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स्वजन की याद में रोना आए तो क्या करें?

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करीबी व्यक्ति की मृत्यु के बाद दुःख होना सहज है। लेकिन अगर हम इसके बारे में थोड़ा सोचें तो हमें समझ में आता है कि दुःखी होने से या रोने-धोने से मृत स्वजन वापस नहीं आते। ऐसे समय में ऐसा क्या करें कि जिससे घर में भी शांति रहे और स्वजन के आत्मा को भी शांति मिले?

व्यक्ति की याद आना तो बंद नहीं होगा। इसलिए जितनी बार वे याद आएँ उतनी बार अभी तक हमसे उन्हें जो भी दुःख दिए हैं उन सभी को याद करके उनके अंदर बैठे हुए भगवान से माफ़ी मांगते रहें और प्रार्थना करें कि वे जहाँ हों वहाँ सुख और शांति पाएँ।

रोने से दुःख के वाइब्रेशन पहुँचते हैं

परम पूज्य दादा भगवान कहते हैं कि हम यहाँ दुःखी हों तो उसके स्पंदन स्वजन को पहुँचते हैं और मरने वाले व्यक्ति का आत्मा जहाँ हो वहाँ उसे दुःख होता है। ऐसा होने का कारण एक-दूसरे के प्रति राग-द्वेष और ममता है।

मृत व्यक्ति के साथ राग-द्वेष और ममता के तार छूट जाएँ उसके लिए हमें क्या करना चाहिए? दुःखी होने के बजाय उनके लिए प्रार्थना करें कि वे जहाँ हों वहाँ सुख और शांति को पाएँ, ऊर्ध्वगति पाएँ। ऐसा करने से मरने वाले व्यक्ति के आत्मा को सुख और शांति पहुँचते हैं। स्वजन की मृत्यु के समय बहुत स्वस्थता के साथ उन्हें याद करके प्रार्थना और प्रतिक्रमण करें। प्रतिक्रमण अर्थात् पूरी ज़िंदगी में मृत व्यक्ति के साथ जो-जो भूलें हुई हों उन सभी भूलों के लिए दिल से माफ़ी माँगना और फिर से ऐसी भूलें किसी के भी साथ ना हों ऐसा निश्चय करना। उस व्यक्ति साथ जो भी राग-द्वेष, मोह, अभाव और तिरस्कार हुए हों उन सभी का पछतावा करके उन्हें धो डालना चाहिए। अगर हम अपनी तरफ़ के राग-द्वेष-मोह नहीं धोएँगे तो हम खुद ही अपने प्रिय स्वजन की प्रगति में बाधा डालते रहेंगे।

प्रश्नकर्ता: यानी मृतक व्यक्ति के लिए प्रतिक्रमण किस प्रकार करना है?

दादाश्री: मन-वचन-काया, भावकर्म, द्रव्यकर्म, नोकर्म, मृतक का नाम तथा उसके नाम की सर्व माया से भिन्न ऐसे, उसके शुद्धात्मा को याद करना, और बाद में ‘ऐसी गलतियाँ की थीं’ उन्हें याद करना (आलोचना)। उन गलतियों के लिए मुझे पश्चाताप होता है और उनके लिए मुझे क्षमा करो (प्रतिक्रमण)। ऐसी गलतियाँ नहीं होंगी ऐसा दृढ़ निश्चय करता हूँ, ऐसा तय करना है (प्रत्याख्यान)। ‘हम’ खुद चंदूभाई के ज्ञाता-दृष्टा रहें और जानें कि चंदूभाई ने कितने प्रतिक्रमण किए, कितने सुंदर किए और कितनी बार किए।

दुःखी होने के बदले कल्याण की भावना करें

एक चाचा का जवान बेटा गुज़र गया। बाद में वे सत्संग में आए थे। परम पूज्य दादा भगवान ने उन भाई को उपाय बताया कि जब भी आपको आपका बेटा याद आए तब आप, उसके आत्मा का कल्याण हो ऐसा कहना। जिस भी भगवान को मानते हों उनका नाम लेकर, बेटे के आत्मा का कल्याण हो ऐसी भावना निरंतर करते रहना।

उन्होंने कहा था कि, हम उसके साथ निरंतर रहे, साथ में खाया-पीया, इसलिए उसका कल्याण कैसे हो ऐसी भावना करनी चाहिए। हम परायों के लिए अच्छी भावना करते हैं, तो यह तो अपने स्वजन के लिए क्या नहीं करें?” और फिर उन भाई को समाधान हुआ। उनके साथ हुई बातचीत के कुछ अंश नीचे दिए गए हैं।

अपने हाथ का खेल नहीं है यह और उस बेचारे को वहाँ दुःख होता है। हम यहाँ दु:खी होते हैं, उसका असर उसे वहाँ पहुँचता है। तो उसे भी सुखी नहीं होने देते और हम भी सुखी नहीं होते। इसलिए शास्त्रकारों ने कहा है कि ‘जाने के बाद परेशान मत होना।’ इसलिए हमारे लोगों ने क्या किया कि ‘गरुड़ पुराण बिठाओ, फलाँ बिठाओ, पूजा करो, और मन में से निकाल दो।’ आपने ऐसा कुछ बिठाया था? फिर भी भूल गए, नहीं?

प्रश्नकर्ता: पर वह भुलाया नहीं जाता। बाप-बेटे के बीच व्यवहार इतना अच्छा चल रहा था। इसलिए वह भुलाया जाए ऐसा नहीं है।

दादाश्री: हाँ, भूल सकें ऐसा नहीं है, मगर हम नहीं भूलें तो उसका हमें दुःख होता है और उसे वहाँ दुःख होता है। इस तरह अपने मन में उसके लिए दुःख मनाना, वह पिता के तौर पर अपने लिए काम का नहीं है।

प्रश्नकर्ता: उसे किस प्रकार दुःख होता है?

दादाश्री: हम यहाँ दु:खी हों, उसका असर वहाँ पहुँचे बगैर रहता नहीं। इस जगत् में तो सब फोन जैसा है, टेलीविज़न जैसा है यह संसार! और हम यहाँ परेशान हों तो वह वापस आने वाला है?

प्रश्नकर्ता: नहीं।

दादाश्री: किसी भी रास्ते आने वाला नहीं है?

प्रश्नकर्ता: नहीं!

दादाश्री: तो फिर परेशान हों, तो उसे पहुँचता है और उसके नाम पर हम धर्म-भक्ति करें, तो भी उसे हमारी भावना पहुँचती है और उसे शांति होती है। उसे शांति पहुँचाने की बात आपको कैसी लगती है? और उसे शांति मिले यह आपका फ़र्ज़ है न? इसलिए ऐसा कुछ करो न कि उसे अच्छा लगे। एक दिन स्कूल के बच्चों को ज़रा पेड़े खिलाएँ, ऐसा कुछ करो।

रोना आए खुद के मोह और स्वार्थ से

हमें रास्ते में किसी की अंतिम यात्रा निकलती देखकर सहानुभूति या प्रार्थना होती है, लेकिन क्या तब हमें रोना आता है? नहीं! क्योंकि उस व्यक्ति को हम पहचानते ही नहीं हैं या पहचानते भी हैं तो उनके साथ हमारा नज़दीक का रिश्ता नहीं होता। लेकिन अगर किसी करीबी व्यक्ति की मृत्यु हो जाए तो रोना अवश्य आता है। मृत्यु तो मृत्यु ही है। तो इन दोनों परिस्थितियों में क्या अंतर है? एक व्यक्ति की मृत्यु तो हमें रुलाती है जबकि दूसरे व्यक्ति की मृत्यु हमें नहीं रुलाती। वास्तव में व्यक्ति नहीं बल्कि हमारी ममता और मोह हमें रुलाते हैं। जितना मोह ज़्यादा उतना रोना ज़्यादा आता है। इस तरह, व्यक्ति के प्रति मोह का आंसुओं के ज़रिए बाहर निकल जाता है।

दूसरा, परिवार का कोई भी सदस्य ऐसा सोचकर नहीं रोता कि, “मेरे बगैर उनको रोज़ खाना कौन खिलाएगा? उन्हें मेरे हाथ की चाय बहुत अच्छी लगती थी, वह कौन पिलाएगा?” लेकिन “मेरा सहारा चला गया, अब मेरा क्या होगा?” यह सोचकर रोता है। अगर जिनकी कमाई से घर चलता हो घर के ऐसे बुज़ुर्ग अचानक गुज़र जाएँ और फिर मिलकियत में पीछे कुछ छोड़कर नहीं जाएँ तो आर्थिक परेशानियों के खयाल से ही रोना आता है। जिन व्यक्ति के साथ हम रात-दिन रहते हैं, उनके चले जाने पर घर में अकेलापन हमें खा जाएगा, इस डर से रोते हैं। मेरे बच्चों को कौन संभालेगा यह सोचकर रोते हैं। संक्षेप में, सूक्ष्म में कोई स्वार्थ है जो हमें रुलाता है। लेकिन अगर व्यक्ति की मृत्यु होगी उसके बाद की पूरी तरह से मानसिक, आर्थिक और सामाजिक रूप से पूर्वतैयारी कर रखी हो तो इतना रोना नहीं आता।

पूज्य नीरूमाँ एक दिलचस्प प्रसंग का वर्णन करते हैं। एक भाई के मौसे को गुज़रे हुए महीना हो गया था फिर भी मौसी लगातार रोती रहती थीं। भाई के बहुत समझाने पर भी मौसी का रोना बंद नहीं होता था। तब पूज्य नीरू माँ मौसी से मिले और उन्हें समझाया कि, “मौसी महीना हो गया, अब मौसा तो दूसरी जगह जन्म ले चुके होंगे”। क्योंकि जिस समय आत्मा एक देह छोड़ता है, उसी समय खिंचकर लंबा होता है और दूसरे देह में जहाँ पिता का वीर्य और माता का रज इकट्ठा होने का संयोग हो वहाँ प्रवेश करके तुरंत ही जन्म ले लेता है। इसलिए मृत्यु पाने वाला व्यक्ति तुरंत ही कहीं जन्म ले लेता है। बाद में नीरू माँ ने बहन को वेधक प्रश्न पूछा कि, “मानिए कि, दस-पंद्रह साल के बाद आप मर गए, तो मौसा आपके इंतज़ार में बैठे रहेंगे कि दूसरी मौसी लेकर बैठ गए होंगे?” क्योंकि उस वक़्त मौसी उनसे दस-पंद्रह वर्ष छोटी होंगी। तुरंत ही मौसी को समझ में आया और वे एकदम शांत हो गईं। फिर बोलीं कि, “सही बात है, अब नहीं रोऊँगी।” इस तरह से सच्ची समझ से भी स्वजन का दुःख बिसरा जाता है।

समय हर दर्द की दवा है। जैसे-जैसे समय बीतता है वैसे-वैसे व्यक्ति के जाने का दुःख अपने आप ही विस्मृत हो जाता है, खालीपन भर जाता है। कुछ महीने या कुछ सालों के बीतते जीवन नॉर्मल हो जाता है। पहले जिस तरह से दिन बीतते थे अब फिर उसी तरह से दिन बीतने लगते हैं।

साथ, स्मशान तक ही!

परम पूज्य दादाश्री अत्यंत व्यवहारिक दृष्टि से स्वजन की मृत्यु के समय की स्थिति का यथार्थ बयान करते हैं और ऐसे प्रश्न रखते हैं कि जो सुनने में थोड़े कठिन लगें, लेकिन हमें सोचने पर मजबूर ज़रूर कर देते हैं। गहराई से सोचने पर जगत् की वास्तविकता क्या है वह स्पष्ट हो जाती है।

कभी हमने सोचा कि सबसे प्रिय स्वजन की मृत्यु के वक़्त परिवार में "आपके बिना मैं नहीं जी पाऊंगा!" ऐसा बोलने वाले तो बहुत होते हैं, पर वास्तव में उनके जाने के बाद चिता में कोई याहोम करता है? शरीर को स्मशान में जलाकर सब घर में आने के बाद बैठकर चाय-नाश्ता नहीं करते? व्यक्ति के जाने के बाद घर के लोग उनकी चिंता में रोते हैं या अपनी चिंता में ज़्यादा रोते हैं?

परम पूज्य दादा भगवान दुनिया की इस वास्तविकता की समझ व्यवहारिक दृष्टिकोण से यहाँ पर खुली कर रहें हैं।

दादाश्री: यह तकिया होता है, उसका खोल बदलता रहता है, लेकिन तकिया तो वही का वही। खोल फट जाता है और बदलता रहता है, वैसे ही यह खोल भी बदलता रहता है।

बाकी यह जगत् सारा पोलम्‌पोल है। फिर भी व्यवहार से नहीं बोलें तो सामने वाले के मन को दुःख होगा। पर स्मशान में साथ जाकर वहाँ चिता में कोई गिरा नहीं। घर के सभी लोग वापस आते हैं। सभी सयाने-समझदार हैं। उसकी माँ हो, वह भी रोती-रोती वापस आती है।

प्रश्नकर्ता: फिर उसके नाम से छाती कूटते हैं कि पीछे कुछ छोड़कर नहीं गए, और दो लाख छोड़ गए हों, तो कुछ बोलते नहीं।

दादाश्री: हाँ, ऐसा। यह तो नहीं छोड़ गया उसका रोना है कि ‘मरता गया और मारता गया’ ऐसा भी अंदर-अंदर बोलते हैं! ‘कुछ छोड़ा नहीं और हमें मारता गया!’ अब वह नहीं छोड़ गया, उसमें उस स्त्री का नसीब कच्चा इसलिए नहीं छोड़ा। पर मरने वाले को गालियाँ खाने का लिखा था, इसीलिए खाई न! इतनी-इतनी सुनाते हैं!

हमारे लोग जो स्मशान जाते होंगे, वे वापस नहीं आते न, या सभी वापस आते हैं? यानी यह तो एक तरह का फ़जीता है। रोएँ तो भी दुःख और नहीं रोएँ तो भी दुःख। बहुत रोएँ, तो लोग कहेंगे कि ‘लोगों के यहाँ नहीं मरते, जो इतना रो रहे हो? कैसे, घनचक्कर हो या क्या?’ और नहीं रोएँ, तब कहेंगे कि आप पत्थर जैसे हो, हृदय पत्थर जैसा है तुम्हारा!’ यानी किस ओर जाना वही समस्या है! सब साधारण अवस्था जैसा होना चाहिए, ऐसा कहेंगे।

वहाँ स्मशान में जलाएँगे भी और साथ में पास के होटल में बैठकर चाय-नाश्ता भी करेंगे, ऐसे नाश्ता करते हैं न लोग?

प्रश्नकर्ता: नाश्ता लेकर ही जाते हैं न!

दादाश्री: ऐसा! क्या बात करते हो? यानी ऐसा है यह जगत् तो सारा! ऐसे जगत् में किस तरह रास आए?

आने-जाने’ का संबंध रखते हैं, पर सिर पर नहीं लेते। आप लेते हो सिर पर अब? सिर पर लेते हो? पत्नी का या अन्य किसी का भी नहीं?

प्रश्नकर्ता: नहीं।

दादाश्री: क्या बात करते हो?! और वे तो पत्नी को बगल में रखकर बिठाते रहते हैं। कहेंगे कि तेरे बिना मुझे अच्छा नहीं लगता। पर स्मशान में कोई साथ आता नहीं। आता है कोई?

कल्पांत - कल्प के अंत तक भटकना

स्वजन की मृत्यु के वक़्त कभी ऐसा भी देखने मिलता है कि परिवार के लोग अत्यधिक विलाप कर बैठते हैं। बहुत से लोग तो सिर पटकते हैं और उसके परिणाम स्वरूप बेहोश भी हो जाते हैं। यह समझ में आता है कि मृत्यु एक दुःखदाई पल है। पर जिसका कोई उपाय ही ना हो, जिसे टाला ही ना जा सके, जहाँ सचमुच हाथ-पैर मोड़कर बैठने की जगह है, वहाँ हाथ-पैर, सिर पटकने से क्या हासिल होगा?

परम पूज्य दादा भगवान कहते हैं कि, यह एक कल्पांत किया तो ‘कल्प’ के अंत तक भटकने का हो जाता है। एक पूरे कल्प के अंत तक भटकने का हुआ यह।“

एक कल्प यानी पूरे कालचक्र का आधा भाग। कल्प के अंत तक मतलब दूसरे छः आरों में फिर से भटकना पड़ेगा। इसलिए जितना हो सके उतना कल्पांत किए बगैर मृत्यु के दुःख को बुझाना चाहिए।

जो गया वह गया, अभी जो हैं उन्हें संभालो

कोई व्यक्ति अमरफल लेकर नहीं आता। स्वजन की मृत्यु हो तब उनके पीछे दुःख और विषाद में रोते रहें तो फ़िज़ूल में वक़्त बर्बाद होता है। घर के ज़िम्मेदार व्यक्ति होने के नाते हमारा फ़र्ज़ है कि हम घर के दूसरे लोगों को संभाल लें। जो गए वे गए, लेकिन जो हाज़िर हैं, माँ-बाप, पति-पत्नी या बच्चे, उन्हें संभाल लेना चाहिए।

परम पूज्य दादा भगवान कहते हैं कि, जो जीवित हैं उसे शांति दो। गया वह तो गया, उसे याद करना अभी छोड़ दो। जो यहाँ जीवित हैं, जितने आश्रित हैं उन्हें शांति दो। उतना अपना फ़र्ज़ है। यह तो जो जा चुके हैं उन्हें याद कर रहे हो और इन्हें शांति नहीं दे सकते, यह कैसा? इस तरह फ़र्ज़ चूक जाते हो सारा।“

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