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भूल किसकी? डॉक्टर या रोगी की?

डॉक्टर ने मरीज़ को इन्जेक्शन दिया और डॉक्टर घर जाकर चैन से सो गया। लेकिन मरीज़ को तो सारी रात इन्जेक्शन का दर्द रहा। तो इसमें भूल किसकी? मरीज़ की! और डॉक्टर तो जब भुगतेगा, तब उसकी भूल पकड़ी जाएगी।

बेटी के लिए डॉक्टर बुलाएँ और वह आकर देखे कि नब्ज़ नहीं चल रही हैं, तब डॉक्टर क्या कहेगा? 'मुझे क्यों बुलाया?' अरे, तूने हाथ लगाया उसी वक्त गई, वर्ना नब्ज़ तो चल रही थी। लेकिन डॉक्टर फीस के दस रुपये ले जाता है और ऊपर से डाँटता भी है। 'अरे, डाँटना हो तो पैसे मत लेना और पैसे लेने हों तो डाँटना मत।' लेकिन नहीं, फीस तो लेगा ही। तब पैसे देने पड़ते हैं। ऐसा जगत् है। इसलिए इस काल में न्याय मत ढूँढना।

प्रश्नकर्ता : ऐसा भी होता है कि मुझसे दवाई ले और मुझे ही डाँटे।

दादाश्री : हाँ, ऐसा भी होता है। फिर भी सामनेवाले को गुनहगार मानोगे तो आप गुनहगार बनोगे। अभी कुदरत न्याय ही कर रही है।

ऑपरेशन करते समय मरीज़ मर गया तो भूल किसकी?

चिकनी मिट्टी में बूट पहनकर चले और फिसल जाए तो उसमें दोष किसका? भाई, तेरा ही! यह समझ नहीं थी कि नंगे पैर घूमते तो उँगलियों की पकड़ रहती और नहीं गिरते? इसमें किसका दोष? मिट्टी का, बूट का या तेरा?! भुगते उसी की भूल! इतना ही पूर्ण रूप से समझ में आ जाए तो भी वह मोक्ष में ले जाए। यह जो दूसरों की भूल देखते हैं, वह तो बिल्कुल गलत है। खुद की भूल से ही निमित्त मिलता है। यह तो जीवित निमित्त मिले तो उसे काटने दौड़ता है और अगर काँटा लगा हो तो क्या करेगा? चौराहे पर काँटा पड़ा हो, हज़ारों लोग गुज़र जाएँ फिर भी किसीको नहीं चुभता, लेकिन चंदूभाई निकले कि काँटा उसके पैर में चुभ जाता है। 'व्यवस्थित शक्ति' तो कैसा है? जिसे काँटा लगना हो उसी को लगेगा। सभी संयोग इकट्ठा कर देगा, लेकिन उसमें निमित्त का क्या दोष?

यदि कोई आदमी दवाई छिड़ककर खाँसी करवाए तो उसके लिए तकरार हो जाती है, लेकिन जब मिर्च के छौंक से खाँसी आए, तब क्या तकरार होती है? यह तो जो पकड़ा जाए, उसीसे लड़ते हैं। निमित्त को काटने दौड़ते हैं। लेकिन यदि हकीकत जानें कि करनेवाला कौन और किससे होता है, तब फिर क्या कुछ झंझट रहेगा? तीर चलानेवाले की भूल नहीं है, जिसे तीर लगा, उसकी भूल है। तीर चलानेवाला तो जब पकड़ा जाएगा, तब उसकी भूल। अभी तो जिसे तीर लगा, वह पकड़ा गया। जो पकड़ा गया, वह पहला गुनहगार और दूसरा तो जब पकड़ा जाएगा, तब उसकी भूल।

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