशन ही बैर के हैं।
जब किसी व्यक्ति के प्रति अत्यधिक आसक्ति हो फिर उसका प्रेम में तिरस्कार हो, तब वह आसक्ति अत्यधिक द्वेष में बदल जाती है और सामने वाला व्यक्ति बैर का हिसाब बांधता है। कई बार हम यह क़िस्से सुनते हैं कि, शादी के चार साल बाद पति-पत्नी अलग हो गए, कोर्ट में केस चलता है, पत्नी बच्चे को लेकर चली जाती है, प्रॉपर्टी में हिस्सा माँगती है और पति को पूरी ज़िन्दगी भरण-पोषण के पैसे देने पड़ते हैं। ऐसे अनेक तरीकों से द्वेष के हिसाब पूरे होते हैं।
हम एक-दूसरे के प्रति आकर्षण को ही प्रेम मान बैठते हैं। लेकिन परम पूज्य दादा भगवान आकर्षण के पीछे का विज्ञान समझाते हुए कहते हैं कि आकर्षण वह प्रेम नहीं है।
जैसे सोलर पैनल के फोटोसेल पर सूरज की किरण पड़ने से बिजली (इलेक्ट्रिसिटी) उत्पन्न होती है, जैसे लौह चुंबक से लोहे की पिन आकर्षित होती है, वैसे ही मनुष्यों में भी एक जैसे परमाणु वालों के आपस में मिलने से आकर्षण होता है। कैसा भी लौह चुंबक क्यों ना हो, वह तांबे और पीतल को नहीं खींचता, सिर्फ़ लोहे को ही खींचता है। वैसे ही, हमें भी कुछ ही व्यक्तियों के प्रति आकर्षण होता है, हर किसी के प्रति नहीं होता।
परम पूज्य दादा भगवान कहते हैं, "मेल खाते परमाणु आएँ, वहाँ यह देह खिंच जाती है। नहीं तो अपनी इच्छा न हो, तब भी यह देह कैसे खिंच जाए? यह देह खिंच जाती है, उसे इस जगत् के लोग कहते हैं, ‘मुझे इस पर बहुत राग है।’ हम पूछें, ‘अरे, तेरी इच्छा खिंचने की है?’ तो वे कहेंगे, ‘ना, मेरी इच्छा नहीं है, तब भी खिंच जाता है।’ तो फिर यह राग नहीं है। यह तो आकर्षण का गुण है।“
और नियम यह है कि, जहाँ आकर्षण होता है, वहाँ विकर्षण होता ही है। जहाँ बहुत प्रेम होता है, वहीं अरूचि होती है, यह मानव स्वभाव है। परम पूज्य दादा भगवान कहते हैं, "व्यवहार में अभेदता रहे, उसका भी कारण होता है। वह तो परमाणु और आसक्ति के गुण हैं, पर उसमें कौन से क्षण क्या होगा वह कहा नहीं जा सकता। जब तक परमाणु मेल खाते हों, तब तक आकर्षण रहता है, उसके कारण अभेदता रहती है। और परमाणु मेल न खाएँ तो विकर्षण होता है और बैर होता है।“
शुरुआत में जब समान परमाणु मिलते हैं, तब सब एक जैसा लगता है। इसलिए, राग से एक-दूसरे के साथ अटैच होते हैं। लेकिन फिर समय के साथ परमाणु बदलते हैं। इसलिए, राग में से द्वेष उत्पन्न होता है और फिर अलग हो जाते हैं। गर्लफ्रेंड-बॉयफ्रेंड या हसबंड-वाइफ कुछ वर्षों तक साथ रहते हैं और सब कुछ अच्छा चलता है। फिर धीरे-धीरे विवाद शुरू होने लगता है। राग में से द्वेष होता है और फिर झगड़े होते हैं। इसलिए, आकर्षण वह आसक्ति है, प्रेम नहीं।
जैसे थर्मामीटर का पारा शरीर का तापमान 97 दिखाए, तो वह बिलो नॉर्मल कहलाता है और 99 दिखाए तो वह अबॉव नॉर्मल कहलाता है। 98 नॉर्मल कहलाता है। पारा इसके ऊपर जाए तो बुखार आया है, ऐसा कहते हैं। वैसे ही, प्रेम के लिए परम पूज्य दादाश्री कहते हैं, “आसक्ति तो अबॉव नॉर्मल और बिलो नॉर्मल भी हो सकती है। प्रेम नॉर्मेलिटी में होता है, एक सरीखा ही होता है, उसमें किसी भी प्रकार का बदलाव होता ही नहीं।“
1) जगत् के लोग प्रेम कहते हैं वह भ्रांति भाषा की बात है, छलने की बात है। अलौकिक प्रेम की हूंफ (संरक्षण, आश्रय) तो बहुत अलग ही होती है। प्रेम तो सबसे बड़ी वस्तु है।
2) राग, वह पौद्गलिक वस्तु है और प्रेम, वह सच्ची वस्तु है। अब प्रेम कैसा होना चाहिए? कि बढ़े नहीं, घटे नहीं, उसका नाम प्रेम कहलाता है। और बढ़े-घटे वह राग कहलाता है। इसलिए राग में और प्रेम में फर्क ऐसा है कि वह एकदम बढ़ जाए तो उसे राग कहते हैं, इसलिए फँसा फिर। यदि प्रेम बढ़ जाए तो राग में परिणमित होता है। प्रेम उतर जाए तो द्वेष में परिणमित होता है। इसलिए उसका नाम प्रेम कहलाता ही नहीं न! वह तो आकर्षण और विकर्षण है। इसलिए अपने लोग जिसे प्रेम कहते हैं, उसे भगवान आकर्षण कहते हैं।
3) मोह मतलब यूज़लेस जीवन। वह तो अंधे होने के बराबर है। अंधा व्यक्ति कीड़े की तरह घूमता है और मार खाता है, उसके जैसा। और प्रेम तो टिकाऊ होता है। उसमें तो सारी ज़िन्दगी का सुख चाहिए होता है। वह तात्कालिक सुख ढूंढे ऐसा नहीं न!
4) आसक्ति निकालने से जाती नहीं। क्योंकि इस लोहचुंबक और आलपिन दोनों को आसक्ति जो है, वह जाती नहीं। उसी प्रकार ये मनुष्यों की आसक्ति जाती नहीं। कम होती है, परिमाण कम होता है पर जाता नहीं।
5) सामनेवाला व्यक्ति किस प्रकार आत्यंतिक कल्याण को पाए, निरंतर उसी लक्ष्य के कारण यह प्रेम, यह करुणा फलित होती हुई दिखती है। जगत् ने देखा नहीं, सुना नहीं, श्रद्धा में नहीं आया, अनुभव नहीं किया, ऐसा परमात्म प्रेम प्रत्यक्ष में प्राप्त करना हो तो प्रेमस्वरूप प्रत्यक्ष ज्ञानी की ही भजना करनी।
Book Name: प्रेम (Page #38 Paragraph #2 & #3)
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