आजकल डिप्रेशन बहुत सामान्य हो गया है। डिप्रेशन एक प्रकार का मानसिक रोग है, जो पश्चिमी देशों में लगभग दस प्रतिशत लोगों में पाया जाता है। भारत में भी अब डिप्रेशन के मामले बहुत अधिक देखने में आते हैं। उसमें भी खासकर महिलाओं में डिप्रेशन की दर अधिक होती है।
डिप्रेशन के अनेक कारण होते हैं और इसके लक्षण भी कई प्रकार के होते हैं। डिप्रेशन मुख्य रूप से मन को प्रभावित करता है, लेकिन लोगों का मन इस बीमारी को स्वीकार करने के लिए तैयार ही नहीं होता। इसलिए यह समस्या और अधिक जटिल होती जा रही है।
डिप्रेशन के प्रकार:
डिप्रेशन के दो प्रकार होते हैं। पहला, सामान्य भाषा में प्रयोग होने वाला डिप्रेशन, जिसमें जीवन में कोई आघात पहुँचा हो, अपमान हुआ हो, कोई दुःख पड़ा हो या अंदर लगातार चिंता और दुःख का असर बना रहता हो तब व्यक्ति कहता है, “मुझे डिप्रेशन हो गया है।”
दूसरा, चिकित्सा के क्षेत्र में यानी मेडिकल भाषा में प्रयोग होने वाला डिप्रेशन। जिसमें दिमाग की ब्रेन सेल्स और ब्रेन टिश्यू में बदलाव या नुकसान तथा केमिकल इम्बैलेंस हो जाता है। यह मेडिकल डिप्रेशन सामान्य डिप्रेशन से बिल्कुल भिन्न होता है, लेकिन इसकी शुरुआत अधिकतर सामान्य डिप्रेशन से ही होती है।
डिप्रेशन के लक्षण:
यदि हमारे आसपास किसी व्यक्ति को या हमें डिप्रेशन हो, तो उसे कैसे पहचानें? डिप्रेशन को पहचानने के कुछ लक्षण नीचे दिए गए हैं। जिनसे शुरूआती स्टेज में ही डिप्रेशन को पहचाना जा सकता है और समय रहते उससे बाहर निकलने के उपाय किए जा सकते हैं।
सामान्यतः डिप्रेशन के लक्षणों में,
- किसी भी कार्य में एकाग्रता न रहना।
- अकेले रहना ज़्यादा अच्छा लगता है और अन्य लोगों के साथ मिलना-जुलना अच्छा नहीं लगता।
- जीवन में रुचि नहीं रहती। जिन कार्यों या शौक में पहले रुचि थी, उन सभी से रुचि समाप्त हो जाती है।
- व्यक्ति को इन्फिरियॉरिटी महसूस होती रहती है। हर बात में ऐसा लगता है कि “मुझे कुछ नहीं आता” और “मैं बेकार हूँ”।
- लगातार दुःख और रहता है।
- हर परिस्थिति में नेगेटिव दृष्टिकोण रहता है। छोटी-सी बात में भी बहुत नेगेटिव विचार आने लगते हैं।
- अकेलेपन का अहसास होता है।
- जीवन बेकार लगता है।
- लगातार चिंता और खालीपन लगता रहता है।
- नींद पूरी न होना या बहुत ज़्यादा नींद आना।
- भूख न लगना या वजन में अचानक बदलाव होना।
- मध्यम प्रकार के डिप्रेशन के लक्षणों में व्यक्ति को आत्महत्या के विचार आते हैं।
- गंभीर डिप्रेशन में व्यक्ति आत्महत्या का प्रयास भी करता है, जिसके लिए तात्कालिक उपचार करने पड़ते हैं।
ऊपर दिए गए लक्षणों में से दो-तीन लक्षण भी यदि व्यक्ति में दिखाई दें, तो तुरंत उन्हें ध्यान में लेना चाहिए और डॉक्टर या मनोचिकित्सक से मिलना चाहिए। ताकि समय रहते इससे बाहर निकला जा सके और व्यक्ति का जीवन फिर से बिल्कुल नॉर्मल हो सके।
डिप्रेशन के कारण:
डिप्रेशन के कई कारण होते हैं, जिनमें आंतरिक और बाहरी दोनों कारक असर करते हैं।
चिकित्सा के क्षेत्र में ऐसा शोध किया गया है कि मस्तिष्क की ब्रेन सेल्स में रासायनिक यानी हार्मोनल असंतुलन होने लगता है, जिसके कारण डिप्रेशन आता है। डॉक्टरों की दृष्टि में जिसे डिप्रेशन कहा जाता है, वह वंशानुगत भी हो सकता है। इसके अलावा, घर का माहौल और परवरिश, परिवार में हुई कोई दुःखद घटना जैसे कि, माता-पिता का तलाक, किसी करीबी व्यक्ति की अकाल मृत्यु या किसी प्रकार की हिंसा का सदमा भी डिप्रेशन का कारण हो सकता है।
आम बोलचाल की भाषा में जो डिप्रेशन शब्द इस्तेमाल होता है और जो अभी तक मेडिकल की भाषा के डिप्रेशन तक नहीं पहुँचा है, उसके लिए जीवन के कई छोटे-बड़े प्रसंग ज़िम्मेदार होते हैं। जैसे कि, व्यापार में घाटा होना, नौकरी चली जाना और पैसों की किल्लत होना, सास या जीवनसाथी का स्वभाव बहुत कड़क होने के कारण शादी के बाद पछतावा होना, बच्चे सामने से जवाब देने लगें, जीवन में असफलता मिले आदि। ऐसी कई परिस्थितियों में नीचे दिए गए मानसिक कारक अपनी भूमिका निभाते हैं।
उलझन का समाधान न मिलना
सामान्य डिप्रेशन की शुरुआत में जीवन में कुछ ऐसी घटनाएँ घट चुकी होती हैं, जब व्यक्ति दुःखी हो जाता है। जैसे कि, कोई बड़ा अपमान हुआ हो, बड़ा नुकसान हुआ हो, अपनी धारणा के मुताबिक न हो पाया हो तब, माता-पिता के सामने बच्चे ज़वाब देने लगें या घर छोड़कर चले जाएँ तब, बच्चों को परीक्षा में असफलता मिले तब।
इसके अलावा, पैसों की तंगी, स्वास्थ्य संबंधी परेशानियाँ या रिश्तों में पैदा होने वाली कड़वाहट जैसी जीवन में दो-चार बड़ी मुश्किलें आ जाएँ जिनका समाधान निकालना व्यक्ति को नहीं आता, तो वह उलझ जाता है या नेगेटिव हो जाता है। जिसे बाद में डिप्रेशन आ गया कहा जाता है। संक्षेप में, ऐसा डिप्रेशन जीवन की कुछ परिस्थितियों में पैदा होने वाली उलझनों का सॉल्यूशन न मिलने के कारण होता है।
जब उलझन लंबे समय तक नहीं सुलझती, दुःख बहुत लंबे समय तक रहता है, तो व्यक्ति उससे बाहर नहीं निकल पाता। कुछ लोग उस दुःख को भुलाने के लिए टीवी-मूवी देखने, बाहर घूमने या पार्टियाँ करने की ओर रुख करते हैं। कुछ लोग इससे आगे बढ़कर शराब, सिगरेट या ड्रग्स जैसे व्यसनों में पड़ जाते हैं, तो कुछ लोग रात में नींद की गोलियाँ खाकर सो जाने का उपाय करते हैं। वे उतने समय के लिए दुःख भूल जाते हैं, लेकिन जैसे ही नशा उतरता है तो दुःख फिर से शुरू हो जाता है।
बहुत अधिक नकारात्मक विचारों का आना
डिप्रेशन का सबसे पहला असर मन पर होता है। इसमें, मन में तरह-तरह के विचार आते हैं, मन असमंजस में पड़ जाता है और विचारों का बवंडर उठता रहता है। और फिर अंदर असहनीय दुःख होता है, जलन होती है।
नेगेटिविटी उत्पन्न होने पर “मुझे ऐसा हो गया”, “मेरा क्या होगा?”, “मैं अकेला पड़ गया/अकेली पड़ गई” ऐसे विचार शुरू हो जाते हैं। फिर व्यक्ति भूतकाल या भविष्यकाल का मंथन कर-करके दुःख में फँस जाता है। इनमें अधिकतर बातें सिर्फ काल्पनिक ही होती हैं।
कई बार जब मन में दुःख होता है, मन डिप्रेस हो जाता है और नापसंद विचार मन पर हावी हो जाते हैं, तब हम उन विचारों को हटाने या दूर करने की कोशिश करते हैं। लेकिन इससे विचार बंद नहीं होते। लगातार नेगेटिव विचार या खुद के प्रति नेगेटिविटी के कारण मानसिक असर होने लगती है। मान लीजिए, किसी बहू से उसकी सास कहे कि “तू पागल है।” तब पहले तो बहू मानेगी ही नहीं कि “मैं भला क्यों पागल हूँ!” फिर जब एक दिन उसका पति कहे कि “तुम बिल्कुल पागलों जैसी हरकत करती हो।” तब बहू चौंक जाती है कि “नहीं, नहीं मैं ऐसी नहीं हूँ।” इसी बीच एक दिन उसकी सहेली कह दे कि “तुम्हारा दिमाग ठिकाने नहीं है, तुम बिल्कुल पागलों जैसी बातें करती हो।” तब बहू को लगने लगता है कि “सचमुच मैं पागल हूँ।” इस तरह एक बार जब मान्यता बदल जाती है, तो खुद पर वैसा असर होना शुरू हो जाता है।
मनोबल और सहनशक्ति का कम होना
आजकल लोगों की सहनशक्ति बहुत कम हो गई है। थोड़े से तनाव को भी वे सहन नहीं कर पाते और टूट जाते हैं। हमारे बुजुर्गों की जनरेशन में सहनशक्ति बहुत ज़्यादा होती थी, इसलिए परिस्थिति चाहे कैसी भी हो, वे उसे शांति से पार कर लेते थे और कोई परेशानी नहीं आती थी। लेकिन आजकल लोग जीवन में ज़रा सा भी सेटबैक या बड़े बदलाव आएँ तो सहन नहीं कर पाते। इतना ही नहीं, रहने की जगह या माहौल बदल जाए, आसपास बातचीत करने वाले लोग या खाने-पीने के संयोग बदल जाएँ ऐसे कई बदलाव एक साथ आ जाएँ, तो वे उसका भी सामना नहीं कर पाते और डिप्रेशन में आ जाते हैं।
कम उम्र के बच्चों को भी जब स्कूल या कॉलेज जाना पड़े, हॉस्टल में रहना पड़े, पढ़ाई थोड़ी कठिन लगे, पेपर अच्छा न हुआ हो, परीक्षा का टेंशन बढ़ जाए, तो कभी-कभी परीक्षा में फेल होने पर भी वे डिप्रेशन में आ जाते हैं।
सफलता में घमंड का रिएक्शन आना
आम बोलचाल की भाषा में इस्तेमाल होने वाला डिप्रेशन अक्सर एलिवेशन (ऊपर चढ़ना) का परिणाम होता है। जब किसी व्यक्ति को बहुत मान और प्रतिष्ठा मिलती है या जीवन में बड़ी सफलता मिलती है, तो वह हवा में उड़ने लगता है। यानी, उसके भीतर “मुझे आता है”, “मैं ऐसे काम खत्म कर देता हूँ” ऐसा अहंकार खड़ा हो जाता है। फिर उस व्यक्ति को जीवन में एक बार भी असफलता मिले, तो वह डिप्रेशन में आ जाता है। बहुत पैसा कमाने पर वह सफलता के नशे में चूर हो जाता है और नुकसान होने पर उसे डिप्रेशन आ जाता है।
इस प्रकार, जीवन में अपनी मर्ज़ी के मुताबिक काम हो तो हवा में उड़ने लगते हैं और मर्ज़ी से उल्टा हो तो अर्श से फर्श पर आ जाते हैं जिसे बाद में हम डिप्रेशन कहते हैं। लेकिन वह वास्तव में ऊपर चढ़ने का ही एक रिएक्शन है।
डिप्रेशन के उपाय:
आजकल समाज में पढ़े-लिखे लोग भी डिप्रेशन को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं होते हैं और डिप्रेशन या मानसिक बीमारी को बहुत बड़ा स्वरूप दे देते हैं। हर मानसिक बीमारी इतनी गंभीर नहीं होती कि व्यक्ति को पागलखाने में भर्ती करना पड़े। यदि इसका सही इलाज किया जाए, तो यह पूरी तरह से ठीक होने वाली बीमारी है।
मेडिकल डिप्रेशन के लिए दवाइयाँ लेना
यदि डिप्रेशन मेडिकल की भाषा का हो, तो उसमें डॉक्टर से संपर्क करके इलाज करवाना बहुत ज़रूरी है। माइल्ड, मॉडरेट या सीवियर इन सभी प्रकार के डिप्रेशन का इलाज संभव है, जिससे व्यक्ति सामान्य जीवन जी सकता है।
जैसे डायबिटीज में इंसुलिन इम्बैलेंस होता है, वैसे ही डिप्रेशन में कुछ हार्मोन्स का इम्बैलेंस होता है। डायबिटीज, ब्लड प्रेशर या हार्ट अटैक आने पर डॉक्टर कहते हैं कि पूरी ज़िंदगी कुछ दवाइयाँ लेनी पड़ेंगी, वरना जीवन सुरक्षित नहीं रहेगा। ठीक उसी तरह, मेडिकल डिप्रेशन में भी दवाइयाँ लेना ज़रूरी है। शारीरिक बीमारी की तरह मानसिक बीमारी का इलाज भी दवाओं से संभव है।
आजकल डिप्रेशन की कई बेहतरीन दवाइयाँ खोज ली गई हैं, जिनके सफल परिणाम भी सामने आए हैं। इन दवाओं का एक निश्चित कोर्स करना पड़ता है। डिप्रेशन की तीव्रता जितनी ज़्यादा होती है, उतने ही लंबे समय तक दवाइयाँ लेनी पड़ती हैं।
योग, व्यायाम और अन्य गतिविधियाँ करना
मेडिकल डिप्रेशन के लिए दवाइयाँ तो ज़रूरी हैं ही, लेकिन साथ ही नियमित रूप से योग, प्राणायाम, शारीरिक व्यायाम, रोज़ टहलना और ध्यान करना आदि भी बहुत मददगार साबित होते हैं। डिप्रेशन में यदि नियमित रूप से रोज़ एक घंटा व्यायाम या योग किया जाए, तो बहुत तेज़ी से रिकवरी संभव हो पाती है।
जीवन में कोई ऐसा शौक या सामूहिक गतिविधियाँ जो मन को शांति और आनंद दे, उनमें भाग लेना चाहिए। इससे डिप्रेशन, चिंता या मानसिक तनाव का स्तर कम हो जाता है। इसके अलावा, ये गतिविधियाँ लोगों से जुड़े रहने और आपसी संबंधों को बढ़ाने में मदद करती हैं। कुल मिलाकर शौक और सामूहिक गतिविधियाँ जीवन में संतुष्टि लाती हैं, जो मानसिक स्वास्थ्य और सुखी जीवन के लिए एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।
विचारों में नॉर्मलिटी रखना
डिप्रेशन में मन में कई तरह के नेगेटिव विचारों का बवंडर उठता है, जिसके परिणामस्वरूप मानसिक दुःख बढ़ता है। विचारों का सीमा से अधिक बढ़ना ही, लिमिट क्रॉस होना कहलाता है। जहाँ दस-पंद्रह मिनट सोचना हो, वहाँ विचारों का भँवर उठने लगे, तो वह नॉर्मलिटी से बाहर गया कहलाता है। फिर चिंता होने लगती है, जो बहुत नुकसान करती है।
जैसे बाहर तेज़ तूफ़ान चल रहा हो तो हम घर के खिड़की-दरवाज़े बंद कर देते हैं, ठीक उसी तरह जब अंदर नेगेटिव विचार ज़रूरत से ज़्यादा आगे बढ़ने लगें, तो हमें उन पर ध्यान देना बंद कर देना चाहिए।
विचार तो पटाखे के अनार की तरह फूटते रहते हैं। जैसे यदि नल बंद न हो रहा हो, और हम दूसरी तरफ़ देखने लगें यानी हमारे लिए तो नल बंद ही हो गया न! जब तक हम उसे देखते रहते हैं, तब तक लगता है कि नल चालू है। उसी तरह जब मन में विचार फूट रहे हों, तब यदि हम अपना ध्यान, अपनी दृष्टि बदल लें, तो वे विचार हमें चिंता नहीं करवाएँगे।
पॉज़िटिविटी को ढूँढकर, दुःख की परिभाषा बदलें
जीवन में आने वाली दुःखद घटनाओं को लोग बहुत बड़ा रूप देकर डिप्रेशन में आ जाते हैं। कोई हमारा अपमान करे, भला-बुरा कहे या जीवन में मुश्किलें आएँ, तो उसमें दुःखी होने की ज़रूरत नहीं है। बल्कि उसमें से पॉज़िटिव ढूँढकर दुःख की परिभाषा ही बदल देनी चाहिए।
वास्तव में दुःख तो उसे कहा जाता है जब तीन दिन तक खाना न मिले, पीने के लिए पानी न मिले, सोने को न मिले – तो वह दुःख कहलाता है! किसी का पैर टूट गया हो और अस्पताल में प्लास्टर लगाकर पैर लटकाया हुआ हो, तो उसे दुःख कहा जाएगा। दाढ़ में दर्द हो, उसे भी दुःख कहा जाएगा। इसलिए, यदि हमें खाने-पीने और रहने की सभी सुविधाएँ अच्छी तरह मिल रही हों, तो फिर अन्य दुःखों की परवाह नहीं करनी चाहिए। इस तरह यदि हम दुःख की परिभाषा ही बदल दें, तो हर तरफ़ सुख, सुख और सुख ही महसूस होगा
लेकिन नेगेटिव बुद्धि दुःख न हो तब भी दुःख मोल ले आती है। वह हमेशा द्वंद्व पैदा करती है। “परीक्षा के समय पेपर में आएगा या नहीं?”, “ऐसा करूँगा तो मेरी खराब इम्प्रैशन पड़ेगी या अच्छी?” पॉज़िटिव और नेगेटिव दोनों तरफ़ का बताए तो वह कन्फ्यूजन है! फिर उसमें कोई सॉल्यूशन नहीं निकलता और उलझन बढ़ जाती है। यदि ऐसी उलझनें सामने आ जाएँ, तो एक-एक करके पॉज़िटिव रहकर उन्हें सुलझाने का प्रयास करना चाहिए, लेकिन हताश या डिप्रेस नहीं होना चाहिए।
जैसे कि, यदि अंदर यह विचार आए कि “परीक्षा में नहीं आएगा तो?” तब उसके सामने पॉज़िटिव सेट करना चाहिए कि “पढ़ा है तो आएगा ही। टेंशन लेने की ज़रूरत नहीं है!” टेंशन लेना ही है तो तैयारी के समय लें, परिणाम के समय टेंशन करने से कोई बदलाव होने वाला नहीं है। धंधे में घाटा हो और बुद्धि बताए कि “अरेरे! मेरा नुकसान हो गया”, तब उसके विरुद्ध में कहना चाहिए, “मेरा नुकसान हुआ या धंधे का? घर के पैसे तो सुरक्षित हैं न! खाने-पीने की कोई परेशानी नहीं है, इतना बहुत है!”
पॉज़िटिविटी की ओर मोड़ने का मतलब नेगेटिविटी को हटाना या बाहर निकालना नहीं है, बल्कि पॉज़िटिविटी को उसमें जोड़ना है। जैसे एक खाली बोतल में पानी भरने पर सारी हवा बाहर निकल जाती है, उसी तरह जीवन की हर परिस्थिति में पॉज़िटिव रहने से नेगेटिव अपने आप निकल जाता है।
मनोबल बढ़ाएँ
मनोबल और सहनशक्ति कम होने के कारण लोग आसानी से डिप्रेशन का शिकार बन जाते हैं। मनोबल एक ऐसी चीज़ है जिसे बढ़ाया जा सकता है। मनोबल टूटता कैसे है? मुश्किल परिस्थितियों में दूसरों के नेगेटिव देखने से मन की शक्ति टूट जाती है। जैसे-जैसे हम दूसरों की गलतियाँ देखना बंद करते जाएँ और अगर कभी दूसरों की गलती देख भी लें, तो उस पर दिल से पछतावा करें, तो मन की शक्ति बढ़ती जाएगी। जिनका मनोबल मजबूत हो, ऐसे लोगों के साथ रहने से और उनका लगातार निरीक्षण करते रहने से भी हमारा मनोबल बढ़ता है।
कैसा भी दुःख क्यों न हो, मजबूत मनोबल वाले इंसान उसे पार कर लेते हैं। वह ऐसा कभी नहीं बोलते कि “अब मेरा क्या होगा”। हिम्मत हार जाने वाले प्रसंगों में भी यदि वह “हिम्मते मर्दा तो मददे खुदा” बोलते हैं, तो शूरवीरता जाग उठती है।
जब हम मन में ठान लेते हैं कि यह काम करना है, लेकिन वह सफल नहीं हो रहा होता, तब यदि हमारा विलपावर (मनोबल) ऐसा हो कि “यह काम सफल होगा ही, क्यों नहीं होगा?”, तो उससे देर-सबेर ही सही, काम सफल हो जाता है। लेकिन अगर मनोबल टूट गया, तो काम सफल नहीं होगा। खुद का विलपावर और दुआ - दोनों के इकट्ठे होने पर, काम सफल होता ही है, कभी असफलता आती ही नहीं है। लेकिन अगर विलपावर ही न हो, तो दुआ भी काम नहीं करती।
धैर्य और धर्म का सहारा लेना
मुश्किल समय में धैर्य रखें। जैसे रात के बाद दिन आता है, वैसे ही संयोगों में बदलाव होता ही रहता है। आज नौकरी नहीं है, तो कल नई मिल जाएगी। आज व्यापार में घाटा हुआ है, तो कल फ़ायदा होगा। इस साल बारिश नहीं हुई और फसल को नुकसान हुआ, तो अगले साल अच्छी बारिश होगी और परिस्थिति सुधर जाएगी। आर्थिक स्थिति कमज़ोर होने पर धैर्य रखना चाहिए और खर्च कम कर देना चाहिए।
यदि हम धैर्य रखें, तो सब कुछ कुदरती रूप से आसानी से सुलझता ही रहता है! लेकिन अगर हम ज़ल्दीबाजी करेंगे, तो सब बिगड़ जाएगा। जब कर्म का उदय बहुत भारी हो, तब हमें समझ लेना चाहिए कि यह दौर कठिन है, इसलिए शांत रहना है। विपरीत संयोग आने पर हम जिस भी भगवान या इष्ट देव-देवी की पूजा करते हैं, उनका नाम लेकर कहना चाहिए कि “भगवान, सब आपको सौंप दिया”, तो सब समाधान आ आता है! मन की शांति के लिए सत्संग में जाना चाहिए। 'सत्' यानी आत्मा, और उसका संग! सत्संग में बैठने से, सत्संग की दो बातों का अराधन करने से मन को शांति मिलती है।
