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हिंसा के जोखिम कहाँ-कहाँ हैं?

परम पूज्य दादा भगवान कुदरत का सिद्धांत समझाते हुए कहते हैं कि, जो जीव आप बना सकते हो, उसे मारने का अधिकार है। आप यदि बना नहीं सकते हो, यदि आप ‘क्रियेट’ नहीं कर सकते हो तो मारने का आपको अधिकार नहीं है। यह कुर्सी आप बनाते हो, उस कुर्सी को तोड़ सकते हो, कप-प्लेट बनाओ तो तोड़ सकते हो, पर जो बनाया नहीं जा सकता, उन्हें मारने का आपको अधिकार नहीं है।“  इतने एक ही वाक्य में, वे आहार के लिए मनुष्य के अधिकार की सीमा रेखा खींच देते हैं। इस सीमा रेखा के बाहर होने वाली हिंसा की जोखिमदारी ज़रूर आती है।

हिंसा से खुद पर ही दुःख पड़ते हैं

परम पूज्य दादा भगवान कहते हैं कि, हिंसा जैसी कोई निर्बलता नहीं हैं। संसार के सभी दुःख हिंसा से ही हैं।

हिंसा के बड़े जोखिमों को परम पूज्य दादाश्री हमें एक ही वाक्य में नीचे सपष्ट कर देते हैं।

प्रश्नकर्ता: लोग हिंसा की तरफ बहुत जा रहे हैं, तो अहिंसा की तरफ मोड़ने के लिए क्या करना चाहिए?

दादाश्री: हमें उन्हें समझाना चाहिए। समझाएँ तो अहिंसा की तरफ मुड़ेंगे कि ‘भाई, इसमें, ये जीवमात्र में भगवान रहे हुए हैं। इसलिए आप जीवों को मारोगे तो उन्हें बहुत दु:ख होगा, उसका आपको दोष लगेगा और उससे आपको आवरण आएँगे और भयंकर अधोगति में जाना पड़ेगा।’ ऐसा समझाएँ तो ढंग से चलेंगे। जीवहिंसा से तो बुद्धि भी बिगड़ जाती है। ऐसा किसी को समझाते हो?

मन, वचन और काया से किसी भी जीव को दुःख देने से दो दोष लगते हैं। पहला, सामने वाले को दुःख देने के कारण आत्मा के ऊपर आवरण आ जाता है और दूसरा, बुद्धि का प्रकाश कम हो जाता है। जैसे चश्मे पर दाग हो या गाड़ी के काँच पर चिकनाहट आ जाए, तो ठीक से दिखाई नहीं देता। फिर काँच को साफ करते हैं, तो देखने में सुविधा होती है। उसी तरह, अगर आत्मा पर आवरण आ जाए, तो बुद्धि का प्रकाश कम हो जाता है।

हिंसा से दूसरों को दुःख देने या नुकसान पहुँचाने वाला व्यक्ति कभी खुद सुखी दिखाई नहीं देता, उसके चेहरे पर तेज़ नहीं होता। क्योंकि, सभी जीवों के भीतर आत्मा है, भीतर भगवान बैठे हैं। अगर उन्हें दुःख देते हैं, तो रिएक्शन में हमें भी दुःख उत्पन्न होगा।

फोड़े जैसे चमड़ी के रोगों अथवा निमोनिया जैसे रोग, जिसमें कुछ दिनों में मनुष्य खत्म हो जाता हैं, ये सभी रोग जीवों की हिंसा की हो, उन्हें दुःख दिया हो, उसके बदले में आते हैं। अगर हमने किसी बिल्ली या कुत्ते जैसे प्राणी को मारा हो, वह मरते-मरते बच गया हो, लेकिन हमें उसके बदले में दया या पछतावा न हुआ हो, तो उसके परिणाम स्वरूप हमारे शरीर में असाध्य रोग उत्पन्न हो जाते हैं।

हिंसा का फल भोगने के लिए अधोगति में भी जाना पड़ता है, जहाँ भयंकर दुःख पड़ते हैंI

जानबूझकर की गई हिंसा का फल अधिक दुःखदायी

हमसे जाने या अनजाने में जीवों की हिंसा हो जाती है। इन दोनों में से जानबूझकर की गई हिंसा का फल अधिक दुःखदायी होता है।

उदाहरण के तौर पर, दो मित्र रास्ते से गुजर रहे हैं। रास्ते में दो तिलचट्टे चल रहे हों। एक मित्र का पैर गलती से एक तिलचट्टे पर पड़ जाता है। दूसरा मित्र यह देखता है और उसे इतनी चिढ़ होती है, कि वह अपने जूते से कुचल-कुचलकर दूसरे तिलचट्टे को मार डालता है।

अब दो तिलचट्टे मरे, वे क्रिया तो समान ही हुई। लेकिन दोनों का पाप कर्म एक समान नहीं बंधता। उसका फल कैसा आ सकता है, इसका भी एक उदाहरण ही लेते हैं। मान लीजिए कि, अगले जन्म में दोनों एक ही माँ के दो बेटे के रूप में जन्म लेते हैं। जिसने कुचलकर तिलचट्टे को मारा था, वह बड़ा बेटा करीब पाँच साल का होता है और जिसने गलती से तिलचट्टे को मारा था, वह छोटा बेटा छह महीने का होता है। अब उस समय दोनों की माँ गुजर जाती है।

दोनों भाइयों को हिंसा का फल एक तरह से तो समान मिलता है, कि उनकी की माँ की मृत्यु हो जाती है। लेकिन फ़र्क उनके दुःख में आता है। जिसने तिलचट्टे को कुचलकर मारा था, उस बड़े बेटे को माँ के गुजर जाने की समझ होती है। इसलिए उसे रो-रोकर इस फल को भुगतना पड़ता है। जबकि, छोटे बेटे को कुछ पता ही नहीं होता, इसलिए उसे ज़्यादा दुःख नहीं होता।

संक्षेप में, हिंसा के फल में दुःख तो भुगतना ही पड़ता है। लेकिन जानबूझकर की गई हिंसा का फल, जानबूझकर भुगतना पड़ता है और अनजाने में की गई हिंसा का फल, अनजाने में भुगतना पड़ता है।

सामने वाले के दुःख के आधार पर हिंसा का जोखिम

किसी भी जीव को मारें, उसमें सामने वाले को कितना दुःख का भोगवटा आता है, उसके आधार पर हिंसा करने वाले का पाप कर्म बंधता है। जैसे, घास काटा उसका कम पाप बंधता है, लेकिन उससे ज़्यादा मच्छर को मारने से पाप बंधता है। जबकि, इससे भी अधिक पाप किसी चार पैर वाले प्राणी को मारने में हैं और सबसे ज़्यादा पाप मनुष्य को मारने से बंधता है।

इसलिए, मनुष्य को दुःख नहीं पहुँचाना चाहिए। यहाँ आशय यह है कि, अहिंसा के मार्ग पर सूक्ष्म बातों में उलझकर कहीं बड़ा न छूट जाए। एकेन्द्रिय जीवों की हिंसा में कम पाप है, ऐसा सोचकर अंधाधुंध पेड़-पौधे नहीं काटने चाहिए। लेकिन ज़्यादा जोखिम मनुष्यों को दुःख देने में है। क्योंकि किसी व्यक्ति पर गुस्सा करें, चिढें तो सामने वाले के अहंकार को ठेस पहुँचती है। उसे बहुत दुःख और भोगवटा होता है।

हिंसा से बैर बंधता है

किसी भी जीव को मारने का भाव किया, यानी पहले भीतर सूक्ष्म दोष होता है, जिससे खुद को ही दुःख होता है। ऊपर से सामने वाला जीव वैर बांधता है, उसका भी जोखिम उत्पन्न हो जाता है।

परम पूज्य दादा भगवान कहते हैं कि, ”आपने जो कर्म बांधे हैं, वे कर्म चुकाने के लिए उसके पास सभी साधन तैयार हैं। इसलिए, यदि आपको इस जगत् में इन दुखों में से मुक्त होना हो, तो कोई आपको दुःख दे पर आपको सामने दुःख नहीं देना चाहिए। नहीं तो थोड़ा भी दुःख दोगे तो अगले जन्म में वह साँपिन होकर काटेगी, सारे हज़ारों तरह से बैर बसूले बिना रहेगी नहीं। इस दुनिया में थोड़ा भी बैर बढ़ाने जैसा नहीं है। फिर यह दु:ख आते हैं, वह सब उपाधि करी किसी को दुःख दिए उसके ही दुःख आते हैं न! नहीं तो दुःख होता ही नहीं दुनिया में।“

हिंसा से कैसा बैर बंधता है, इसे हम महावीर भगवान की एक कथा से समझते हैं।

भगवान महावीर ने त्रिपृष्ठ राजा के अवतार में दरबान के कान में सीसा डाला था। क्योंकि, सूचना देने के बावजूद, संगीत की तान में मशग़ूल दरबान ने राजा के सो जाने के बाद संगीत बंद नहीं करवाया। राजा आवाज़ से जाग गए, उनका क्रोध भड़क उठा और उसके कान में गरम सीसा डलवा दिया, जिससे दरबान की अत्यंत पीड़ा में मृत्यु हो गई। राजा ने द्वेषपूर्वक और अहंकार के कारण यह कर्म किया था, और उसके फलस्वरूप उन्हें नरक में जाना पड़ा। लेकिन उस जीव ने जो बैर बांधा था, वह ठेठ भगवान महावीर के अवतार में उसने वसूल किया। ग्वाला के रूप में जन्मे उस दरबान के जीव ने, ध्यान में खड़े महावीर भगवान से अपनी गायों का देखभाल करने के लिए कहा और वह वहाँ से किसी काम के लिए निकल गया। लेकिन वीतराग भगवान तो ध्यान में लीन थे। गायें इधर-उधर हो गईं। ग्वाले को आकर गायें दिखीं नहीं, इसलिए क्रोध के आवेश में उसने भगवान के कान में नुकीली लकड़ी ठोंक दी, जो कई दिनों तक भगवान के कान में पीड़ा देती रहीं। वैद्य ने जब यह लकड़ी उनके कान से निकाली, तब भगवान की भी पीड़ा से चीख निकल गई थी। इसलिए जीव को दुःख देने का फल दो तरह से मिलता है, एक पाप कर्म भोगना पड़ता है और दूसरा सामने वाला जीव बैर वसूल करता है। खुद भगवान भी इस बैर से निकल नहीं सकते।

हिंसा का विरोध न करने में अनुमोदना का जोखिम

अगर हमारे आसपास मूक प्राणियों की हत्या हो रही हो, उनके प्रति क्रूरता बरती जा रही हो, तो उसका विरोध करना चाहिए। हिंसा हो रही हो और उसे रोकने का प्रयास न करें या उसका विरोध न करें, तो ये हिंसा को अनुमोदना दी कहा जाएगा। इसका कितना जोखम आता है, यह हमें यहाँ परम पूज्य दादाश्री के साथ हुए प्रश्नोत्तरी सत्संग से मिलता है।

प्रश्नकर्ता: परन्तु उस सूक्ष्म हिंसा को ही महत्त्व देकर बड़ी द्रव्यहिंसा, गूंगे प्राणियों के प्रति क्रूरता, हत्या और उनके शोषण से या हिंसा से प्राप्त की गई सामग्रियाँ उपयोग करना या उन्हें प्रोत्साहन देकर बड़ी हिंसा के प्रति उदासीनता रखी जाए तो वह उचित माना जाएगा?

दादाश्री: वह उचित नहीं माना जाएगा। उसका विरोध तो होना ही चाहिए। विरोध नहीं तो आप उसकी अनुमोदना कर रहे हो, दो में से एक जगह पर हो। यदि विरोध नहीं होता तो अनुमोदना करते हो। इसीलिए चाहे जो हो या ज्ञानी हो, परन्तु उन्हें विरोध प्रदर्शित करने की ज़रूरत है। नहीं तो अनुमोदना में चले जाएँगे।

प्रश्नकर्ता: हिंसा करनेवाला कोई भी पशु-पक्षी या चाहे जो हो, तो उनके उदय में हिंसा आई हुई होती है, तो उसे रोकने के लिए हम निमित्त बन सकते हैं?

दादाश्री: चाहे जिनके उदय में वह आया हो और आप यदि रोकने के निमित्त नहीं बनो ,तो आप हिंसा की अनुमोदना करते हो। इसलिए आपको रोकने का प्रयत्न करना चाहिए। और चाहे जो उदय हो, परन्तु आपको तो रोकने का प्रयत्न करना ही चाहिए।

जैसे रास्ते में कोई जा रहा हो और उसके कर्म के उदय से वह टकराया और पैर में चोट लग गई, और आप वहाँ से जा रहे हों, तो आपको उतरकर और अपने कपड़े से उसे पट्टा बाँधना चाहिए। गाड़ी में ले जाकर रख आना चाहिए। भले उसके कर्म के उदय से ऐसा हुआ हो, पर आपके भाव बताने चाहिए। नहीं तो आप उसके विरोधी भाव से बंध जाओगे और मुक्त नहीं हो पाओगे। यह जगत् ऐसा नहीं कि मुक्त कर सके।

प्रश्नकर्ता: अध्यात्म में रुचि रखनेवाले के लिए हिंसा रोकने का प्रयत्न करना ज़रूरी माना जाता है क्या? यदि ज़रूरी होता हो तो उस बारे में आप मार्गदर्शन उपदेश सलाह देंगे?

दादाश्री: अध्यात्म में रुचि रखते हों और हिंसा रोकने का प्रयत्न नहीं करें, वे तो हिंसा की प्रेरणा की कहलाएगी। हिंसा रोकने के प्रयत्न न करें, तो हिंसा की अनुमोदना की कहलाएगी। इसलिए चाहे जो अध्यात्म हो, परन्तु हिंसा रोकने का प्रयत्न तो होना ही चाहिए।

प्रश्नकर्ता: ऐसे संयोगों में बड़ी द्रव्यहिंसा का निवारण किसलिए नहीं सूझता होगा?

दादाश्री: उस द्रव्यहिंसा के निवारण की खास ज़रूरत है। उसके लिए हम दूसरे प्रयत्न करें, अच्छी तरह सभी इकट्ठे होकर और मंडल की रचना करें और गवर्नमेन्ट में भी अपने चुने हुए व्यक्तियों को भेजें तो बहुत फल मिलेगा। सभी को भाव करने की ज़रूरत है, और मज़बूत भाव करने की ज़रूरत है, प्रोत्साहन देने की ज़रूरत है।

प्रश्नकर्ता: परन्तु दादा, आख़िर में तो यह सब हिसाब ही है न?

दादाश्री: हाँ, हिसाब है। पर उसे हिसाब कहना है तो वह हो जाने के बाद कहलाएगा। हिसाब कहें तो सब बिगड़ जाएगा। हमारे गाँव में साधु-बाबा आते हों और बच्चों को उठाकर ले जाते हों तब हम कहते हैं न कि पकड़ो इन लोगों को और रोक दो! इसलिए जैसे खुद के बच्चे को कोई ले जाए, उठा जाए तो कितना दुःख होगा? उसी तरह ये गायें-भैंसें वे सब कटते हैं, उनके लिए मन में बहुत ही दुःख रहना चाहिए, और उनके सामने विरोध होना चाहिए। नहीं तो वह काम सफल ही नहीं होगा न! बैठे रहने की ज़रूरत ही नहीं। उसे कर्म का उदय मानें, पर भगवान भी ऐसा नहीं मानते थे। भगवान भी विरोध प्रदर्शित करते थे। इसलिए हमें विरोध प्रदर्शित करना चाहिए, एकता सर्जित करनी चाहिए और उसका सामना करना चाहिए। इसमें तो कोई हिंसा के विरोधी नहीं हैं, पर अहिंसक भाव है यह तो!

हिंसा में भाव के अनुसार जोखिमदारी

हिंसा को रोकने के लिए हम उसका विरोध दर्शाते हैं, लेकिन कुछ कार्यों में हिंसा अनिवार्य होती है। ऐसे हिंसा के कार्य में, करने वाले और करवाने वाले दोनों पर जोखिमदारी आती है। उस समय, अगर हिंसा की जोखिमदारी से बचना हो, तो अपना भाव हिंसा के विरोध में रखना चाहिए। क्योंकि, हमारा भाव कैसा है, उसी के आधार पर कर्म बंधता है।

मान लीजिए, हमारे अवासीय क्षेत्र में मक्खी-मच्छर का बहुत उपद्रव हो, तो नगर पालिका वाले आकर सभी जगह दवा का छिड़काव करते हैं, जिससे मक्खी-मच्छर मर जाते हैं। इस क्रिया का दोष तो बंधता है। तब हमें सोचना चाहिए कि, जैसे मनुष्यों पर बम-गोले गिराते हैं, वैसे ही इन जीव-जंतुओं पर दवा छिड़कते हैं, तब उन्हें भी वैसा ही होता होगा। इसलिए, जब नगर पालिका के लोगों को ऐसा करना पड़े, तब हमें हमारे मन में ऐसा भाव रखना चाहिए कि, “ऐसा नहीं होना चाहिए।“

इसमें नगर पालिका के लोग तो काम करने वाले हैं। उन्हें यह कार्य कौन करवा रहा है? जो सत्ता में होते हैं, वे ‍ऑफिसर्स। तो यह करवाने वाले को अधिक दोष लगता है। उसमें भी, अगर हमने निवासी के रूप में शिकायत करके नोटिस लिखवाई हो, जिससे इन लोगों को यह करना पड़ा हो, तो हम पर भी इसकी जोखिमदारी आती है। ऐसे संयोगों में खुद जिस भी भूमिका में हो, उन्हें अगर हिंसा नही करनी हो तो  कहना चाहिए कि, भाई, मुझे यह नहीं चाहिए। मुझे यह अच्छा नहीं लगता।” तो फिर खुद की जवाबदारी नहीं रहती। जिसे यह कार्य करवाना पसंद है, उसकी जवाबदारी होती है।

मान लीजिए, पानी की टंकी में कोई चूहा या कबूतर मर गया हो, तो उसे निकलवाकर और टंकी साफ़ करवाकर दवा छिड़कवाएँ, तो यह अनिवार्य कार्य हैI यह करना पड़ता है और उसमें करने वाले और करवाने वाले दोनों को दोष बंधता है। लेकिन हमें भाव नहीं रखना चाहिए। हमें हमारा अभिप्राय तो किसी जीव की हिंसा न हो उसमें ही रखना चाहिए।

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