भगवद् गीता के पाँचवें अध्याय में श्रीकृष्ण भगवान ने मोक्ष के दो मार्ग बताए हैं। एक है संन्यास और दूसरा है निष्काम कर्मयोग।
संन्यासः कर्मयोगश्च नि:श्रेयसकरावुभौ ।
तयोस्तु कर्मसंन्यासात्कर्मयोगो विशिष्यते ॥२॥
अर्थात् कर्मसंन्यास और कर्मयोग ये दोनों मार्ग परम लक्ष्य की ओर ले जाते हैं। परंतु कर्मसंन्यास की अपेक्षा कर्मयोग अधिक श्रेष्ठ है। हम यहाँ संन्यास और निष्काम कर्म दोनों को यथार्थ रूप से समझेंगे।
लौकिक जगत् में कपड़े बदलकर भगवा धारण करना, घर-परिवार का त्याग करना और परिग्रह छोड़ देना इसे संन्यास लिया है ऐसा कहा जाता है। लेकिन श्रीकृष्ण भगवान ने भगवद् गीता में जो कहा है, उसके अनुसार संसार के त्याग को वास्तव में संन्यास नहीं कहा जाता। श्रीकृष्ण भगवान द्वारा कहे गए संन्यास शब्द का अर्थ बहुत ऊँचा है।
परम पूज्य दादा भगवान ने श्रीकृष्ण भगवान के हृदय की बात समझाते हुए कहा है कि, “संन्यास मतलब न्यास लेना, मन-वचन-काया में से, सब तरफ से आत्मा खींचकर आत्मा में रख दे, उसे संन्यास कहते हैं।” वे संन्यास का सच्चा अर्थ बताते हुए कहते हैं कि आत्मा को आत्मा में ही रखना वही संन्यस्त योग है। आगे बढ़कर परम पूज्य दादाश्री ऐसा भी कहते हैं कि, “सभी क्रियाओं में 'मैं करता हूँ' ऐसा भान नहीं रहे, वह संन्यस्त योग है और वही संन्यासी कहलाता है!”
अर्थात्, जो मनुष्य शरीर में न रहता हो, इतना ही नहीं, बल्कि शरीर के साथ-साथ पाँच इन्द्रियों, मन-बुद्धि-चित्त-अहंकार सभी जगहों से “मैं यह स्वरूप नहीं, मैं आत्मा स्वरूप हूँ’ ऐसे न्यास लेकर खुद आत्मा में आ जाता है तो वह सच्चा संन्यासी कहलाता है। सच्चा संन्यासी विचार-वाणी-वर्तन के संयोगों में भी “मैं यह वाणी बोलता ही नहीं; मैं विचार करता ही नहीं; शरीर कार्य करता है लेकिन मैं इसमें हूँ ही नहीं, मैं आत्मा में हूँ।” ऐसे सदैव आत्मा में रहता है।
जैसे कोई व्यक्ति खेत में हो तो वह घर में नहीं है ऐसा कहा जाएगा, और जब घर में हो तो खेत में नहीं है ऐसा कहा जाएगा; उसी तरह जब तक आत्मा का ज्ञान न हो, तब तक खुद आत्मा में नहीं रह सकता और तब तक सच्चा संन्यासी नहीं कहलाता। संपूर्ण संन्यासी अर्थात् धर्म-संन्यास। धर्म संन्यासी निरंतर आत्मा में ही रहता है।
भगवद् गीता के पाँचवें अध्याय के तीसरे श्लोक में श्रीकृष्ण भगवान ने सच्चे संन्यासी के दूसरे लक्षण बताए हैं।
ज्ञेयः स नित्यसंन्यासी यो न द्वेष्टि न कांक्षति ।
निर्द्वंद्वो हि महाबाहो सुखं बन्धात्प्रमुच्यते ॥३॥
अर्थात्, जिसे कभी द्वेष नहीं होता, आकांक्षाएँ नहीं होती, उसे नित्य संन्यासी जाना चाहिए। जो (राग-द्वेष जैसे) सभी द्वंद्वों से रहित है, वह निश्चित रूप से सुख से बंधन मुक्त होता है।
परम पूज्य दादाश्री भी संन्यासियों के इन लक्षणों का समर्थन करते हैं। वे समझाते हैं कि, श्रीकृष्ण भगवान ने कहा था उसके अनुसार, जिस मनुष्य में नीचे के तीन गुण हों, वह सच्चा संन्यासी कहलाता है, फिर वह गृहस्थ हो, त्यागी हो या अन्य कोई भी हो।
१. कर्तृत्व का अभिमान नहीं हो।
२. आसक्ति नहीं हो।
३. कामना नहीं हो।
भगवद् गीता के दूसरे अध्याय में श्रीकृष्ण भगवान कहते हैं कि,
कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन ।
मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि ॥ ४७॥
अर्थात्, तुझे सिर्फ़ तेरे कर्म करने का ही अधिकार है, कर्म के फलों पर नहीं। तू कभी भी खुद को कर्मफल का कारण नहीं मानना और कर्म न करने के प्रति भी कभी आसक्त नहीं होना।
इस श्लोक का सामान्य रूप से जगत् में यह अर्थ व्याप्त हुआ है कि, निष्काम कर्म अर्थात् कर्म करना लेकिन फल की आशा नहीं रखना। जबकि श्रीकृष्ण भगवान ने वास्तव में जो कहा है, उसका गूह्य अर्थ समझने में लोगों को कठिनाई होती है।
परम पूज्य दादा भगवान अत्यंत सरल भाषा में निष्काम कर्म का स्पष्टीकरण करते हुए कहते हैं, “निष्काम योग तो लोग कहते हैं कि, 'काम कर, लेकिन फल की आशा मत रखना।' अरे, फल की आशा रखे बगैर तो घर से बाहर जीवजंतु भी नहीं जाते, फल की आशा रखे बगैर कोई काम ही नहीं करता। चप्पल की आशा रखे बगैर मोची के वहाँ कौन जाता है? फल की आशा के बगैर तो कोई काम करता ही नहीं। यदि पता चले कि, 'आज बाज़ार में सब्ज़ी नहीं मिलेगी', तो कोई सब्ज़ी लेने जाएगा ही नहीं। फिर भी ऐसा कहना पड़ता है कि, 'फल की आशा रखे बगैर तू काम कर।' इससे क्या होता है कि काम करते समय यह वाक्य चुभता है कि, 'भगवान ने तो फल की आशा रखे बगैर काम करने को कहा है।' इससे उसका फल अच्छा आता है। यदि फल की आशा रखे बिना काम करे तो लोग प्रगति करेंगे, लेकिन कृष्ण भगवान जो कहते हैं, उसे लोग समझे नहीं हैं। भगवान ने तो क्या कहा है कि, 'यदि तू सब्ज़ी लेने जाए तो सब्ज़ी की आशा रखना, लेकिन यदि सब्ज़ी लेने के बाद कड़वी निकले तो जो भी ले लिया गया, वही फल है। उसमें फल की आशा मत रखना, अर्थात् राग-द्वेष मत करना। जो हुआ उसे स्वीकार कर लेना।' यदि जेब कट जाए तो शांति रखना, उस पर विलाप मत करना। वहाँ पर समता रखना, राग-द्वेष मत करना। यहाँ से साड़ी लेने गए, इसलिए साड़ी की आशा तो होती ही है, लेकिन फिर यदि साड़ी खराब निकले तो डिप्रेस मत होना। साड़ी भले ही कैसी भी निकले, जैसी निकली वह भले ही हो, वहाँ पर फल की आशा मत रखना, राग-द्वेष मत करना, ऐसा कहना चाहते हैं, बाकी, चप्पल की आशा रखे बगैर मोची के वहाँ कौन जाएगा? मोची के वहाँ जाना, लेकिन अच्छा या बुरा, प्रिय या अप्रिय की आशा मत रखना। अर्थात् प्रिय या अप्रिय की आशा नहीं रखना, वही निष्काम कर्म है।"
परम पूज्य दादाश्री के साथ निष्काम कर्म के विषय में हुए प्रश्नोत्तरी सत्संग में निष्काम कर्म की विस्तार पूर्वक विवेचना हुई है। निष्कामी किस तरह हुआ जा सकता है? इस प्रश्न के जवाब में परम पूज्य दादाश्री कहते हैं, “परिणाम का विचार किए बिना काम करते जाओ। साहब मुझे गुस्सा करेंगे, डाँटेंगे, ऐसे विचार किए बिना काम करे जाओ। परीक्षा देने का विचार किया हो तो फिर 'पास हुआ जाएगा या नहीं, पास हुआ जाएगा या नहीं' ऐसे विचार किए बिना परीक्षा देते जाओ।”
परम पूज्य दादाश्री दूसरा उदाहरण देते हुए कहते हैं कि, निष्काम कर्म किसे कहा जाता है? उदाहरण के तौर पर हमें हर महीने घर से, जमीन से और व्यापार से आमदनी होती है। अब मान लो कि हम यह सोचकर बैठे कि हर महीने बीस-पच्चीस हज़ार मिलेंगे, और फिर परिस्थिति बदलने पर पाँच हज़ार ही मिले, तो तब हमें बीस हज़ार की हानि हो गई हो ऐसा लगता है। लेकिन अगर हमने धारणा ही नहीं रखी हो तो? निष्काम कर्म अर्थात् उसके आगे के परिणाम की इच्छा किए बिना करते जाना।
परम पूज्य दादाश्री कहते हैं, “कृष्ण भगवान ने बहुत सुंदर चीज़ दी है, परन्तु किसीसे वह हो नहीं सकता न? मनुष्य का सामर्थ्य ही नहीं है न! इस निष्काम कर्म को यथार्थ रूप से समझना मुश्किल है। इसीलिए तो कृष्ण भगवान ने कहा था कि मेरी गीता का सूक्ष्मतम अर्थ समझनेवाला कोई एकाध ही होगा!”
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