किन संयोगों में हमें अंडरहैंड पर क्रोध आ जाता है और तब हमें कैसा व्यवहार करना चाहिए, यह परम पूज्य दादा भगवान एक मालिक और नौकर के सुंदर उदाहरण के साथ हमें समझाते हैं। इस उदाहरण में मालिक की जगह कोई भी ऊपरी व्यक्ति और नौकर की जगह हाथ के नीचे काम करने वाला कोई भी व्यक्ति हो सकता है।
एक नौकर चाय के कपों से भरी ट्रे लेकर आ रहा हो और अचानक लड़खड़ाकर गिर जाए और चाय के कप फूट जाएँ, तब सेठ का मानो आत्मा ही फूट गया हो, उतना क्लेश और बेचैनी हो जाती है। उस समय क्या होता है, इसका हूबहू वर्णन परम पूज्य दादाश्री यहाँ कर रहें हैं।
दादाश्री: प्याले फूट जाएँ, तब भी कढ़ापा होता है। नौकर को गालियाँ देता है कि, ‘तेरे हाथ टूटे हुए हैं, तेरे ऐसे टूटे हुए हैं।’ उस घड़ी यदि ऐसा सोचे कि, ‘मैं इसकी जगह पर होऊँ तो मेरी क्या दशा होगी? मुझे कितना दु:ख होगा?’ कोई ऐसा सोचता है? नौकर के मन में क्या होता है कि, ‘यह सेठ मुझे बिना बात के डाँट रहा है, मेरा गुनाह नहीं है। मैं तो नौकर हूँ और नौकरी कर रहा हूँ, इसलिए मुझे डाँट रहा है।’ बेचारे को ऐसा होता है। अत: ऐसे नासमझी से अमीर लोग गरीबों को दु:ख दे देते हैं, वर्ना नौकर कहीं प्याले फोड़ता होगा? यदि नौकर प्याले फोड़ सकता तो रोज़ ही फोड़ता। जब उससे हाथ में नहीं पकड़ा जाए, तभी टूटेगा न? इस वल्र्ड में कोई चीज़ कोई फोड़ता ही नहीं, यह तो सब आपका ही हिसाब चुक रहा है। उसमें नौकर तो बेचारा निमित्त बन जाता है।
लेकिन नौकर के हाथ से प्याले फूटते ही सेठानी शोर मचा देती है और यदि सेठ बैठे हुए हों न, तो वे भी अकुलाते (गुस्सा,चिढ़) रहते हैं। अरे, एक भागीदार अकुलाए तो बहुत हो गया, एक को ही अकुलाने दो न! सभी भागीदारों के अकुलाने का कारण क्या है? कंपनी में एक भागीदार अकुलाए कि बहुत हो गया! भले ही एक का बिगुल बजे! लेकिन सभी के बिगुल साथ में क्यों बजाएँ? सब क्यों बजाते होंगे? इच्छा नहीं हो तब भी बज जाता है, क्योंकि अज्ञान उसे जोड़ देता है न! और जब सभी बिगुल बजने लगें, तब वह नौकर तो काँप जाता है! जब सभी घेर लेते हैं तब वह बच्ची होती है न, वह भी किच-किच करती हुई आती है कि, ‘अरे, इस बेवकूफ को तो मारने जैसा है।’ तब फिर नौकर की क्या दशा होगी?
वे समझाते हैं कि, नौकर के हाथ में से गिरकर प्याले फूट जाए तो हमें उसे ऐसे कहना चाहिए कि, 'भाई, गरमागरम चाय तेरे पैर पर गिर गई, तो तू जल तो नहीं गया न?' तब उसे कितना अच्छा लगेगा? उसके घर पर भी कोई ऐसा आश्वासन नहीं दे वैसा आश्वासन देना, तो नौकर के मन में कितना अच्छा लगेगा?
हमारे हाथ के नीचे काम करने वाले लोगों से काम बिगड़ जाए, काम में भूल हो जाए या नुकसान हो जाए तब हम कड़क शब्दों में टोकते हैं या गुस्से में डांट देते हैं कि, "बेवकूफ ध्यान नहीं रखते!" तब सबसे पहले हमें ऐसा विचार आना चाहिए कि कोई हमारे साथ इस तरह से गुस्से में बात करें तो क्या हमें अच्छा लगेगा? यदि हमारे ऊपरी हमें प्रेम से समझाकर कहें तो हम काम करेंगे, या क्रोध करके कहे तो? हमें जिस तरह का व्यवहार पसंद है, उसी तरह का व्यवहार दूसरों के साथ करना मानवधर्म कहलाता है।
दादाश्री: यदि कोई हम पर गुस्सा करे तो हमसे सहन नहीं होता किन्तु सारा दिन दूसरों पर गुस्सा करते रहते हैं। अरे! यह कैसी अक्ल? यह मानव धर्म नहीं कहलाता। खुद पर यदि कोई ज़रा सा गुस्सा करे तो सहन नहीं कर सकता और वह खुद सारा दिन सब के ऊपर गुस्सा करता रहता है, क्योंकि वे दबे हुए हैं इसलिए ही न? दबे हुओं को मारना तो बहुत बड़ा अपराध कहलाता है। मारना हो तो ऊपरी (बॉस, वरिष्ठ मालिक) को मार! भगवान को अथवा ऊपरी को, क्योंकि वे आपके ऊपरी हैं, शक्तिमान हैं। यह तो अन्डरहैन्ड अशक्त है, इसलिए ज़िंदगीभर उसे झिड़काता रहता है। मैंने तो अन्डरहैन्ड चाहे कैसा भी गुनहगार रहा हो तो भी उसे बचाया है। पर ऊपरी तो चाहे कितना भी अच्छा हो, फिर भी मुझे ऊपरी रास नहीं आता है और मुझे किसी का ऊपरी नहीं होना है। अच्छा हो तो हमें हर्ज नहीं है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि वह हमेशा ऐसा ही रहेगा। एक ही बार ऐसा बोल दे कि हमें आधासीसी चढ़ जाए, ऊपरी किसे कहते हैं जो अंडरहैंड को संभाले! वही सच्चा ऊपरी है। मैं तो सच्चा ऊपरी खोजता हूँ। मेरे ऊपरी बनो, पर सच्चे ऊपरी बनो। हम डाँट खाने के लिए नहीं जन्में हैं! आप डाँटें क्या हम इसके लिए जन्मे हैं? ऐसा वह क्या दे देने वाला है?
और आपके यहाँ कोई नौकरी करता हो तो उसे कभी भी तिरस्कृत मत करना, छेड़ना मत। सभी को सम्मानपूर्वक रखना। क्या पता किसी से क्या लाभ हो जाए!
बाहर नाटकीय रूप से बॉस का व्यवहार पूरा करें, लेकिन अंदर से यह समझ हाज़िर रखें कि "इस अंडरहैंड के आधार पर ही मैं बॉस हूँ, उनके ऊपर क्रोध करने का मुझे अधिकार नहीं है।" सामनेवाले के साथ प्रेम से बात करेंगे तो काम ज़रूर होगा, चिढ़कर बात करने जाएँगे तो काम बिगड़ जाएगा।
कई बार ऑफिस में हमारे नीचे काम करने वाले लोग समय पर काम पूरा नहीं करते, उनसे कोई काम बिगड़ जाए या गलती हो जाए, तब हम उनके ऊपर गुस्सा हो जाते हैं। उस समय कौन सी समझ रखनी चाहिए ताकि क्रोध न आए?
हर काम के पीछे कुदरत के नियम होते हैं। निमित्त और संजोग मिलेंगे, सही समय आएगा तब काम पूरा हो जाएगा। यदि काम समय पर न हो पाए, तो किन संजोगों के कारण काम अटका है यह ढूँढ निकालना चाहिए। अधिकतर प्रत्येक काम बहुत सारे संजोगों पर आधारित होता है। एकाद संजोग न मिल रहे हों उससे भी काम अटका रहता है, इसमें व्यक्ति का दोष भी नहीं होता। हमें धीरज रखकर संजोग मिलें इसके लिए प्रार्थना करनी चाहिए और भाव बिगाड़े बगैर एडजस्टमेंट ले लेना चाहिए।
यह भी समझना चाहिए कि उस व्यक्ति की इच्छा नहीं है कि काम देर से हो। अगर काम देर से हुआ, तो हमें पता लगाना चाहिए कि पूरा क्यों नहीं हो रहा है? क्या काम करने वाले को समझ में नहीं आ रहा है, क्या अन्य कामों का दबाव है या उसे अधिक मदद की ज़रूरत है? प्रॉब्लम खड़ी हो तो व्यक्ति को दोषित देखने के बजाय, प्रॉब्लम के कारणों को ढूंढकर सोल्यूशन निकालना चाहिए। ऐसा करने से हमें काम में आने वाली प्रॉब्लम समझ में आएगी और उसका सोल्यूशन मिलेगा और काम करने वाले व्यक्ति की समझ विकसित होगी।
वैसे भी क्रोध करने से काम जल्दी पूरा नहीं होता। उल्टा, काम और डिस्टर्ब होता है, अंतराय पड़ते हैं और व्यक्ति के अहंकार को चोट पहुँचने से वह अड़ाई करता है, कि "अब नहीं करना, भले ही काम बिगड़े।" ऐसा करने की बजाय हमें अंडरहैंड के साथ एक मित्र की तरह व्यवहार करना चाहिए।
फिर भी ऐसा लगे कि लोग आलस कर रहे हैं और काम लंबा खिंच रहा है, तो हमें उन्हें अलग से बुलाकर समझाना चाहिए, कि "आपका काम लंबा खिंचेगा, इससे आगे कितने कामों या लोगों पर असर पड़ेगा और कंपनी को कितना नुकसान होगा।" दो-चार बार समझाने के बाद भी अगर काम पूरा नहीं होता है, तो प्रेम से कहना कि, "हमारे ऊपर आगे से दबाव आ रहा है। यदि इतना काम पूरा नहीं होगा, तो फिर हमें इच्छा ना होने के बावजूद भी ज़रूरी कदम उठाने पड़ेंगे।" इस तरह से, हो सके वहाँ तक गुस्सा किए बिना काम लेना चाहिए।
हमारे साथ काम करने वाले व्यक्ति को जब क्रोध से दुःख दे दिया जाए, तब उनके अंदर बैठे हुए भगवान से दिल से माफ़ी माँग लेनी चाहिए और फिर से क्रोध न हो ऐसा निश्चय करना चाहिए। हो सके तो, उनके पास जाकर बात को संभाल लेना चाहिए कि, "मेरे गुस्से से आपको बहुत दुःख हुआ, मैं माफ़ी माँगता हूँ।"
ऑफिस या बिजनेस में कभी-कभी हमें किसी व्यक्ति से सीधे माफ़ी माँगने में डर लगता है, कि सामने वाला उल्टा डबल सुना देगा या इसका दुरुपयोग करेगा तो? ऐसे में हमें क्या करना चाहिए, इसकी समझ हमें यहाँ परम पूज्य दादा भगवान दे रहे हैं।
मन में ही माफ़ी माँगो!
प्रश्नकर्ता: दादा जी, कई बार पश्चाताप या प्रतिक्रमण करते समय ऐसा होता है कि कोई भूल हो गई, किसी पर क्रोध आ गया, तब भीतर दु:ख होता है कि यह गलत हो गया लेकिन सामने वाले से माफी माँगने की हिम्मत नहीं होती।
दादाश्री: इस तरह से माफी माँगनी ही नहीं है, वर्ना फिर वे उसका दुरुपयोग करेंगे। ‘हाँ, अब आई न ठिकाने?’ ऐसा है यह! नोबल (खानदान) जाति नहीं है! ये लोग माफी माँगने लायक नहीं है! इसलिए उसके शुद्धात्मा को याद करके मन में ही माफी माँग लेना। हज़ारों में कोई दस आदमी ऐसे निकलेंगे कि माफी माँगने से पहले ही झुक जाएँ।
A. क्रोध यानि खुद अपने घर को माचिस से जलाना, जिसमें पहले खुद जलते हैं, फिर दूसरों को जलाते हैं। जैसे... Read More
A. अनंतानुबंधी क्रोध: क्रोध से सामनेवाले व्यक्ति को ऐसे शब्द सुना दिए जिससे सामनेवाले का मन ऐसा टूट... Read More
A. सूझ नहीं पड़े तब क्रोध यानी समझ का अभाव। परम पूज्य दादा भगवान कहते हैं कि, परिस्थिति का सामना... Read More
Q. क्रोध किस तरह से नुकसान करता है?
A. जैसे एक ट्रेन उसकी नॉर्मल गति में मोशन में चल रही हो तो दिक्कत नहीं आती, लेकिन उसकी नोर्मैलिटी चूके... Read More
Q. क्रोध पर काबू कैसे पाया जाए?
A. परम पूज्य दादाश्री कहते हैं कि, "वर्ल्ड में कोई भी मनुष्य क्रोध को नहीं जीत सकता।" क्रोध दो प्रकार... Read More
Q. क्रोध करे वह निर्बल या बलवान?
A. जीवन व्यवहार में ऐसा कहा जाता है कि कुछ जगहों पर तो क्रोध करने की ज़रूरत पड़ती है। क्रोध ना करें तो... Read More
Q. रिश्तों में क्रोध पर कैसे काबू पाएँ?
A. प्रश्नकर्ता : हम क्रोध किस पर करते हैं, ओफ़िस में सेक्रेटरी पर क्रोध नहीं करते और होस्पिटल में नर्स... Read More
Q. रिश्तों में क्रोध पर काबू कैसे पाएँ?
A. कोई हमारे ऊपर गुस्सा करे तो हमसे सहन होता है? हमारे ऊपर कोई गुस्सा करे वह हमें सहन नहीं होता हो और... Read More
Q. पति-पत्नी के संबंधों में क्रोध क्यों आता है?
A. पति-पत्नी में क्रोध से दुःख देने के सबसे बड़े कारणो में, एक-दूसरे के प्रति अपेक्षाएँ, अभिप्राय,... Read More
Q. सामने वाला व्यक्ति क्रोध करे तब क्या करें?
A. कोई हमसे पूछे कि क्या, आप क्रोध करते हैं या क्रोध हो जाता है? तब हम क्या कहते हैं कि, "क्रोध करने... Read More
Q. क्रोध किए बगैर बच्चों को कैसे सुधारें?
A. सभी माता-पिता को ऐसा लगता है कि बच्चों को सही मार्ग पर चढ़ाने की माता-पिता की फर्ज़ पूरी करनी चाहिए... Read More
subscribe your email for our latest news and events
